बिजनेस स्टैंडर्ड - शहरी जल प्रबंधन में देश की बड़ी चुनौती
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, September 17, 2019 12:28 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

शहरी जल प्रबंधन में देश की बड़ी चुनौती

मिहिर शाह /  September 13, 2019

भारत के शहरों में रहने वाले लोगों की संख्या 2050 तक 80 करोड़ हो जाने का अनुमान है। इतने लोगों को साफ पेयजल मुहैया कराना सरकार के लिए बड़ी चुनौती होगी। बता रहे हैं मिहिर शाह

 
मेरा सुविचारित मत है कि शहरी जल आपूर्ति की समस्याएं भारत के लिए अब तक खड़ी हुई सबसे मुश्किल चुनौती होने जा रही है। शहरी भारत में रहने वाले लोगों की संख्या वर्ष 2050 तक करीब 80 करोड़ हो जाने का अनुमान है। लेकिन एक बड़ी शहरी आबादी के लिए साफ पेयजल हासिल कर पाना पहले ही बड़ी चुनौती बन चुकी है। शहरी जलापूर्ति की इस पहेली के चार अनूठे अवयव हैं। पहला, अपशिष्ट जल की समस्या। भारत के शहर रोजाना करीब 4,000 करोड़ लीटर सीवेज जल पैदा करते हैं और इसका बमुश्किल 20 फीसदी हिस्सा ही शोधित होता है। केवल 33 फीसदी शहरी भारतीय ही पाइपयुक्त सीवर प्रणाली से जुड़े हैं और मोटे तौर पर पांच करोड़ लोग अब भी खुले में शौच जाते हैं। देश भर में केवल 30 फीसदी अवशिष्टों के ही शोधन की क्षमता स्थापित हुई है। देश के कुल सीवेज का करीब 17 फीसदी पैदा करने वाले दो शहरों- दिल्ली और मुंबई में ही कुल शोधन क्षमता का 40 फीसदी स्थित है। इसका परिणाम यह हुआ है कि शहरी इलाकों से होकर बहने वाली नदियों और झीलों में सीवेज और गैर-शोधित पानी गिरता है। इस वजह से भूमिगत जल भी दूषित हो रहा है। तमाम स्रोतों के दूषित होने से पानी में जहरीले रसायनों और अवशिष्टों की मात्रा बढ़ती जा रही है। 
 
दूसरा, बिना आंकड़े वाला भूमिगत जल। देश के 71 शहरों एवं कस्बों में औसतन 48 फीसदी जलापूर्ति भूमिगत स्रोत से ही होती है। बड़े महानगरों और पहले एवं दूसरे दर्जे के शहरों में से 56 फीसदी इलाके भूमिगत जल पर या तो पूरी तरह या फिर आंशिक तौर पर निर्भर हैं। इस भूजल ने सार्वजनिक जल आपूर्ति की खामियां भरने का काम किया है। लेकिन इसकी वजह से जलवाही स्तर दूषित होने के साथ उसमें गिरावट भी आई है। तीसरा, शहरों की जरूरत पूरा करने के लिए दूर से लाए गए पानी पर निर्भरता जिसमें अधिक पूंजी और ऊर्जा लागत लगती है। और चौथा, बहिष्करण की समस्या। शहरों के बड़े हिस्सों में अभी तक सीवेज प्रणाली नहीं पहुंच पाई है क्योंकि उन्हें अनधिकृत बस्तियां माना जाता है। उन इलाकों में पाइप से पेयजल पहुंचाने की सुविधा भी नहीं है। हालांकि अच्छी खबर यह है कि इनमें से हरेक अवयव हमें 21वीं सदी के समाधान निकालने के लिए हमें सक्षम भी बनाता है। ऐसे समाधान 20वीं सदी के मध्य में अपनाए गए खर्चीले एवं अव्यवहार्य विकल्पों से आगे बढऩे की राह तैयार करेंगे।
 
जलापूर्ति की योजना बनाते समय शहरों को पहली प्राथमिकता परंपरागत जल स्रोतों के संरक्षण, उनके जीर्णोद्धार और पुनर्भरण की व्यवस्था करनी होनी चाहिए। शहरों को जल परियोजनाओं के लिए फंड केवल तभी दिया जाए जब वे स्थानीय झीलों एवं तालाबों से जल आपूर्ति का इंतजाम कर रहे हों। इससे दूर से पानी लाए जाने पर होने वाली बड़ी लागत कम हो सकेगी, समावेशन बढ़ेगा और उस शहर की पारिस्थितिकी को भी सहेजकर रखा जा सकेगा। इसके साथ ही उन जगहों की पारिस्थितिकी को भी संरक्षित रखने में मदद मिलेगी जहां से पानी लाए जाने की योजना है।
 
दूसरा, समावेशन एवं संवहनीयता के लिए शहरी भारत की एक भूजल प्रबंधन योजना लाने की जरूरत है जिसमें कस्बों एवं शहरों के जलस्रोतों की विविधता कायम रखने का ध्यान रखा जाए। इस दिशा में पहले कदम के तौर पर मैंने देश में भूजल के अग्रणी विद्वान हिमांशु कुलकर्णी के साथ मिलकर 150 शहरों एवं कस्बों को छह गुणा चार के पैमाने पर वर्गीकृत करने की कोशिश की है। यह पैमाना शहरी विस्तार के चरण (चार चरण) और वहां जलवाही स्तर की किस्मों (छह प्रकार) पर आधारित है। हम यह भी देखते हैं कि शहरी जल की समस्या दूर करने के लिए अपनाई गई रणनीति को पैमाने के सभी 24 प्रकोष्ठों के लिए अलग करने की जरूरत होगी।
 
