बिजनेस स्टैंडर्ड - तेल का सामरिक सवाल
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तेल का सामरिक सवाल

संपादकीय /  September 16, 2019

सऊदी अरब की दिग्गज पेट्रोलियम कंपनी अरामको के संयंत्र पर ड्रोन के जरिये हमले की अप्रत्याशित घटना ने भारत समेत समूची दुनिया को हिलाकर रख दिया है। इस हमले में यमन के हूती विद्रोहियों के शामिल होने की बात कही जा रही है। हमले के बाद अरामको ने अपने उत्पादन में आधी यानी प्रतिदिन करीब 60 लाख बैरल की कटौती करने की बात कही है जो वैश्विक तेल उत्पादन का पांच फीसदी है। इस घोषणा के बाद तेल की कीमतों में एक ही दिन में करीब 20 फीसदी तक उछाल आ गई जो कई वर्षों में आई सबसे बड़ी तेजी है। काफी कुछ इस पर निर्भर करता है कि सऊदी अरब किस तरह से तेल प्रसंस्करण को पटरी पर ले आता है और क्या हूती विद्रोहियों का समर्थन करने वाले ईरान और सऊदी अरब-अमेरिका गठजोड़ के बीच का तनाव काबू में रखा जा सकता है? हालांकि दूसरे बड़े तेल उत्पादक अपना उत्पादन बढ़ाकर इसकी भरपाई कर सकते हैं और अमेरिका ने कहा भी है कि वह अपने सामरिक तेल भंडार के दरवाजे खोलेगा। भारत में डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट रही जो बाह्य क्षेत्र में अस्थिरता और मुद्रास्फीतिकारी दबावों के चलते गहराती चिंताओं को दर्शाता है।

 
अरामको संयंत्र पर हुए हमले ने भारत की दो सामरिक कमजोरियां उजागर की हैं। पहली, जरूरत का 80 फीसदी से भी अधिक तेल  आयात करने वाला भारत अपने वृहद-आर्थिक स्थायित्व के लिए कम एवं स्थिर भाव वाले तेल पर निर्भर बना हुआ है। फिलहाल चालू खाता घाटे की स्थिति काबू में है जो घरेलू मोर्चे पर मांग में भारी कमी होने से है। लेकिन कच्चे तेल का भाव एक डॉलर प्रति बैरल चढऩे पर भारत का आयात बिल 10,500 करोड़ रुपये बढ़ जाता है। भारत ने वर्ष 2018-19 में तेल आयात पर 112 अरब डॉलर खर्च किए थे। भारत को कच्चे तेल एवं रसोई गैस का दूसरा बड़ा आपूर्तिकर्ता सऊदी अरब है।
 
अगर इसी समय अर्थव्यवस्था को कुछ और दबावों का सामना करना पड़ जाता है तो तेल के दाम बढऩे से गहरा अस्थायित्व पैदा होगा। सरकार ने वर्ष 2014 के बाद तेल के भाव नीचे रहने के बावजूद इस सामरिक कमजोरी से निपटने की दिशा में समुचित कदम नहीं उठाए हैं। इसका केवल एक वास्तविक समाधान ही है: उच्च एवं टिकाऊ निर्यात आय जो बाहरी खाते को लेकर भरोसा जगाएगी। लेकिन भारतीय निर्यात में कई वर्षों से सही मायने में नगण्य वृद्धि हुई है और गत अगस्त में यह एक साल पहले की तुलना में छह फीसदी लुढ़क गई। हमें समझना होगा कि निर्यात क्षेत्र में नई जान फूंकना न केवल वृद्धि बल्कि आर्थिक स्थिरता के लिहाज से भी अनिवार्य है। 
 
दूसरी कमजोरी भारत के अपने तेलशोधन ढांचे से जुड़ी है। मसलन, गुजरात के जामनगर में स्थित निजी तेलशोधन इकाइयों पर मुंबई आतंकी हमले के बाद से ही सीमापार हमले का खतरा रहा है। इसी वजह से सरकार ने राष्ट्रीय महत्त्व के निजी प्रतिष्ठानों को भी सुरक्षा देने के लिए सीआईएसएफ अधिनियम में संशोधन किया था। ऐसा खतरा सौर पार्कों जैसे अन्य निजी प्रतिष्ठानों को भी है। उन्हें ड्रोन हमलों से बचाकर रखना मुश्किल हो सकता है। मिसाइल-रोधी प्रतिरक्षा प्रणाली भी ड्रोन के आगे कारगर नहीं होती है क्योंकि वे रडार की पकड़ में आने से बच जाते हैं। दरअसल ड्रोन विमान तकनीक के मामले में कम नहीं होते हैं और उनकी खरीद एवं रखरखाव भी बहुत महंगा नहीं होता है। राष्ट्रीय सीमा क्षेत्र से इतर इलाकों में जिओ-फेंसिंग और ड्रोन पहचान प्रणालियों की नए सिरे से समीक्षा की जरूरत होगी। नागरिक विमानन मंत्रालय ने दिसंबर 2018 में ड्रोन नीति जारी की थी लेकिन अरामको संयंत्र पर हमले के बाद इस नीति की खामियों पर गौर करना चाहिए। इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि ड्रोन के कई उपयोगी एवं उत्पादक इस्तेमाल हैं और नियमों में बदलाव से तकनीकी नवाचार पर असर नहीं पडऩा चाहिए।
Keyword: saudi arabia, crude oil, attack, Aramco,
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