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रोजगार और सामाजिक हैसियत में बढ़ी हिंदी

प्रेमकांत सिंह /  September 13, 2019

बात ज्यादा पुरानी नहीं है, जब अंग्रेजी को समाज के खास तबके की और हिंदी को आम लोगों की भाषा माना जाता था। और आखिर क्यों नहीं माना जाता, जब औपनिवेशिक दासता के साथ भारत पर लादी गई अंग्रेजी को हमने भी शासन और समाज की बागडोर संभालने वाले तबके की भाषा मान लिया था। इसके उलट हिंदी आम आदमी की भाषा होने के नाते सामाजिक प्रभुत्व की जंग में पिछड़ती चली गई। सच कहें तो अंग्रेजी का दबदबा अंग्रेजों की विदाई के साथ ही खत्म हो जाना चाहिए था। आजादी के आंदोलन में हिंदी ने समूचे उत्तर और मध्य भारत को एक सूत्र में बांधने में काफी अहम भूमिका भी निभाई थी। इसीलिए मांग उठी कि अंग्रेजी की जगह हिंदी को राजकीय कामकाज की भाषा बना दिया जाए। लेकिन गैर-हिंदीभाषी राज्यों के विरोध को देखते हुए अंग्रेजी का दबदबा बना रहा। वर्ष 1965 के बाद सरकारी कामकाज हिंदी में करने का संकल्प भी धरा रह गया और हिंदी को दोयम दर्जा कबूल करने के लिए मजबूर कर दिया गया। उन दिनों सरकारी कामकाज, अदालती दस्तावेज, तकनीकी विषयों की पढ़ाई और निजी कंपनियों के कामकाज में अंग्रेजी का ही दबदबा था तो समाज में भी उसे खास अहमियत मिलने लगी। उधर हिंदी बोलने और पढऩे वाले लोग उत्तर एवं मध्य भारत के मध्यम तथा एवं निम्न वर्ग से संबंध रखते थे। ऐसे में भाषा के आधार पर सामाजिक विभेद और वर्चस्व का एक अलग पैमाना आकार लेने लगा था।

 
कारोबार ने दी धार
 
मगर 1991 के बाद तस्वीर बदलने लगी। भारत में आर्थिक उदारीकरण शुरू हुआ और उसने हिंदी में भी नई जान फूंक दी। उदारीकरण के साथ जब बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने बड़ी संख्या में भारत में दस्तक दी तो अंग्रेजी जानने-समझने वाले लोगों की मांग भी खूब बढ़ी। लेकिन इन कंपनियों को यह भी समझ आने लगा कि भारत में ग्राहक बनाने हैं तो हिंदी का सहारा लेना ही पड़ेगा। इसलिए जिस हिंदी को कभी आम लोगों की भाषा होने के नाते कमतर माना जाता था, वही कमजोरी बदले हालात में हिंदी की ताकत बन गई।   हिंदीभाषी क्षेत्रों में रहने वाली बड़ी आबादी को ग्राहकों की बड़ी भीड़ के तौर पर देखा जाने लगा और निजी कंपनियां यह मानने के लिए मजबूर हो गईं कि इस भीड़ तक अपनी बात पहुंचानी है तो हिंदी से करीबी रिश्ता कायम करना होगा। इसके लिए कंपनियों को विज्ञापन और बिक्री नेटवर्क में हिंदी भाषी लोगों को जगह तो देनी ही पड़ी, नए उत्पादों की रूपरेखा तैयार करने में भी हिंदी भाषी तबके की पसंद का ध्यान रखना जरूरी हो गया।
 
रसूख हासिल करती हिंदी
 
वजह जो भी हो, समय के साथ हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार बढ़ता ही जा रहा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2011 में हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या करीब 44 फीसदी थी। 2011 की जनगणना के आंकड़े पिछले वर्ष जारी किए गए थे और उनके मुताबिक हिंदी देश में सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। 2001 में 41.03 फीसदी आबादी हिंदी बोलती थी और 2011 में आंकड़ा बढ़कर 43.63 फीसदी हो गया। इससे पता चलता है कि हिंदी भाषा का इस्तेमाल करने वाले लोग बढ़ रहे हैं और यह सिलसिला आगे भी जारी रहने की पूरी संभावना है। ऊपर के आंकड़े मोटे तौर पर यही कहते हैं कि देश का लगभग हर दूसरा व्यक्ति हिंदी जानने-समझने लगा है। यही बात कारोबारी जगत, मीडिया, सिनेमा और राजनीतिक दलों को हिंदी की अहमियत स्वीकार करने के लिए बाध्य करती है। इनमें से किसी भी क्षेत्र से जुड़े शख्स को अपनी बात देश की आधी आबादी तक पहुंचानी है तो उसे हिंदी का सहारा लेना ही पड़ेगा। इसी बात ने हिंदी के सामने कई नई संभावनाएं भी पैदा कर दी हैं।
 
