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दमदार दलील

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  September 13, 2019

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भले ही अपने बयान के बाद चुटकुलों का केंद्र बन गई हों लेकिन उनकी इस बात में दम है कि ऐप आधारित टैक्सी सेवाएं कार की मांग को प्रभावित कर रही हैं। जानकारी के मुताबिक ओला और उबर देश भर में रोजाना 20 लाख फेरे लगाती हैं। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि हर रोज करीब 5 लाख लोग बिना निजी कार के आवागमन करते हैं। ये अचानक सफर करने वाले यात्री नहीं हैं। मेट्रो सेवा के विस्तार को इससे जोड़कर देखें तो दिल्ली मेट्रो हर रोज 25 लाख लोगों को आवागमन कराती है, ऐसे में लोगों के पास अंतिम विकल्प कार के रूप में बचा है। सिटी बस व्यवस्था जो दिल्ली में 40 लाख लोगों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है, वह कोई विकल्प थी ही नहीं क्योंकि यह सेवा बहुत धीमी है।

 
हर कोई ऐप के माध्यम से टैक्सी बुक नहीं कर सकता। देश के शहरों के अधिकांश यात्री गरीब हैं और मुंबई जैसे अपवाद को छोड़ दिया जाए तो वे काम पर पैदल या साइकिल से जाते हैं। जैसे ही आप आय के क्रम में आगे बढ़ते हैं आप बस का टिकट खरीदने में सक्षम हो जाते हैं, मेट्रो रेल और ऑटो रिक्शा तथा मोटर बाइक जैसे साधन मध्यम वर्ग के लिए हैं। ओला और उबर हालांकि पीली छत वाली और निजी टैक्सियों से सस्ती हैं लेकिन फिर भी ये महंगी हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐप आधारित टैक्सी की सेवा लेने वाले संभावित कार खरीदार हो सकते हैं। परंतु मौजूदा आर्थिक परिदृश्य में आय और करियर की अनिश्चितताओं के बीच तमाम युवा कार खरीदने से बचते हैं। वित्त मंत्री ने यही कहा। परंतु ऐसा भी नहीं है कि कार की मांग में यह गिरावट केवल ऐेप आधारित टैक्सियों की बदौलत है। कुछ अन्य कारक भी हैं। आम आर्थिक मंदी, वित्तीय क्षेत्र की समस्याएं जिन्होंने कार ऋण को प्रभावित किया है, कई संभावित ग्राहकों का अगले अप्रैल से लागू हो रहे सख्त उत्सर्जन मानकों के लिए प्रतीक्षा करना आदि। उद्योग जगत ने डीलरों पर अधिक से अधिक वाहन भंडारित करने का दबाव बनाकर अपनी मुसीबत और बढ़ा ली। डीलरों को नए ऑर्डर देने के पहले पुराने वाहनों की बिक्री करनी होगी। इस बीच की अवधि में डीलरों को कार बेचने में आई गिरावट को बढ़ाचढ़ाकर बताया जा रहा है जबकि हकीकत में ऐसा ही हुआ है। इनमें से कुछ कारक तो अत्यंत विशिष्टï और अस्थायी हैं। 
 
यही कारण है कि किसी अन्य उत्पाद क्षेत्र में मांग में इस कदर गिरावट नहीं आ रही है। लोगों को कार पर लगने वाले करों में कटौती की भी उम्मीद है। इसने भी खरीद के निर्णय को प्रभावित किया है। ऐप आधारित टैक्सियों की अपनी समस्याएं हैं। इनसे यातायात या वायु प्रदूषण की समस्या कम नहीं होती है क्योंकि ये कारें दिन रात सड़कों पर चलती हैं। यही कारण है कि पश्चिमी दुनिया के देश ऐसी टैक्सियों की संख्या पर लगाम लगाने पर विचार कर रहे हैं। गुरुग्राम के बारे में ही सोचिए जहां मेट्रो के अलावा देश के तमाम अन्य छोटे शहरों की तरह ही सार्वजनिक यातायात की कोई व्यवस्था नहीं है। ऐप आधारित टैक्सी वहां ऐसेे तमाम लोगों की मददगार साबित हो रही हैं जो शायद इनके अभाव में कार खरीद लेते। इन परिवारों में प्राय: एक अन्य कार रहती ही है। परंतु मामला केवल कार तक सीमित नहीं है।
 
हमारे देश में लंबे समय तक सार्वजनिक परिवहन को परे रख वाहन उद्योग और कार स्वामित्व को बेहतर माना जाता रहा। याद करिए कैसे पैदल चलने वालों और साइकिल चलाने वालों के लिए जगह और लेन की कमी रही जबकि किसी भी सभ्य शहर में यह होना चाहिए। हमें अपने मार्गों को अधिक लोकतांत्रिक बनाना होगा और सार्वजनिक बसों में निवेश करना होगा जो मेट्रो से सस्ती हैं। मुश्किल दौर से गुजर रही कार निर्माता कंपनियों के साथ सहानुभूति के बावजूद यह स्पष्टï है कि वे मौके का फायदा उठाकर सरकार से कर राहत चाहती हैं जबकि वह खुद राजस्व की कमी से जूझ रही है। हालात को समझने के लिए मारुति की वित्तीय स्थिति पर नजर डालते हैं। गत वर्ष कंपनी का बिक्री पर कर पूर्व मुनाफा मार्जिन करीब 12.6 फीसदी था जबकि 36,500 करोड़ रुपये की राशि निवेश कर रखी थी। दो वर्ष के दौरान लाभांश भुगतान करीब दोगुना हो गया। बजाज ऑटो और आयशर मोटर्स जैसी कंपनियों में मुनाफा मार्जिन मारुति से बेहतर है जबकि महिंद्रा ऐंड महिंद्रा तथा अशोक लीलैंड का मार्जिन मारुति से कम है। इसके बावजूद इन सभी का मार्जिन विनिर्माण क्षेत्र से बेहतर है। अगर उद्योग जगत के दिग्गजों को लगता है कि कार की लागत ग्राहकों के लिए बहुत अधिक है तो वे कीमतें कम क्यों नहीं कर देते? बाजार की तमाम कंपनियां कीमतें आसानी से कम कर सकती हैं। 
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