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सिनेमा: बड़े परदे पर जगह बनाते छोटे शहर

संदीप कुमार /  September 13, 2019

बरेली की बर्फी, लुका-छिपी, बद्री की दुल्हनिया, स्त्री, निल बटे सन्नाटा, अनारकली ऑफ आरा, रिवॉल्वर रानी, दम लगा के हइशा, पटाखा, मसान, आर्टिकल 15... इन हिंदी फिल्मों की कथावस्तु अलग-अलग है, लेकिन एक बात इन सबको जोड़ती है। इन फिल्मों में बरेली, मथुरा, झांसी, आगरा, आरा और हरिद्वार जैसे ङ्क्षहदी भाषी क्षेत्रों के छोटे और मझोले शहर केंद्रीय भूमिका में हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि इन फिल्मों में ये शहर केवल संदर्भ के रूप में नहीं आते बल्कि अपनी बोली, पहनावे और अपने खांटी मिजाज-माहौल के साथ अवतरित होते हैं। एक वक्त था जब हिंदी फिल्मों की कहानियां या तो महानगरों पर आधारित होती थीं या फिर उनमें किसी दूसरे देश का चित्रण देखने को मिलता था। तो अचानक ऐसा क्या हुआ कि हिंदी फिल्मकारों का ध्यान छोटे शहरों की ओर हुआ? 

 
छोटे शहर-बड़ी भूमिका
 
बरेली की बर्फी और रिवॉल्वर रानी जैसी छोटे शहरों पर आधारित फिल्मों में गीत लिख चुके गीतकार पुनीत शर्मा कहते हैं, 'एक दौर था जब हिंदी फिल्मों में विदेशी जगहें छाई रहती थीं। उस दौर में इन फिल्मों के किरदार भी अनिवासी भारतीय हुआ करते थे। जाहिर है कि उन फिल्मों के लक्षित दर्शक वर्ग की वजह से ही ऐसा था। उदारीकरण के बाद छोटे शहरों में मल्टीप्लेक्स बढ़े, फिल्मों को यहां से होने वाली आय बढ़ी और ये शहर ही कहानी के केंद्र में आते गए। कुल मिलाकर यह बाजार की मांग थी।'
 
पुनीत कहते हैं कि फिल्मों में काल्पनिक कथानक की जगह वास्तविक कहानियों की बढ़ती जगह भी उन्हें छोटे शहर-कस्बों की ओर जाने पर मजबूर कर रही है क्योंकि असली भारत वही है। वही भारत ज्यादा घटना प्रधान भी है। सिने जगत में हिंदी फिल्मों की बढ़ती धमक की एक और वजह है देश के छोटे शहरों से पटकथा लेखकों, निर्देशकों और गीतकारों की नई पौध का मुंबई में अपना मुकाम बनाना। ये नए फिल्मकार अपने अनुभवों और आसपास की कहानियों को नए ढंग से कहते हैं। इससे सिनेमा की एकरसता टूटी और इन्हें हाथोहाथ लिया गया। पुनीत खुद भी मध्य प्रदेश के इंदौर शहर से ताल्लुक रखते हैं। उनके अलावा गौरव सोलंकी, हुसैन हैदरी, अभिषेक चौबे, पीयूष मिश्रा जैसे कई नाम हैं, जो छोटे शहरों से निकलकर फिल्मी दुनिया में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं।
 
लेकिन क्या छोटे शहरों में पले-बढ़े फिल्मकार ही अपने शहरों की कहानियां कह रहे हैं? ऐसा नहीं है, बल्कि बड़े शहरों के फिल्मकार भी छोटे शहरों का रुख कर रहे हैं। इसकी दो वजहें हैं: एक तो इन इलाकों की कहानी अभी बहुत कम कही गई है और उसमें नयापन है, दूसरा इन इलाकों की बढ़ी क्रय शक्ति ने बाजार को इस बात के लिए प्रेरित किया है कि वह इन्हें किसी न किसी तरह अपने साथ जोड़े। इन फिल्मों की सफलता ने इस मिथक को भी तोड़ दिया है कि हिंदी फिल्म तभी कमाई कर सकती है जब उसमें बड़े सितारों के साथ-साथ विदेशों की लोकेशन और भव्य सेट हों। ध्यान रहे कि आदित्य चोपड़ा और करण जौहर की फिल्मों का भारत, इस भारत से कोसों दूर है जो हमें आज हिंदी सिनेमा में देखने को मिल रहा है। इन छोटे और मझोले शहरों का जिक्र इसलिए भी अहम है क्योंकि सिनेमाई परदे से ये शहर सिरे से नदारद थे। हिंदी सिनेमा ने नकली ही सही गांवों का रुख किया था, लेकिन वह छोटे शहर कस्बों तक इससे पहले कभी नहीं गया। ये गांव भी वास्तविक नहीं होते थे बल्कि उनका निर्माण बकायदा सेट लगाकर किया जाता था।
 
किरदारों और कथ्य की विविधता
 
जाहिर है, छोटे शहरों में बिखरे पड़े जीवन के विविध रंग इन फिल्मों के किरदारों में भी नजर आते हैं। इन फिल्मों के नायक-नायिकाएं कहीं कपड़े सिलने वाले दर्जी हैं तो कहीं साड़ी की दुकान के सेल्समैन, कहीं वे किसी स्थानीय चैनल के स्ट्रिंगर यानी मामूली से पत्रकार हैं तो कहीं कस्बे की नर्तकी। इन फिल्मों में भाषा को बरतने का ढंग भी बदला है। याद रहे, लंबे समय तक हिंदी फिल्मों के हास्य कलाकार या तो दक्षिण भारतीय शैली में बात करते थे या भोजपुरी मिश्रित हिंदी बोला करते थे। लेकिन दंगल, तनु वेड्स मनु रिटन्र्स में बोली जाने वाली हरयाणवी, अनारकली ऑफ आरा की भोजपुरी इस मिथक को तोड़ती हैं और यहां भाषा एक जरूरी किरदार के रूप में सामने आती है। 
 
ये फिल्में अपने मूल कथ्य के साथ-साथ समकालीन शहर कस्बों की चुनौतियों को भी उजागर करती हैं। कह सकते हैं कि इन फिल्मों में हमारे शहर बिना किसी रंग-रोगन के जैसे हैं वैसे ही नजर आ रहे हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि छोटे शहर फिल्मों में केवल सेट के माध्यम से नजर नहीं आ रहे हैं बल्कि इन शहरों में फिल्मों की शूटिंग भी बढ़ी है। हाल के वर्षों में भोपाल, लखनऊ, बनारस जैसे शहरों में बहुत बड़ी तादाद में हिंदी फिल्मों की शूटिंग हुई है।
 
स्थानीय युवाओं को प्रेरणा
 
इन फिल्मों का स्थानीय लोगों पर कई स्तरों पर असर पड़ता है। पहली बात तो यह कि इन फिल्मों की शूटिंग लोगों के लिए कई तरह के रोजगार लेकर आती है। रंगमंच और अभिनय से जुड़े कई युवाओं को इन फिल्मों में काम भी मिलता है। दूसरा और बड़ा असर यह है कि ये फिल्में इन छोटे शहरों के युवाओं के अरमानों को पंख लगाने का काम करती हैं, उनकी प्रेरणा बनती हैं। यह कहा जा सकता है कि छोटे शहरों के हिंदी सिनेमा के केंद्र में आने का लाभ फिल्मकार, बाजार और छोटे शहरों के युवा एवं कलाकार सभी को मिल रहा है। यह सभी के लिए फायदे का सौदा है।
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