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निर्यात की समस्या

संपादकीय /  September 15, 2019

केंद्रीय वाणिज्य मंत्रालय के ताजा आंकड़े बताते हैं कि अगस्त 2019 में देश का निर्यात 6 फीसदी तक कम हुआ। यह निर्यात क्षेत्र में लंबे समय से चली आ रही मंदी की स्मृति को ताजा कराने वाला वाकया है। यह सच है कि इस ढांचागत समस्या का देश के बाहरी संतुलन की स्थिरता पर कोई तात्कालिक असर नहीं होगा क्योंकि घरेलू मांग में कमी के चलते आयात में भी गिरावट आ रही है। परंतु फिर भी निर्यात की इस समस्या का हल आवश्यक है। इंजीनियरिंग वस्तुओं के निर्यात में गिरावट खासी दिक्क्तदेह है क्योंकि गत वित्त वर्ष में इसमें सुधार नजर आया था।

 
केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल का यह कहना सही है कि निर्यात वृद्धि किसी भी विकास नीति के केंद्र में होती है। उन्होंने गत सप्ताह बोर्ड ऑफ ट्रेड की एक बैठक में कहा था कि अगर देश को सरकार द्वारा तय विकास लक्ष्य हासिल करने हैं तो उसे निर्यात में 19-20 फीसदी की दर से वृद्धि हासिल करनी होगी। उन्होंने यह भी कहा था कि अगले पांच वर्ष में एक लाख करोड़ डॉलर मूल्य का निर्यात किया जा सकता है और चीन तथा अमेरिका के व्यापारिक युद्ध के बीच भारतीय निर्यातकों के लिए काफी अवसर हैं। इस कारोबारी जंग से उत्पन्न वैश्विक मंदी की स्थिति भी भारत के लिए एक अवसर लेकर आई है। फिलहाल विश्व व्यापार में बमुश्किल 2 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाला भारत नए बाजारों में विस्तार कर सकता है।
 
भारत के लिए यह निर्यात वृद्धि अहम है लेकिन दिक्कत यह है कि यह लक्ष्य हकीकत से दूर नजर आता है। अगस्त में आई गिरावट कोई पहला अवसर नहीं है बल्कि इस वित्त वर्ष में दूसरी बार निर्यात वृद्धि में सालाना आधार पर कमी आई है। इस संदर्भ में देखें तो केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सप्ताहांत पर निर्यात को बढ़ावा देने के लिए जिन उपायों की घोषणा की है वे और अधिक मायने रखते हैं। सीतारमण ने निर्यातकों को नए प्रोत्साहन की घोषणा की जिन्हें शुल्क में छूट या उत्पाद निर्यात में कर छूट का नाम दिया गया है। यह भारत से होने वाले वाणिज्यिक निर्यात संबंधी उस योजना का स्थानापन्न है जो विवादित होकर विश्व व्यापार संगठन तक जा पहुंची। सवाल यह है कि क्या मामूली रद्दोबदल से देश का निर्यात लंबी अवधि में प्रतिस्पर्धी बन सकेगा। हमारे यहां लाल फीताशाही और ऋण की उपलब्धता जैसी ढांचागत समस्याएं भी हैं जिन्हें हल करने की आवश्यकता है। हालांकि सीतारमण ने उस दिशा में भी पहल की है। जैसा कि मंत्री ने कहा भी, निर्यातकों के लिए वस्तु एवं सेवा कर के इनपुट कर क्रेडिट का स्वचालित रिफंड कार्यशील पूंजी की कमी की समस्या को हल करने में मदद करेगा। इसी प्रकार आरबीआई द्वारा निर्यातकों को प्राथमिक क्षेत्र के ऋण मानकों में शिथिलता का भी लाभ मिलेगा। ये दोनों पिछले कुछ समय से लागू हैं और सीमारमण के पैकेज में कुछ खास नया नहीं है।
 
असली अंतर निर्यात क्षेत्र में वैश्विक मानकों को अपनाने से आएगा। वित्त मंत्री ने कहा कि निर्यात मंजूरी के जो काम अभी हाथ से किए जाते हैं उनको जल्दी ही डिजिटल किया जाएगा। उन्होंने इस बदलाव के लिए दिसंबर की समय सीमा तय की है। इस प्रक्रिया में तकनीक का इस्तेमाल केवल अपने काम में नहीं बल्कि बंदरगाह पर जहाजों और ट्रकों के लौटने के समय को वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने में भी किया जाना चाहिए। वैश्विक बंदरगाहों पर जहाज आधे दिन में हट जाते हैं जबकि ट्रक आधे घंटे में। हमें यह लक्ष्य लेकर चलना होगा। अगर हम इसे हासिल कर सके तो देश की निर्यात प्रतिस्पर्धा में बड़ा सुधार नजर आएगा। 
Keyword: export, import, india,,
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