इस विविधता से परे कुछ साझा तत्त्व भी हैं। पहला, भागीदारी व्यवस्था के जरिये मौजूदा भूजल संसाधनों की स्थिति का आकलन हो। दूसरा, प्राकृतिक रूप से रिचार्ज एवं डिस्चार्ज होने वाले क्षेत्रों की पहचान, पानी को दूसरी जगह ले जाने एवं उसके भंडारण की क्षमता बढ़ाने के साथ भूजल की गुणवत्ता का आकलन हो। तीसरा, पानी का उपयोग करने वालों, टैंकर ऑपरेटरों और ड्रिलिंग एजेंसियों जैसे सभी हितधारकों एवं उनके जल स्रोतों को दर्ज किया जाए। चौथा, कचरा-निपटान, सीवेज एवं कूड़ा-कचरा प्रबंधन और सीवरेज एवं सीवेज-शोधन प्रणालियों के विकास में जल-भूविज्ञान का इस्तेमाल हो। पांचवां, शहरी भूजल उपयोग एवं शहरी जलभंडारों के संरक्षण से संबंधित नियामकीय मानकों का मसौदा बनाया जाए। छठा, जलभंडार प्रणालियों एवं शहर से होकर बहने वाली नदियों के बीच संबंध को समझा जाए। और सातवां, जलभंडारों के प्रबंधन के लिए एक संस्थागत ढांचा तैयार किया जाए।
 
शायद शहरी जलापूर्ति परियोजनाओं से मिलने वाली सबसे अहम सीख यही है कि पानी एवं अवशिष्ट जल दोनों मामलों में एक साथ निपटना जरूरी है। अधिकांश शहरों में बस्तियां भूमिगत सीवरेज ढांचे के बगैर बनती गई हैं। पहले से बस चुके भीड़भरे इलाकों में सीवेज लाइन बिछाना काफी मुश्किल काम है। यह चुनौती इस बात से और बढ़ जाती है कि पहले बिछ चुकी सीवर लाइन भी निर्माण एवं सड़कों के नीचे दब चुकी हैं, टूट चुकी हैं या जाम पड़ी हुई हैं। विकेंद्रित और सचल अवशिष्ट जल प्रबंधन प्रणालियों के जरिये इनमें से कई समस्याएं दूर की जा सकती हैं। वंचित इलाकों में भी सीवेज सुविधा पहुंचाने, जलशोधन की लागत कम करने, भूमि उपयोग पर आधारित क्षेत्र-विशेष की शोधन तकनीक आजमाने और भूमि जरूरत को न्यूनतम करने के उपाय किए जा सकते हैं।
 
हमें पर्यावरण-वद्र्धक, कम लागत वाली नवीनतम तकनीकें अपनाने की भी जरूरत हैं। भारतीय शहरी ढांचा एवं सेवाओं पर गठित उच्चाधिकार प्राप्त विशेषज्ञ समिति की 2011 में आई रिपोर्ट ने देश भर में परंपरागत जलापूर्ति एवं सीवरेज निदान पर अगले 20 वर्षों में 5.6 लाख करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान लगाया था। लेकिन अपनी निवारक लागत के अलावा ये तकनीकें प्रदूषण के गैर-जरूरी स्रोतों के खिलाफ असरदार नहीं रह गई हैं। इनमें बिजली की भी बड़ी जरूरत होती है। एक अनुमान के मुताबिक पुणे में ही परंपरागत सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट के लिए रोजाना करीब 3,000 मेगावाट बिजली की जरूरत होगी। इस तरह वैकल्पिक प्रकृति-आधारित तकनीकी विकल्पों पर गौर करने की तत्काल जरूरत है। इन तकनीकों का अब जमीनी स्तर पर परीक्षण हो चुका है। नब्बे के दशक में कारखानों और घरों से निकलने वाले ऊध्र्वाधर पर्यावरण-निस्यंदन तकनीक विकसित हुई थीं। इन खोजों से उद्योगों की परिचालन लागत में खासी कमी आई थी क्योंकि बिजली उपभोग कम हो गया और रसायनों एवं मानवश्रम की जरूरत कम हो गई। समय के साथ ऊध्र्वाधर निस्यंदन तकनीक को क्षैतिज निस्यंदन तकनीक या ग्रीन-ब्रिज सिस्टम में तब्दील कर दिया गया जिसका कई जगहों पर सफल परीक्षण किया जा रहा है। मिलिट्री इंजीनियरिंग कॉलेज पुणे में अवशिष्ट जल निपटान, उदयपुर की अहार नदी में गिरने वाले दूषित जल के शोधन, सतलज नदी के बूढ़ा नाले में प्रवाह बनाना और इलाहाबाद में गंगा नदी के रसूलाबाद घाट में यह तकनीक अपनाई जा चुकी है। 
 
हमें शहरी जल प्रबंधन में यही रास्ते अपनाने होंगे। स्थानीय शहरी निकायों के नेतृत्व में क्षमता बढ़ाने के प्रयास होने चाहिए। ऐसा रवैया सुदूर जल स्रोतों पर निर्भरता कम करने, वित्तीय एवं ऊर्जा लागत कम करने, समानता, समावेशन एवं संवहनीयता बढ़ाने जबकि अपने कस्बों एवं शहरों को रहने लायक बनाने में मददगार हो सकता है। 
 
(लेखक शिव नाडर यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और योजना आयोग के पूर्व सदस्य हैं)
Keyword: urban, city, water, management,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 सऊदी अरब में उत्पादन बाधित होने से घरेलू बाजार में बढ़ेंगे तेल के दाम?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.