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बाजार दुरुपयोग की जांच में एक नया अध्याय

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  September 15, 2019

देश में प्रतिस्पर्धा कानून की व्याख्या में पिछले दिनों अप्रत्याशित रूप से एक बदलाव दर्ज किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) को दिया गया एक निर्देश बरकरार रखा जिसमें उबर द्वारा कथित रूप से आक्रामक मूल्य निर्धारण किए जाने की जांच करने को कहा गया था। परंतु बात केवल आक्रामक मूल्य निर्धारण की नहीं हैं बल्कि इसकी भी है कि क्या प्रतिस्पर्धा कानून के उद्देश्य के लिए बाजार में एक से अधिक कंपनी का दबदबा हो सकता है। पूरी दुनिया में आक्रामक मूल्य निर्धारण को प्रतिस्पर्धा कानून के क्षेत्र में एक विवादास्पद विषय माना जाता है। आक्रामक कीमतों से तात्पर्य मोटे तौर पर यही है कि वस्तुओं अथवा सेवाओं को ऐेसे मूल्य पर बेचा जाए कि उनकी लागत भी नहीं निकल पा रही हो। दूसरे शब्दों में यह आर्थिक दृष्टि से एकदम अतार्किक निर्णय होता है जहां कोई रसूखदार उपक्रम या कारोबारी वस्तुओं अथवा सेवाओं की आपूर्ति लगातार घाटे में करता है। ऐसा अन्य प्रतिस्पर्धियों का कारोबार खत्म करने के लिए किया जाता है। 

 
कई जगह केवल इतना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि ऐसे प्रमाणों की भी आवश्यकता होती है जो बताएं कि प्रतिस्पर्धा को समाप्त करने के बाद कीमतों में इजाफा करके पुराने घाटे की भरपाई करने की कोशिश की गई हो। आक्रामक व्यवहार से प्रतिस्पर्धा पहले ही समाप्त हो चुकी होती है इसलिए विरोध की कोई गुंजाइश नहीं रहती। भारत में प्रतिस्पर्धा आयोग की धारा 4 का संबंध दबदबे के दुरुपयोग से है। इसके लिए पहले यह स्थापित करना होता है कि किसी एक उपक्रम का दबदबा है और उसका दुरुपयोग हो रहा है। यहां अन्य चीजों के अलावा रसूखदार या दबदबे वाली स्थिति को परिभाषित किया गया है। इसका अर्थ है किसी उपक्रम की ऐसी मजबूत स्थिति जो किसी प्रासंगिक बाजार में उसे यह क्षमता प्रदान करती हो कि वह अन्य प्रतिस्पर्धियों अथवा उपभोक्ताओं को अपने पक्ष में प्रभावित कर सके। 
 
उबर के खिलाफ शिकायत यह थी कि वह दिल्ली में प्रति यात्रा जो किराया वसूल कर रही है वह प्रत्येक यात्रा की लागत का आधा था। सीसीआई ने इस मामले की जांच करने से इनकार कर दिया। सीसीआई के निर्णयों पर सांविधिक अपीलों की सुनवाई करने वाले राष्ट्रीय कंपनी लॉ अपील पंचाट ने अपील करने पर कहा कि सीसीआई को इस आधार पर मामले की जांच करनी चाहिए कि किराया लागत से असंगत रूप से कम रखा गया था। उसने कहा कि रसूखदार कारोबारी होने के कारण मामले की जांच आवश्यक है।
 
सर्वोच्च न्यायालय ने उबर की अपील को खारिज कर दिया और कहा कि अगर तथ्यों से यह नजर आता है कि कीमतें ऐसी हैं कि प्रत्येक यात्रा पर घाटा हो रहा है तो प्रथम दृष्ट्या यह मामला बनता है कि शायद संबंधित उपक्रम बाजार में दबदबा रखता हो। अदालत ने कहा कि यह कीमत निश्चित रूप से बाजार में प्रतिस्पर्धियों को प्रभावित करेगी। अदालत ने यह भी कहा कि कीमतों को लागत से कम रखना प्रथम दृष्ट्या अपने दबदबे के दुरुपयोग का मामला लगता है। ऐसे में अपील पंचाट के जांच के निर्णय को बरकरार रखा गया और सीसीआई के इस निर्णय को नकार दिया कि मामले की जांच की आवश्यकता नहीं थी। 
 
आरोप यह था कि उबर ऐसे नुकसान की भरपाई अधिक पूंजी लगाकर करेगी। दूसरे शब्दों में कहें तो एक लचर नियामकीय व्यवस्था का लाभ लेने के लिए पूंजी की मदद ली जा रही थी और प्रतिस्पर्धा समाप्त की जा रही थी। अदालत ने कहा कि यह कहना बहुत मुश्किल है कि इस मामले में जांच की आवश्यकता नहीं है। शुरुआती वर्षों में सीसीआई तकनीकी रूप से सक्षम संस्थानों के मामले में बहुत कातर रुख रखता था। तकनीकी नवाचार को लेकर या कैसे राज्य सरकारों को नवाचार में गतिरोध नहीं पैदा करना चाहिए जैसी दलीलें देकर किसी भी तरह की जांच के खिलाफ माहौल तैयार किया जाता था। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने इस रुख पर रोक लगा दिया। 
 
इसके अलावा बाजार के दुरुपयोग के मामलों में सीसीआई ने ऐतिहासिक रूप से जो रुख अपना रखा था, उसे भी इस निर्णय से झटका लगा। यह दलील दी जा सकती है और यह स्वीकार्य भी है कि अगर एक से अधिक लोग लागत से कम मूल्य की पेशकश कर रहे हों तो इसका यह अर्थ होगा कोई भी रसूखदार स्थिति में नहीं है। यह दिलचस्प नीतिगत स्थिति है क्योंकि दो उद्यम साथ आकर रसूखदार बन सकते हैं और साथ मिलकर बाजार का दुरुपयोग कर सकते हैं। वैकल्पिक रूप से देखें तो दोनों उपक्रमों में से प्रत्येक में यह क्षमता हो सकती है कि वह बाजार पर दबदबा कायम कर सके और प्रतिस्पर्धा को प्रभावित कर सके। 
 
सीसीआई ने ऐतिहासिक रूप से इस रुख का सर्मथन किया है कि एक बाजार में एक से अधिक रसूखदार उपक्रम नहीं हो सकते। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के बाद अब यह स्पष्ट है कि अगर कोई उपक्रम निरंतर अपनी कीमत लागत से कम रखता है तो वह रसूखदार स्थिति में होगा। अगर एक से अधिक उपक्रम ऐसा करते हैं तो इसका अर्थ यह होगा एक से अधिक रसूखदार उपक्रम मौजूद हैं। अदालत की दलील के मुताबिक ऐसा हर उपक्रम जो रसूखदार हो सकता है, उसकी जांच की जा सकती है। देश की सबसे बड़ी अदालत अपनी राय रख चुकी है। ऐसे में जाहिर है कि प्रतिस्पर्धा आयोग के अधीन बाजार के दुरुपयोग की जांच के क्षेत्र में एक नया अध्याय लिखा जाएगा। 
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