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वास्तविक आर्थिक सुधार का अब भी इंतजार

आकाश प्रकाश /  September 15, 2019

सरकार को यह समझना होगा कि उसके कुछ नीतिगत कदमों के बाद भी विदेशी निवेशक बिकवाली क्यों कर रहे हैं? निवेशकों की चिंताओं के बारे में बता रहे हैं आकाश प्रकाश

 
विदेशी निवेशक अब भी अपनी इक्विटी बेचने में लगे हुए हैं। वे रोजाना करीब 10 से 20 डॉलर की निकासी कर रहे हैं। भारतीय शेयर बाजारों का प्रदर्शन साल के अधिकांश समय में सकारात्मक रहे वैश्विक बाजारों से नीचे बना हुआ है। भारत की वृहद आर्थिक तस्वीर अनुकूल है। कच्चे तेल के भाव 60-70 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में हैं। करीब 17 लाख करोड़ डॉलर का वैश्विक कर्ज ऋणात्मक ब्याज दर दे रहा है। मजबूत वृद्धि लायक किसी भी देश को भरपूर पूंजी आकर्षित करने में सक्षम होना चाहिए। दुनिया भर में केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में एक और कटौती का मन बनाते दिख रहे हैं। ऐसे में तरलता की कोई कमी नहीं है।  सरकार ने घरेलू एवं बाहरी दोनों ही तरह के निवेशकों की बातें सुनी और पूंजीगत लाभ पर लगने वाले अधिभार को हटा दिया है। इस अधिभार को लेकर निवेशक चिंता जताते रहे हैं। इस बात को भी माना गया है कि वृद्धि दर अस्वीकार्य स्तर तक सुस्त पड़ चुकी है और इस सुस्ती को दूर करने के लिए नीतिगत कदम उठाए जा रहे हैं।
 
इसके अलावा वैश्विक पूंजी का देश से बाहर जाना बदस्तूर जारी है। वैश्विक या क्षेत्रीय फंड से जुड़े निवेशकों के साथ चर्चा करने पर निम्नलिखित चिंताएं उजागर हुई हैं: चिंता इस बात को लेकर है कि मौजूदा सुस्ती की प्रवृत्ति चक्रीय होने के बजाय कहीं संरचनात्मक तो नहीं है। वैश्विक स्तर पर दरों में लगातार कटौती होने से लगता है कि नॉमिनल वृद्धि दर दुनिया भर में नाटकीय रूप से सुस्त होने वाली है। शायद भारत अब 7-8 फीसदी के बजाय लंबे समय तक 5-6 फीसदी वृद्धि की ही राह पर रहने वाला है। मुद्रास्फीति के लगातार नीचे रहने से नॉमिनल वृद्धि दर 8-9 फीसदी तक रह सकती है। एक अंक वाली नॉमिनल वृद्धि होने से कॉर्पोरेट आय वृद्धि भी इसी स्तर पर टिक सकती है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में बेहद कम लाभ हिस्सेदारी को देखते हुए अधिकतर निवेशकों ने आने वाले पांच वर्षों में भारत के लिए दो अंकों वाली आय वृद्धि का अनुमान रखा था। बाकी उभरते बाजारों की तुलना में भारत के मूल्यांकन प्रीमियम को सही ठहराने के लिए ऐसा किया गया था। दो अंक वाली उच्च आय वृद्धि के अनुमानों का पूरा हो पाना मुश्किल लग रहा है। निवेशकों का अपना मुनाफा हिस्सा छोडऩे के लिए तैयार होने का मतलब पुरानी स्थिति की वापसी है। हो सकता है कि यह भी एक नया सामान्य हो। जहां भारत अब भी अधिकांश देशों की तुलना में तेजी से वृद्धि करेगा, वहीं निरपेक्ष स्तर निराशाजनक हो सकते हैं। इसके लिए मूल्यांकन को दुरुस्त करने की जरूरत पड़ सकती है।
 
यह चिंता भी है कि चक्रीय-रोधी राजकोषीय कदम की गुंजाइश नहीं रह गई है। जीडीपी वृद्धि धीमी होने से कर राजस्व निराश करेगा और बाजार के कमजोर होने से विनिवेश से भी बहुत कुछ नहीं मिलेगा। ऐसे में नीति-निर्माताओं के पास इकलौता रास्ता मौद्रिक नीति का रह जाता है। वे इस विकल्प का इस्तेमाल भी कर रहे हैं लेकिन हताश हो चुका कंपनी जगत कम दरों के बावजूद निवेश से परहेज कर सकता है। बहुतों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था भी सुस्त पडऩे वाली है। इस तरह हमारी वृद्धि चुनौतियों से निपटने में व्यापार एवं निर्यात मददगार नहीं हो सकते हैं। संरचनात्मक सुस्ती की बात करते हुए कई निवेशक कहते हैं कि सरकार के पास इस खाई से निकलने की सीमित क्षमता ही है।
 
