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नया राजकोषीय ढांचातैयार करना जरूरी

नीलकंठ मिश्रा /  September 12, 2019

मौजूदा आर्थिक मंदी देश के वित्तीय प्रबंधन के क्षेत्र की चुनौतियों को हमारे सामने रख रही है। पहली बात, हम यह समझते हैं कि राजकोषीय घाटे के तय वार्षिक लक्ष्य का अर्थ यही है कि वह पहले से धीमी अर्थव्यवस्था को और धीमा तथा तेज अर्थव्यवस्था को और गतिमान बनाता है। यह नजर भी आने लगा है।

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गहराता आर्थिक संकट

जीडीपी के नए आंकड़ों की सबसे चिंतित करने वाली बात यह है कि नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर 8 फीसदी के साथ 17 वर्षों के न्यूनतम स्तर पर आ चुकी है। इससे पता चलता है कि अतीत के कुछ महीनों में राजस्व कर संग्रह में धीमापन क्यों रहा। इससे यह भी पता चलता है कि सरकारी व्यय को 21 फीसदी की दर से बढऩा था लेकिन फिलहाल वह 6 फीसदी की दर से विकसित हो रहा है और यह बजट लक्ष्यों से पीछे छूट सकता है। ध्यान रहे कि जून तिमाही में निजी खपत 3.1 फीसदी की दर से, निवेश 4 फीसदी की दर से और सरकारी व्यय 8.8 फीसदी की दर से बढ़ा। कर संग्रह में कमी से सरकारी व्यय में भविष्य में और अधिक धीमापन आएगा। 

तयशुदा लक्ष्य पहली पीढ़ी का राजकोषीय नियम है जो पश्चिमी यूरोप में चार दशक पहले अपनाया गया। बाद में अर्थशास्त्रियों ने इसकी कमियों को परखा, खासकर राजकोषीय लक्ष्य निर्धारित करने के लिए कोई अनुमान प्रकट करने की अक्षमता को लेकर। दूसरी पीढ़ी के राजकोषीय नियमों ने मध्यम अवधि के लक्ष्य तय किए और बचाव के प्रावधान किए। 

हमारे देश में सन 2016 में जब वित्तीय जवाबदेही एवं बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम) समीक्षा समिति बनी तो तत्कालीन वित्त मंत्री ने कहा था कि एक नया विचार आया है जो राजकोषीय घाटे के तयशुदा आंकड़ों के बजाय उसके एक दायरे को सही मानता है। 

उसने कहा कि मध्यम अवधि में ऋण-जीडीपी लक्ष्य की सहायता से सरकार के लिए मामला थोड़ा लचीला हो सकता है। उसने केंद्र के लिए मध्यम अवधि के लक्ष्य हासिल करने के लिए 2023 तक का समय तय किया है। वृद्घि से जुड़े बचाव संबंधी प्रावधान में जीडीपी के आधा प्रतिशत को राजकोषीय घाटे के मामले में अतिरिक्त बफर माना गया है। यह तभी उत्प्रेरित होगी जब वास्तविक उत्पादन वृद्घि में गिरावट आएगी और वह पिछली चार तिमाहियों के औसत से करीब 3 फीसदी नीचे जाएगी। पहली तिमाही में 5 फीसदी की वृद्घि, गत वर्ष की पहली तिमाही के 8 फीसदी के स्तर से पूरा 3 फीसदी कम है लेकिन यह बीती चार तिमाहियों की औसत वृद्घि दर से केवल 1.8 फीसदी कम है। जाहिर है सरकार के पास राजकोषीय मोर्चे पर ज्यादा गुंजाइश नहीं है। 

बॉन्ड बाजार को स्थिर बनाना भी इससे जुड़ा हुआ है। सरकार को आशंका है कि राजकोषीय विचलन का संकेत मिलते ही बाजार में सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में इजाफा होगा। इससे निजी क्षेत्र की उधार लागत बढ़ेगी। टर्म प्रीमियम अर्थात आरबीआई द्वारा तय रीपो दर और 10 वर्ष के सरकारी बॉन्ड प्रतिफल के बीच का अंतर पहले ही बढ़ा हुआ है। करीब 110 आधार अंक के साथ यह 60 की औसत से बहुत अधिक है। 

