बिजनेस स्टैंडर्ड - हॉन्ग कॉन्ग में उपद्रव का चीन पर प्रभाव
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हॉन्ग कॉन्ग में उपद्रव का चीन पर प्रभाव

श्याम सरन /  September 16, 2019

इसकी संभावना कम ही है कि हॉन्ग कॉन्ग दोबारा उसी दौर में वापस लौट सकेगा जैसा वह मौजूदा अशांति के पहले हुआ करता था। चीन के लिए इसकी अहमियत बता रहे हैं श्याम सरन

 
हॉन्ग कॉन्ग में राजनीतिक अशांति बदस्तूर जारी है और लगातार हिंसात्मक एवं चीन-विरोधी रुख व्याप्त है। बढ़ते विरोध को दबाने के लिए चीन की सेना के निर्मम एवं रक्तरंजित तरीकों का सहारा लेने की आशंका अधिक बलवती होती जा रही है। अमेरिकी दूतावास की तरफ कूच करते समय प्रदर्शनकारियों ने अपने हाथों में अमेरिकी झंडे थाम रखे थे। वे अमेरिका से इस मामले में हस्तक्षेप करने की गुहार लगा रहे थे जो एक ऐसा उकसावा है जो नजरअंदाज किए जाने पर चीन एवं उसके राष्ट्रपति शी चिनफिंग के लिए बड़ा आघात हो सकता है। 
 
चीन के सामने अब समान रूप से अरुचिकर विकल्पों के बीच में से चुनने की चुनौती है। चीन की किताब में कम बुरा विकल्प हिंसात्मक दमन के बाद हॉन्ग कॉन्ग को शांघाई, ग्वांगतोंग या शेन्जेन की तरह पूरी तरह आत्मसात कर लेने का होगा। फिर हॉन्ग कॉन्ग का शासन चीनी संविधान के तहत बने कानूनों से संचालित होगा, न कि ब्रिटिश औपनिवेशिक दासता की पृष्ठभूमि में विकसित अपने बेसिक लॉ के आधार पर। इसका नतीजा यह होगा कि दुनिया भर में तीसरे सबसे अहम अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार के तौर पर उसका वजूद नहीं रह जाएगा। इस तरह वैश्विक बाजारों के साथ चीन के एकीकरण में हॉन्ग कॉन्ग की भूमिका खत्म हो जाएगी। इससे अमेरिका के साथ जारी व्यापार युद्ध और तीव्र हो जाएगा जो राजनीतिक तनाव बढ़ाने और एक वैश्विक वित्तीय स्थिति हासिल करने की चीन की आकांक्षा पर तगड़ा आघात करेगा।
 
जहां यह सच है कि हॉन्ग कॉन्ग अब पहले की तरह चीन के वृद्धि पथ में बड़ी भूमिका नहीं निभा पाएगा, वहीं चीन के लिए बाकी दुनिया के साथ व्यापार, बैंकिंग एवं वित्तीय संपर्क बढ़ाने में अहम मध्यवर्ती के तौर पर उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण बनी रहेगी। पहले से सुस्थापित व्यापारिक चैनल होने, अपने परिष्कृत बैंकिंग ढांचे और अपने उच्च विकसित वित्तीय एवं प्रतिभूति बाजार होने से हॉन्ग कॉन्ग ने चीन को पहले से मौजूद एवं अंतर्संबंधों का सघन जाल मुहैया कराया था। इससे चीन अपनी अर्थव्यवस्था का भूमंडलीकरण नियंत्रित एवं कम जोखिम के साथ कर पाया। यहां तक कि आज भी चीन आने वाले कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का 60 फीसदी से अधिक हिस्सा हॉन्ग कॉन्ग के जरिये ही पहुंचता है। इसके बैंकों ने चीन सरकार के स्वामित्व वाले एवं निजी कंपनियों के लिए जरूरी वित्त मुहैया कराने के साथ ही उनकी अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों के विस्तार के लिए आधार के तौर पर भी काम किया। हॉन्ग कॉन्ग के शेयर बाजार का पूंजीकरण पांच लाख डॉलर है जो चीन के 6.3 लाख करोड़ डॉलर पूंजीकरण से थोड़ा ही कम है। हॉन्ग कॉन्ग के बैंकों में विदेशी मुद्रा जमा 850 अरब डॉलर है जिसमें बड़ा हिस्सा मुख्य भूमि वाली कंपनियों का है। इस तटीय शहर में 1,300 से अधिक विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियां पंजीकृत हैं जो चीन के अलावा समूचे एशिया-प्रशांत क्षेत्र में कारोबार कर रही हैं। हॉन्ग कॉन्ग के वित्तीय बाजार का इस्तेमाल चीन ने अपने वित्तीय क्षेत्र का चरणबद्ध ढंग से उदारीकरण और अपनी मुद्रा रेनमिनबी के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए किया। हॉन्ग कॉन्ग स्टॉक कनेक्ट के जरिये विदेशी संस्थागत निवेशक शांघाई और शेन्जेन के शेयर बाजारों में प्रवेश कर सकते हैं। अब बॉन्ड कनेक्ट कार्यक्रम भी है जिसके जरिये वे चीन के 12 लाख करोड़ डॉलर के विशाल बॉन्ड बाजार में निवेश कर सकते हैं। हॉन्ग कॉन्ग रेनमिनबी का सबसे बड़ा अपतटीय बाजार भी है।
 