कर्ज विन्यास को लेकर भी डर देखा जा रहा है। सरकारी कर्ज का प्रतिफल करीब 8.3 फीसदी है। अगर नॉमिनल जीडीपी पहली तिमाही की ही तरह इस आंकड़े से कम बनी रहती है तो कर्ज की हालत और बिगड़ सकती है। एक और चिंता वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) को लेकर है। कई निवेशकों का मानना है कि जीएसटी संरचना में बदलाव करना पड़ेगा। केंद्र ने राज्यों को 14 फीसदी कर राजस्व की गारंटी दी हुई है लेकिन नॉमिनल जीडीपी के एक अंक में रहने से इतना राजस्व दे पाना असंभव होगा। केंद्र सरकार को इसकी भरपाई के लिए अपने अन्य संसाधन झोंकने पड़ेंगे। रसीदों का मिलान अंतिम विकल्प हो सकता है। इसके लागू हो जाने पर हम कुछ उछाल देख सकते हैं। इसके बगैर समूचे कर ढांचे पर ही नए सिरे से सोचना पड़ेगा। हमने सोचा था कि जीएसटी आने से राजकोषीय स्थिति सुधरेगी। लेकिन यह राजकोषीय गतिशीलता को गंभीर रूप से बाधित कर रहा है। सुस्ती के दौर में नीची नॉमिनल जीडीपी और क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियां बरकरार रहने से इस साल एक लाख करोड़ रुपये राजस्व की कमी हो सकती है।
 
तीसरी चिंता कंपनी कामकाज एवं पारदर्शिता को लेकर है। भारतीय कंपनी जगत में कामकाज के मानकों के लेकर वास्तविक बेचैनी है। सीजी पावर मामला इसकी एक मिसाल है। वास्तविक कर्ज बैलेंस शीट में दिखाए गए कर्ज से दोगुना कैसे हो सकता है? कोई कंपनी प्रबंधन या निदेशक की जानकारी के बगैर हजारों करोड़ रुपये का कर्ज कैसे छिपा सकती है? आईएलऐंडएफएस मामले की असली प्रकृति, आकार और जटिलता अब साफ नजर आ रही है।  बैंकों को इन कर्जों पर 50 फीसदी नुकसान झेलना पड़ सकता है। वित्तीय प्रणाली को 45,000-50,000 करोड़ रुपये गंवाना पड़ सकता है। ऑडिटर, रेटिंग एजेंसियां, प्रबंधन और बोर्ड धोखाधड़ी या अक्षमता की जद में आ सकते हैं। पेशेवर रूप से संचालित और बोर्ड द्वारा प्रबंधन की जा रही कंपनियां अपवादों में ही हैं। बोर्ड भी प्रबंधन के चंगुल में फंस जाता है। अधिकतर निवेशक अब बढिय़ा प्रदर्शन का रिकॉर्ड रखने वाले एक सशक्त प्रवर्तक को ही प्राथमिकता देते हैं। इससे कम-से-कम एजेंसी समस्या कम हो जाती है। सच तो यह है कि वित्तीय बाजारों में भरोसे की भारी कमी है। खराब परिचालन मानक मूल्यांकन गुणकों को कम कर देंगे।
 
भारचीय इक्विटी बाजारों का संकुचन दो साल पहले ही शुरू हो गया था। उस समय बाजार सही थे और बेहतर कामकाज वाले स्थापित नामों को फायदा हुआ था। गुणवत्ता प्रीमियम का भुगतान सही था। कॉर्पोरेट इंडिया की धारणा निचले स्तर पर बनी हुई है। निवेशकों के लिए सकारात्मक बने रह पाना मुश्किल हो रहा है। कंपनियां मांग न होने, वित्तीय प्रणाली में जोखिम बढऩे, न्यायिक सक्रियता, सहानुभूति न रखने वाले नीति-निर्माताओं एवं नियामकों और खराब लाभप्रदता की शिकायत कर रही हैं। मैंने 2012-13 के बाद इस तरह की नकारात्मक कारोबारी धारणा नहीं देखी है। 
 
भले ही सरकार ने कदम उठाने और सुस्ती की रूपरेखा बनानी शुरू कर दी है लेकिन यह काफी नहीं है। सरकार के अलग-अलग अंगों के बीच और नीति-निर्माताओं एवं कंपनी जगत के बीच संवाद की कमी नजर आती है। हमें कंपनी जगत का भरोसा बहाल करने की जरूरत है। निवेशक इस सुस्ती को वास्तविक सुधारों के एक अवसर के तौर पर देखना चाहते हैं। भारत को कारोबार के लिए अधिक माकूल नजर आना चाहिए। इनमें से कुछ बिंदुओं पर मैं अधिक नकारात्मक नहीं हूं लेकिन उम्मीद है कि सरकार अधिक महत्त्वाकांक्षी आर्थिक सुधारों का एजेंडा पेश करेगी। मुझे नहीं लगता है कि यह सुस्ती संरचनात्मक है। अब एनबीएफसी संकट का एक साल पूरा होने वाला है, ऐसे में आधार अनुकूल होने से वृद्धि बेहतर नजर आने लगेगी। मुनाफा हिस्सेदारी एवं जीडीपी आंकड़े मौजूदा स्तर से सुधरेंगे। वैश्विक वृहद परिदृश्य शायद ही इससे बेहतर रहा है। ऐसे में अगला छह महीना खरीद का मौका साबित हो सकता है।
 
(लेखक अमांसा कैपिटल से संबद्ध हैं)
Keyword: india, economy, GDP, FPI,,
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