बाजार पर्यवेक्षकों का कहना है कि यह राजकोषीय तनाव और सरकार की अतिशय बजटेतर उधारी को दर्शाता है। परंतु हमारी दृष्टि में यह एक घटित हो चुकी घटना को उचित ठहराने के समान है। कुछ ही बॉन्ड बाजार ऐसे हैं जो इतने मामूली राजकोषीय विचलन की दृष्टिï से संवेदनशील होंगे। यहां तक कि बाजार केंद्रीय बैंक की निरंतर खरीद से विसंगति में नहीं आए हैं। यदि मांग और आपूर्ति टर्म प्रीमियम में इजाफा कर रहे होते तो इनमें काफी पहले गिरावट आ चुकी होती। आरबीआई की वार्षिक बॉन्ड खरीद एक वर्ष पहले जताए गए तमाम अनुमानों की तुलना में अधिक रही है। हमारी नजर में वृद्घि और मुद्रास्फीति की दरों को लेकर सहमति बनेगी तो यह अपने आप ठीक हो जाएगा। परंतु तयशुदा दरों की व्यवस्था को ठीक करना आवश्यक है। 

तीसरा मुद्दा है राजकोषीय कारकों के जरिये वृद्घि प्रबंधन के लिए केंद्र सरकार पर अत्यधिक निर्भरता। खासतौर पर राजकोषीय घाटे का अनुपात तय होने के बाद विवेकाधीन व्यय की सीमित गुंजाइश के बाद। करों में कमी का असर राज्यों पर भी पड़ता है। मोटे तौर पर ऐसा इसलिए क्योंकि कुल केंद्रीय करों का 42 फीसदी सीधे राज्यों को जाता है। बहरहाल, कमजोर जीएसटी संग्रह का प्रत्यक्ष असर उतना ज्यादा नहीं रहा है क्योंकि केंद्र सरकार जीएसटी लागू होने के शुरुआती पांच साल तक कर राजस्व में 14 फीसदी की वृद्घि की गारंटी दी है। ऐसे में जीएसटी में कमी का बोझ सरकार उठाएगी और राज्य अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में हैं। जीएसटी के आंकड़ों के मुताबिक जून और जुलाई महीने में राज्यों को जीएसटी में 28,000 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति दी गई। पूरे वर्ष में यह राशि 1.7 लाख करोड़ रुपये होगी यानी 1.1 लाख करोड़ रुपये के अनुमाति क्षतिपूर्ति उपकर से अधिक। 

यह दोहराना आवश्यक है कि अब राज्य सरकारें मिलकर केंद्र से 90 फीसदी अधिक व्यय करती हैं। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष डॉक्टर विवेक देवरॉय ने एक विचार पेश किया है जिसे लागू करने का वक्त आ चुका है। उन्होंने एक संस्था बनाने की बात कही जहां केंद्र और राज्य मिलकर सार्वजनिक व्यय की योजना बनाएं। केंद्र समर्थित योजनाओं की संख्या को देखते हुए उनकी काफी आलोचना की जाती रही है, जबकि केंद्र उन क्षेत्रों में परियोजनाओं की शुरुआत करता है जो संवैधानिक रूप से राज्य सूची में हैं। ग्रामीण आवास और स्वास्थ्य इसके उदाहरण हैं। वह इन योजनाओं के लिए राज्यों से आंशिक अंशदान मांगता है। ऐसा मंच न केवल केंद्र और राज्यों को लंबी अवधि के लक्ष्यों मसलन शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य कौशल, अथवा सड़क आदि में मदद करता है बल्कि धीमी वृद्घि दर के असर पर यह उपलब्ध राजकोषीय विकल्पों में भी इजाफा करता है। ये विकल्प अर्थव्यवस्था को गति देने में मदद करते हैं। या कम से कम मंदी के असर को और बुरा होने से बचाते हैं। 

संकट के समय में नीतिगत बदलाव की संभावना बढऩे की एक वजह यह भी है कि ऐसे अवसरों पर हमारी कार्यशैली की अक्षमता, सामान्य दिनों की तुलना में अधिक स्पष्टï होकर सामने आती है। ऐसी अवधि को अवसर मानना चाहिए और इस दौरान ऐसे ढांचागत सुधार करने चाहिए जो अर्थव्यवस्था को वृद्घि के अगले चरण की ओर ले जाएं।
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