बिजनेस स्टैंडर्ड - कृत्रिम मेधा से बदल रहा समाचार का कारोबार
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कृत्रिम मेधा से बदल रहा समाचार का कारोबार

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  September 13, 2019

अगर तकनीक ने समाचारों के व्यवसाय के सामने समस्याएं पैदा की हैं तो क्या इनके उपाय के लिए भी तकनीक का ही सहारा लिया जा सकता है? जब हम एनडीटीवी के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी विक्रम चंद्रा के नए स्टार्टअप एडिटरजी टेक्नोलजीज प्राइवेट लिमिटेड को देखते हैं तो यह सवाल अनायास ही मन में उठ खड़ा होता है। कृत्रिम मेधा यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) तकनीक पर आधारित 10 महीने पहले शुरू किया गया यह ऐप खबरों को वीडियो स्वरूप में पेश करता है। चंद्रा बताते हैं कि ऐप की पहुंच 1.5 करोड़ लोगों तक है जिनमें से 10 लाख लोगों ने ऐप को प्ले स्टोर से डाउनलोड किया तो वहीं शेष संख्या मोबाइल पर सेवा देने वाली कंपनियों के जरिये बढ़ी। इसके लिए एयरटेल, पैनासोनिक के अलावा ट्विटर, शेयरचैट आदि के साथ रणनीतिक भागीदारी की जा रही है। एडिटरजी में शामिल अनुभवी संपादक एएनआई, एएफपी और एपी जैसी समाचार एजेंसियों से खबरों का चयन करते हैं। ऐप पर प्रत्येक खबर 20 सेकंड के वीडियो स्वरूप में होती है और इसके बाद अगला वीडियो दिखाई देने लगता है। हालांकि प्लेटफॉर्म पर 2-3 मिनट का विश्लेषण करने वाले वीडियो भी मौजूद हैं लेकिन इनमें भी अपनी कोई राय नहीं होती। हम अपनी पसंद के हिसाब से खबरों का चयन कर सकते हैं और आगे इसी पसंद-नापसंद के आधार पर खबरें हमारे सामने आने लगती हैं। जैसे ही किसी वीडियो को ऐप पर डाला जाता है, एआई उसकी जानकारी सहेज लेता है और आपकी पसंद के हिसाब से उसे वरीयता क्रम में रखता है। आपके स्थान, क्षेत्र विशेष की वीडियो में रुचि और खोज के आधार पर ऐप खबरों के क्रम को चुनता है। 

 
इसी के साथ हम शुरुआत में पूछे जा रहे सवाल की ओर लौट चलते हैं। एआई तकनीक से पहले के समय में हम किसी विषय पर अलग-अलग मतों को पढ़ते थे। आज तकनीक के काल में एल्गोरिद्म लोगों को विचारधारा के एक कठघरे में बंद कर देता है। इसके कारण मुख्यधारा के मीडिया के लिए विश्वसनीयता और जीविका का संकट पैदा हो गया है। टेलीविजन पर खबरें विज्ञापन बनती जा रही हैं और इसके चलते व्युअरशिप का महत्त्व लगातार घटता जा रहा है। अखबार और कुछ गिनी चुनी वेबसाइट फिलहाल वास्तविक पत्रकारिता कर रही हैं। 
 
जमीनी स्तर पर अगर बात करें तो अच्छी गुणवत्ता वाली पत्रकारिता काफी खर्चीली और तेजी से बढ़ते ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के समय में लगभग नामुमकिन है। इसके चलते आज गूगल और फेसबुक द्वारपाल की तरह बन गए हैं और पूरे विश्व में डिजिटल माध्यम के विज्ञापन कारोबार में इनकी तीन चौथाई हिस्सेदारी है। बिज़नेस स्टैंडर्ड में लिखे गए एक लेख को शायद 10 लाख पाठक पढ़ें लेकिन यह इनमें से केवल 10-20 प्रतिशत पाठकों से ही पैसा कमाता है। फाइनैंशियल टाइम्स के मुख्य कार्याधिकारी जॉन रिडिंग कहते हैं, 'जिस तरह से गूगल, फेसबुक प्लेटफॉर्म परिचालन कर रहे हैं, ऐसे में खुद को बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है। सब कुछ एल्गोरिद्म को तैयार करने पर निर्भर करता है। अगर इन्हें समय, तेजी और पहुंच के आधार पर तैयार किया जाता है तो वे सनसनीखेज जानकारी फैलाने का काम करते हैं और लोगों को उत्तेजित करते हैं।'
 
विभिन्न देशों में मौजूद फर्जी खबरों की फैक्टरियां रोबोट केंद्रित एल्गोरिद्म आधारित व्यवस्था पर निर्भर हैं। 'हिलेरी क्लिंटन कातिल हैं' जैसे शीर्षक वाली तथा मात्र कल्पनाओं पर आधारित खबरें लाखों अमेरिकियों द्वारा पढ़ी जाती हैं और वेल्स, मैसेडोनिया में बैठी युवाओं की फौज के लिए धन का इंतजाम करती हैं। भारत में ट्विटर, फेसबुक और सबसे महत्त्वपूर्ण व्हाट्सऐप पर इतिहास, समाज और राजनीति का फर्जी स्वरूप फैलाने के लिए इसी तरीके का सहारा लिया जाता है। तो क्या एडिटरजी भी एआई समर्थित इसी तरह का एक वातावरण तैयार करता है? खबरों को व्यक्तिगत तरीके से प्रबंधित करने का अर्थ होगा वैचारिक स्तर पर एक तरह के माहौल में बंध जाना। चंद्रा इस बारे में काफी स्पष्ट हैं कि एडिटरजी ऐसा नहीं करेगा। कंपनी के 75 सदस्यीय स्टाफ में 60 कर्मी खबरों पर काम करते हैं। वह कहते हैं, 'यह मानव-मशीन युक्त हाइब्रिड ऐप है जो दर्शकों के लिए लाभदायक होगा।' वह इस बात पर काफी जोर देते हैं। उदाहरण के लिए अगर आप मेरी तरह खेल की खबरों में रुचि नहीं रखते हैं तब भी यह समय समय पर खेल संंबधी बड़ी खबरें आपको दिखाएगा। 
 
वह कहते हैं, 'गूगल के मुख्य कार्याधिकारी सुंदर पिचाई ने एक बार मुझसे कहा था कि एआई केवल तभी काम करेगा जब लोग इसका उपयोग अपने कारोबार में अहम परिवर्तन के लिए करेंगे। मैं खबरों के कारोबार में आमूलचूल परिवर्तन का प्रयास कर रहा हूं। हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है, न कोई चैनल, न ही वेबसाइट। यहां तक कि हमें इस बात में भी कोई दिलचस्पी नहीं है कि एडिटरजी ऐप के तौर पर स्वयं क्या कर सकता है। यह हमारा मुख्य उद्देश्य नहीं है। मैं वास्तव में खबरों की दुनिया में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन करना चाहता हूं।' कंपनी ने कई पेटेंट पंजीकृत कराए हैं। बिना किसी पक्षपात या राय के वीडियो आधारित खबरें उपलब्ध कराने के लिए इस तरह की तकनीक का उपयोग फायदेमंद होगा।  अगर भारतीय जोर जोर से चिल्लाते समाचार चैनलों या व्हाट्सऐप के दुर्भावनापूर्ण मेसेज के बजाय विशुद्ध तौर पर खबर आधारित वीडियो पर भरोसा करना शुरू कर देंगे तो तकनीक मीडिया उद्योग की नई शुरुआत में काफी मददगार साबित होगी। 
Keyword: AI, google, NDTV, play store, apps,,
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