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हिंदी में भी आई डिजिटल कमाई

सुनील कुमार झा /  09 13, 2019

डिजिटल संसार सुनते ही हमारे जेहन में जो तस्वीर उभरती है, उसमें सबसे पहले टेलीविजन कौंधता है क्योंकि लंबे समय से इसी ने हमारे दिल और दिमाग पर राज किया है। खबर जाननी हो, मनोरंजन का इरादा हो या फिल्म देखनी हो तो पहले टीवी से ही काम चलाना पड़ता था। हालांकि इसकी भी सीमाएं हैं, मसलन प्रसारण के समय के हिसाब से अपनी दिनचर्या ढालना, बिजली जाने का संकट और विज्ञापनों की भरमार आदि। लेकिन इन रुकावटों और झंझटों से ब्लॉग, वेबसाइट, यूट्यूब और ई-पत्रिकाएं इन रुकावटों से मुक्ति दिला देती हैं, इसीलिए इनकी पैठ भी तेजी से बढ़ती जा रही है। 

इन माध्यमों की लोकप्रियता बढऩे की सबसे बड़ी वजह है कि इनके साथ समय, स्थान और परिस्थिति की कोई बंदिश नहीं है। अगर आपके पास मोबाइल फोन या लैपटॉप जैसा कोई उपकरण और इंटरनेट कनेक्शन है तो पलक झपकते ही आप इन माध्यमों तक पहुंच सकते हैं। गूगल या किसी और सर्च इंजन पर मनचाही सामग्री टाइप करें और तमाम माध्यमों के लिंक आपकी स्क्रीन पर होंगे।

स्मार्टफोन के तेजी से फैलने और इंटरनेट डेटा सस्ता होने से इन माध्यमों का उपयोग करने वालों की संख्या गजब की तेजी से बढ़ रही है। इसकी तस्दीक आए दिन मीडिया क्षेत्र में जारी होने वाली विभिन्न रिपोर्टों से भी होती है।

समांतर कोश, हिंदी और भारत के पहले विशाल और आधुनिकतम थिसारस, संसार का सबसे बड़ा तीन खंडों वाला द्विभाषी 'द पेंगुइन इंग्लिश-हिंदी हिंदी-इंग्लिश' थिसॉरस ऐंड डिक्शनरी, तथा अन्य कई थिसॉरस तैयार करने में अहम योगदान देने वाले अरविंद कुमार बताते हैं कि जब प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भारत में डिजिटल मुहिम छेड़ी थी तब किसी ने सोचा भी नहीं था कि इस मैदान में जल्द ही पूरी दुनिया में भारत का दबदबा होगा और और बेंगलूरु विश्व की डिजिटल राजधानी तथा विदेशी मुद्रा की आय का स्रोत बन जाएगा। जब 1989 में हिंदी का पहला डेटाबेस बनाने का काम शुरू हुआ तब कंप्यूटर पर हिंदी में लिखने के लिए हर कंपनी का अपना अलग कोड होता था। एक कंप्यूटर पर लिखा दूसरे कंप्यूटर पर नहीं पढ़ा जा सकता था। यानी तब इंटरनेट होता तो भी हिंदी उस पर नहीं हो सकती थी।'

यूनिकोड लाया क्रांतिकारी परिवर्तन  

लेकिन यूनिकोड ने पूरी तस्वीर ही बदल डाली। अरविंद कुमार कहते हैं, 'यूनिकोड की बढ़ती मान्यता और लोकप्रियता की बदौलत हमारी सभी भाषाओं ने विश्व पटल पर पहुंच बनाई। संसार भर की सरकारों और कंप्यूटर कंपनियों तथा भाषाविदों ने मिलकर सभी लिपियों के सभी अक्षरों और अंकों को इस तरह कोड में पिरोया कि एक ही कीबोर्ड पर सभी लिपियां लिखी और पढ़ी जाने लगीं। हर लिपि को संख्याओं की रेंज दी गई। देवनागरी यूनिकोड की रेंज 0900 से 097एफ  तक है। ये संख्याएं बता देती हैं कि कौन सी भाषा है। इन संख्याओं के बल पर ही हर कंप्यूटर संसार की भाषाओं को पहचान सकता है।' 

ईवाई-फिक्की फ्रेम्स ने इसी साल मार्च में 'अ बिलियन स्क्रीन्स ऑफ अपॉच्र्यूनिटी' रिपोर्ट पेश की थी, जिसके मुताबिक चीन के बाद भारत में ही सबसे ज्यादा इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं। यहां इंटरनेट के उपभोक्ताओं की संख्या 57 करोड़ है और यह 13 फीसदी सालाना बढ़ रही है। रिपोर्ट कहती है कि भारत में लगभग 25 लाख उपभोक्ता केवल डिजिटल माध्यम का ही इस्तेमाल करते हैं और परंपरागत माध्यमों पर नहीं जाते। रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2018 में भारत में मीडिया और मनोरंजन का कारोबार 1.67 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया था, जो 2017 के मुकाबले 13.4 फीसदी की वृद्धि को दिखाता है। यही रफ्तार रही तो 2021 तक इसका बाजार 2.35 लाख करोड़ रुपये का हो जाने की उम्मीद है।

वरिष्ठ पत्रकार, हिंदी ब्लॉगर और यूट्यूबर हर्षवद्र्घन त्रिपाठी समाचार और राजनीतिक श्रेणी में लोकप्रिय यूट्यूब चैनल चलाते हैं। डिजिटल दुनिया में हिंदी की भूमिका पर चर्चा करते हुए वह कहते हैं कि आज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर हिंदी की भूमिका बढ़ती जा रही है। कहा जाता है कि नीतियों में अंग्रेजी का दखल बढऩे से हिंदी बोलने वाले पीछे छूटते गए। लेकिन जब डिजिटल संसार बोलने और लिखने का माध्यम बन गया तो हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के युवाओं ने इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सेदारी करनी शुरू कर दी। कुछ लोगों का कहना है कि इन प्लेटफॉर्म पर हिंदी पर दबाव बढ़ा है, लेकिन असल में यह दबाव नहीं बल्कि प्रभाव है, जो लगातार बढ़ रहा है। 

त्रिपाठी कहते हैं, 'आज यूट्यूब जैसी बड़ी कंपनियां भारत में अपने कारोबार को विस्तार देने के लिए भारतीय भाषाओं को ध्यान में रखते हुए अपनी नीतियां तय कर रही हैं। यूट्यूब देखने वालों के ताजा आंकड़ों से साफ है कि इसे देखने वालों की ज्यादा तादाद दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों से बाहर है। इसका सीधा मतलब है कि हिंदी और भारतीय भाषाओं का दबदबा बढ़ रहा है।'

डिजिटल प्लेटफॉर्म से आय में हिंदी वालों की हिस्सेदारी पर त्रिापाठी का कहना है कि कमाई के लिहाज से बहुत असर नहीं पड़ता, लेकिन हिंदी या भारतीय भाषाओं को समझने-बोलने वालों की संख्या अधिक होने के कारण उनमें मौजूद डिजिटल सामग्री को पढऩे-देखने वालों की संख्या भी ज्यादा है। किस वेबसाइट या किस यूट्यूब चैनल को कितनी कमाई हो रही है या नए शुरू हो रहे चैनल की कमाई कितनी होगी, यह स्पष्टï रूप से नहीं कहा जा सकता। लेकिन हिंदी के बढ़ते बाजार से हवा का रुख समझना होगा। यदि कोई निरंतरता के साथ रोचक सामग्री देता है तो उसकी कमाई का आंकड़ा बढ़ता ही जाएगा।

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