हालांकि इस बात से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि मीडिया और सिनेमा ने हिंदी के प्रचार-प्रसार में बेहद अहम भूमिका निभाई है। हिंदी अखबारों, पत्रिकाओं और समाचार चैनलों की बढ़ती संख्या इसकी प्रत्यक्ष उदाहरण है। आज हालत यह हो गई है कि हिंदी अखबारों के पाठकों की संख्या अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं के अखबारों के पाठकों को बहुत पीछे छोड़ चुकी है। इंडियन रीडरशिप सर्वे 2019 के पहली तिमाही के आंकड़े बताते हैं कि देश भर में 18.6 करोड़ लोगों ने हिंदी समाचारपत्र पढ़ते हैं, जबकि अंग्रेजी समाचारपत्र पढऩे वालों की संख्या महज 3.1 करोड़ है।
 
इसी तरह देश के शीर्ष अखबारों की सूची पर नजर डालें तो पहले दस में से पांच अखबार हिंदी के ही हैं। अंग्रेजी का केवल एक अखबार इस सूची में जगह बना पाया है। रीडरशिप सर्वे कहता है कि पहली तिमाही में हिंदी समाचारपत्र दैनिक जागरण 7.36 करोड़ पाठकों के साथ पहले स्थान पर है, जबकि अंग्रेजी के सबसे बड़े अखबार 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' के पाठक केवल 1.52 करोड़ हैं। समाचार चैनलों के मामले में भी कमोबेश यही स्थिति है। दर्शक संख्या के लिहाज से हिंदी चैनलों का इस कदर दबदबा है कि अंग्रेजी चैनल उसके आगे कहीं नहीं टिकते हैं। 'आज तक' पिछले कई वर्षों से हिंदी समाचार चैनलों का अगुआ बना हुआ है और अंग्रेजी का कोई भी चैनल उसके आसपास भी नहीं फटक पाया है। खबरों से इतर मनोरंजन सामग्री परोसने वाले चैनलों में भी हिंदी का कब्जा है। हिंदी फिल्मों की देशव्यापी लोकप्रियता ने भी हिंदी के प्रसार में अहम योगदान दिया है। आज प्रमुख सितारों से सजी फिल्में हिंदी भाषी राज्यों के अलावा गैर-हिंदी भाषी दक्षिणी राज्यों में भी अच्छा कारोबार कर रही हैं। समय के साथ कारोबार जगत को भी हिंदी की अहमियत का अहसास हुआ और घरेलू कंपनियों के साथ विदेशी कंपनियों ने भी इस भाषा को दिल से अपनाने में देर नहीं लगाई। हालत यह है कि अधिकतर कंपनियां विज्ञापन हिंदी में ही तैयार कराती हैं ताकि अधिकतम लोगों तक पहुंचा जा सके। इससे विज्ञापन और जनसंपर्क के मैदान में हिंदी जानने वालों के लिए अच्छे मौके तैयार हुए हैं। राजनीति की बात करें तो वहां हिंदी की अहमियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि केंद्र में सरकार बनाने की मंशा रखने वाले किसी भी दल या नेता के लिए हिंदी पर पकड़ अनिवार्य मानी जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हिंदी भाषा पर अच्छी पकड़ और भाषण देने की अनूठी कला ने उनकी राजनीतिक कामयाबी में बेहद अहम भूमिका निभाई है।
 
इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी और इंदिरा गांधी जैसे दिग्गज नेताओं ने भी हिंदी के बूते देश के दिल पर लंबे समय तक राज किया था। हिंदी भाषी राज्यों में राजनीतिक पकड़ बनाए बगैर कोई भी दल केंद्र की सत्ता तक नहीं पहुंच सकता है और इसके लिए हिंदी में माहिर होना जरूरी है। हिंदी ने भी बदलते वक्त के साथ तालमेल बिठाने की पूरी कोशिश की है। यह जरूर है कि हिंदी को अब भी सामाजिक स्तर पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। अपनी तमाम उपलब्धियों के बावजूद हिंदी को अब भी मध्यम वर्ग एवं आम लोगों की ही भाषा माना जाता है। अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की बढ़ती संख्या इसका संकेत देती है कि समाज के भीतर हिंदी की तुलना में अंग्रेजी का रसूख बरकरार है। सत्ता और कारोबारी प्रतिष्ठïान के शीर्ष पर बैठे लोगों की सोच भी इसके लिए जिम्मेदार है। शिक्षा एवं रोजगार में तकनीक की बढ़ती अहमियत हिंदी की राह में एक बड़ी बाधा है और इस चुनौती से अगर हिंदी पार पा लेती है तो संभावनाओं का पूरा समंदर उसके लिए ही है।
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