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वर्ष 2019 में कंपनियों के मुनाफे के मुकाबले तेजी से बढ़े सीईओ के वेतन

कृष्ण कांत /  September 15, 2019

आर्थिक गतिविधियां सुस्त होने से देश की शीर्ष कंपनियों के अधिकारियों के वेतन-भत्ते पर भी असर हुआ है। हालांकि इन्हीं कंपनियों के मुख्य कार्याधिकारियों (सीईओ) और दूसरे सीएक्सओ के वेतन आदि पर कोई असर नहीं हुआ है। आंकड़ों में बात करें तो भारतीय कंपनी जगत के प्रवर्तक निदेशकों और पेशेवर निदेशक मंडल स्तरीय अधिकारियों की संयुक्त वेतन वृद्धि दर वित्त वर्ष 2018-19 में सालाना आधार पर 6.3 प्रतिशत रही और पिछले चार वर्षों में सबसे कम रफ्तार से आगे बढ़ी। इसकी तुलना में शीर्ष प्रबंधन में शुमार लोगों के वेतन-भत्तों में पिछले साल 35 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई। 

 
एक अहम बात यह भी रही कि वेतन वृद्धि दर कंपनियों के मुनाफे में बढ़ोतरी के मुकाबले खासी अधिक रही। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने जिन 118 कंपनियों का अध्ययन किया (जिनमें सीईओ का वेतन 1 करोड़ रुपये से अधिक था) उनका संयुक्त शुद्ध मुनाफा सालाना आधार पर पिछले वित्त वर्ष 3.7 प्रतिशत अधिक रहा। इसमें पिछले साल के 26.9 प्रतिशत के मुकाबले जबरदस्त गिरावट दर्ज हुई। इस वजह से कंपनियों में अधिकारियों की वेतन वृद्धि धीमी हो गई। वित्त वर्ष 2019 में कंपनियों के शीर्ष प्रबंधन का वेतन औसतन शुद्ध मुनाफे का 1.12 प्रतिशत था और यह आंकड़ा पिछले तीन साल में सर्वाधिक था। यह पिछले साल 1.09 प्रतिशत रहा था। यह दबाव काफी अधिक था और कुछ मझोली कंपनियों के मामले में यह दो अंक में था और मोटे तौर पर मुनाफा प्रर्वतक सीईओ की झोली में चल गया। 
 
विशेषज्ञ सीईओ के मोटे वेतन-भत्ते में कोई छेड-छाड़ नहीं किए जाने के पीछे कठिन कारोबारी माहौल में प्रतिभावान लोगों को बनाए रखने और इन्हें नियुक्त करने से जुड़ी संगठनात्मक चुनौती का हवाला दे रहे हैं। नियुक्तियां करने वाली कंपनी अलेक्जेंडर ह्यïूगेज में मैनेजिंग पार्टनर (भारत एवं मलेशिया) पंकज दत्त कहते हैं, 'आर्थिक मंदी से सीएक्सओ के वेतन पर ना के बराबर असर हुआ है। मौजूदा कठिन हालात में कंपनियों के लिए उम्दा पेशेवर लोग ढूंढ़ पाना मुश्किल है। अगर ऐसा होता है तो 
 
कंपनियों को मौजूदा प्रबंधन और नए सीईओ या सीएफओ को काफी तगड़ा वेतान देना होगा।' विशेषज्ञ कुल वेतन-भत्तों में अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि के लिए खस्ता निगमित मुनाफे के कारण कमीशनों में कमी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। दत्त के अनुसार गैर-सूचीबद्ध कंपनियां सीएक्सओ को वेतन वृद्धि देने में सूचीबद्ध कंपनियों को पीछे छोड़ रही हैं। सूचीबद्ध कंपनियों को वेतन वृद्धि के लिए काफी प्रक्रियाओं से गुजरना होता है। वह कहते हैं,'जब कंपनियों की कमाई पर असर पड़ता है तो शेयरधारक शीर्ष प्रबंधन के लिए मोटी पगार मंजूर करने में सहज नहीं दिखते हैं। गैर-सूचीबद्ध कंपनियों को ऐसी स्थिति से नहीं गुजरना पड़ता है और प्रबंधन को किसी सीईओ में दमखम दिखता है तो उन्हें वह मोटा वेतन देने से नहीं हिचकते हैं।'
 