इससे भी बढ़कर औपचारिक तौर पर चीन का हिस्सा होते हुए भी हॉन्ग कॉन्ग की स्थिति अनूठी है। उसे विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में एक स्वायत्त सदस्य का दर्जा हासिल है और बाजार अर्थव्यवस्था के तौर पर खुद चीन को भी नहीं मिल पाने वाले विशेषाधिकारों से लैस है। अमेरिका-हॉन्ग कॉन्ग नीति अधिनियम 1992 के तहत हॉन्ग कॉन्ग की अमेरिकी बाजार में खुली पहुंच हासिल है। इससे चीन को हॉन्ग कॉन्ग के जरिये उच्च तकनीक वाले उत्पादों एवं सेवाओं तक पहुंच मिल जाती है। चीन को होने वाले बौद्धिक संपदा लीकेज को लेकर अमेरिका एवं पश्चिमी देशों में बढ़ती चिंता के मद्देनजर हॉन्ग कॉन्ग एक पुनर्निर्यात केंद्र के तौर पर बेहद अहम हो जाता है। अगर अमेरिका इस विशेष कानून से अलग हो जाता है तो वह सीधे तौर पर हॉन्ग कॉन्ग और परोक्ष तौर पर चीन के लिए गहरा आघात होगा।
 
अगर हॉन्ग कॉन्ग में हो रहे प्रदर्शनों से व्यापक हिंसा के बगैर निपटा जाता है तो इसकी संभावना काफी कम है कि वह अपनी पुरानी स्थिति में लौट सके। एक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र के तौर पर हॉन्ग कॉन्ग की कामयाबी में एक सुरक्षित एवं सुव्यवस्थित क्षेत्रीय व्यापार एवं लॉजिस्टिक केंद्र, एक स्थिर मुद्रा, एक परिष्कृत बैंकिंग प्रणाली और विकसित वित्तीय बाजार के तौर पर उसे हासिल भरोसे का बड़ा हाथ रहा है। इसकी न्यायिक प्रणाली को भी ऐंग्लो-सैक्सन वर्चस्व वाली विश्व अर्थव्यवस्था में विश्वसनीय माना जाता रहा है। यहां की सड़कों पर राजनीतिक अशांति एवं हिंसा का दौर जारी रहने से इस भरोसे में काफी कमी आई है। इसके बहाल हो पाने की संभावना नहीं है। चीन ने आर्थिक क्षति से बचने के लिए अभी तक दमन का रास्ता नहीं अपनाया है लेकिन अपनी संप्रभुता को खतरा और अपनी प्रतिष्ठा को गहरी चोट पहुंचने का डर आगे शायद उसके हाथों को न बांध सके।
 
यह तंग श्याओ फिंग के 'एक देश, दो व्यवस्था' सिद्धांत के खात्मे का भी ऐलान करता है। तंग श्याओ फिंग ने हॉन्ग कॉन्ग, मकाओ और ताइवान जैसे पुराने विमुक्त क्षेत्रों का चीनी मुख्यभूमि से क्रमिक ढंग से एकीकरण करने के लिए एक नवाचारी तरीका निकाला था। ताइवान में चीन के साथ समाहित होने की राह में प्रतिरोध न सिर्फ बना रहेगा बल्कि समय के साथ बढ़ेगा। उस समय चीन में सैन्य साधनों का इस्तेमाल कर ताइवान के एकीकरण का दबाव बढ़ता जाएगा। ऐसे में हमें दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में बढ़ते तनाव का सामना करना पड़ सकता है।
 
भविष्य के लिए कैसा परिदृश्य है? वैश्विक वित्तीय बाजार के साथ एकीकरण और रेनमिनबी मुद्रा के अंतरराष्ट्रीयकरण के लिए चीन की कोशिश को गहरा आघात लगने की आशंका है। हॉन्ग कॉन्ग संकट से अमेरिका-चीन संबंध और बिगड़ेंगे जिससे उनके व्यापार युद्ध में समझौते की गुंजाइश भी कम होती जाएगी। भले ही अमेरिका एवं चीन को एक सूत्र में बांधने वाले सघन आर्थिक एवं व्यापारिक रिश्तों को समझ पाना मुश्किल होगा लेकिन आरंभिक वियुग्मन पहले से ही जारी है और अपनी आर्थिक लागत के बावजूद यह जोर पकड़ सकता है। चीन अपना ध्यान एशिया-प्रशांत क्षेत्र में व्यापक क्षेत्रीय एकीकरण पर लगा सकता है। चीन आरसेप जैसे व्यापक मुक्त व्यापार समझौते और च्यांग मेई जैसी मुद्रा समाधान पहल के जरिये यह एकीकरण करना चाहेगा। च्यांग मेई को चीन, जापान और दक्षिण कोरिया के अलावा आसियान के 10 सदस्य देशों के बीच रेनमिनबी मुद्रा क्षेत्र के तौर पर डिजाइन किया जा रहा है। विश्लेषक अभी से यह आशंका जताने लगे हैं कि आने वाले समय में दुनिया अमेरिकी डॉलर, यूरो और रेनमिनबी के प्रभाव वाले तीन क्षेत्रों में बंट जाएगी। यह बुनियादी तौर पर बहुध्रुवीय विश्व में प्रतिस्पद्र्धा एवं गठजोड़ के भविष्य में तीन भू-राजनीतिक क्षेत्र तैयार करेगा। सवाल है कि इस बदले परिदृश्य में भारत की जगह कहां होगी? 
 
(लेखक पूर्व विदेश सचिव और वर्तमान में सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं)
Keyword: china, hongkong, protest,,
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