यह विश्लेषण नमूने में शामिल उन 118 कंपनियों के वित्तीय आंकड़ों पर आधारित है। इन कंपनियों के बोर्ड स्तर के अधिकारियों के वेतन भत्ते के वित्त वर्ष 2019 तक के आंकड़े उपलब्ध थे। इन सभी कंपनियों में कुल 209 अधिकारी या निदेशक मंडल सदस्य थे, जिनका सालाना वेतन पिछले वित्त वर्ष 1 करोड़ रुपये या इससे अधिक था। हमारे नमूने में शामिल एक वरिष्ठï अधिकारी को कमीशन एवं बोनस सहित वित्त वर्ष 2019 में 7.2 करोड़ रुपये वेतन मिला, जो एक साल पहले के मुकाबले 6 करोड़ रुपये अधिक था। वित्त वर्ष 2015 में यह आंकड़ा 3.2 करोड़ रुपये था। हालांकि वित्त वर्ष 2019 में औसत मुआवजा करीब 11.9 करोड़ रुपये के साथ अपरिवर्तित रहा। 
 
हालांकि कंपनियों की कमाई की तुलना में शीर्ष प्रबंधन को अधिक वेतन दिए जाने के रुझान से बाजार विश्लेषक खुश नजर नहीं आ रहे हैं। इक्विनोमिक्स रिसर्च ऐंड एडवाइजरी सर्विसेस के संस्थापक एवं सीईओ जी चोकालिंगम कहते हैं, 'कठिन दौर में शीर्ष प्रबंधन को अपने वेतन में कटौती करने के लिए तैयार रहना चाहिए, क्योंकि इससे शेयरधारकों को प्ररेणा मिलती है, साथ ही उनका उत्साह भी बढ़ता है और कंपनियों पर भी वित्तीय दबाव कम हो जाता है। खासकर छोटी एवं मझोली कंपनियों के मामले में इन बातों का असर साफ तौर पर दिखता है।' चोकालिंगम इस तर्क से सहमत नहीं हैं कि मंदी के समय में अच्छी प्रतिभा बनाए रखना या इनकी नियुक्ति करना मुश्किल काम है। वह कहते हैं, 'ज्यादातर कंपनियों के मामले में प्रवर्तक ही शीर्ष प्रबंधन का हिस्सा होते हैं और उनकी आर्थिक रुचि गैर-प्रवर्तक शेयरधारकों के साथ जोड़ी जानी चाहिए।' इस बात में कुछ दमखम नजर आता है। कई मझोली एवं छोटी कंपनियों में शीर्ष प्रबंधन का वेतन कंपनियों पर खासा दबाव डालता है। उदारहण के लिए सन टीवी नेटवर्क के मामले में शीर्ष प्रबंधन का कुल वेतन वित्त वर्ष 2019 के शुद्ध मुनाफे का 12.3 प्रतिशत था। इसी तरह, अमर राजा बैटरीज के लिए यह अनुपात 13.3 प्रतिशत और अपोलो टायर्स के मामले में यह 11.7 प्रतिशत था। थोड़ी बड़ी कंपनियों के मामले में यह आंकड़ा 5 से 10 प्रतिशत के बीच था। विश्लेषकों के अनुसार मौजूदा समय में कंपनियों की आय में अनिश्चितता के मद्देनजर यह आंकड़ा अधिक है। इस क्षेत्र से जुड़े एक व्यक्ति ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बताया, 'सिद्धांत तौर पर अधिकारियों का वेतन कंपनी के प्रदर्शन से जुड़ा होना चाहिए और नफा या नुकासन का वितरण विभिन्न शेयरधारकों के बीच समान रूप से होना चाहिए।'
 
हालांकि प्रबंधन को मिलने वाला वेतन बड़ी कंपनियों और भारत के बड़े कारोबारी घरानों पर अपेक्षाकृत कम दबाव डालता है। उदाहरण के लिए भारत की सबसे बड़ी कंपनी रिलायंस इंडस्ट्रीज के शीर्ष प्रबंधन का वेतन इसके शुद्ध मुनाफे का महज 0.2 प्रतिशत था। टाटा समूह की सबसे अधिक लाभ में रहने वाली कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेस के मामले में यह अनुपात महज 0.1 प्रतिशत था। इसी तरह की अन्य कंपनियों में एचडीएफसी बैंक (0.1 प्रतिशत), इन्फोसिस (0.2 प्रतिशत), आईटीसी (0.2 प्रतिशत), टाटा स्टील (0.3 प्रतिशत), कोटक महिंद्रा बैंक (0.2 प्रतिशत) और वेदांत (0.6 प्रतिशत) शामिल हैं। 
Keyword: income tax, CBDT, आयकर विभाग कराधान,
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