बिजनेस स्टैंडर्ड - कुपोषण से जंग
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कुपोषण से जंग

संपादकीय /  September 12, 2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम 'मन की बात' में कहा कि कुपोषण के खिलाफ आंदोलन तेज कर एक बड़ा जनांदोलन खड़ा करने की बारी है। उनकी यह बात सुविचारित है और इसकी गहन आवश्यकता है। तमाम आर्थिक प्रगति, गरीबी में कमी, अतिशय खाद्यान्न उत्पादन और सरकार द्वारा लोगों को भोजन उपलब्ध कराने की योजनाओं के बावजूद देश में कुपोषण की समस्या बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र विश्व खाद्य कार्यक्रम की 2019 की खाद्य एवं पोषण सुरक्षा विश्लेषण रिपोर्ट (2015-16 के आंकड़ों पर आधारित) की बात करें तो देश की आबादी का 38.4 फीसदी हिस्सा भीषण कुपोषण से जूझ रहा है जबकि करीब 35.7 फीसदी बच्चों का वजन सामान्य से कम है और उनमें भी 58.5 फीसदी रक्त की कमी से जूझ रहे हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि कुपोषण की समस्या गरीबों और अमीरों दोनों में विद्यमान हैं। हालांकि अमीरों में इसका स्वरूप मोटापे, पोषण के असंतुलन और इससे जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का है।

स्पष्ट है कि खाद्य सुरक्षा से जुड़ी मौजूदा पहल जिनमें भोजन का अधिकार अधिनियम और ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) आदि शामिल हैं, उनके चलते अल्प पोषण और भूख की समस्या में वांछित कमी नहीं आई है। हालांकि भूख से होने वाली मौतों में कमी आई है जबकि अतीत में यह आम हुआ करती थीं। वृद्घि में धीमापन, कम वजन, मस्तिष्क का अपर्याप्त विकास और कमजोर प्रतिरक्षा जैसी समस्याएं अपूर्ण, असंतुलित और अपर्याप्त पोषण की प्रमुख निशानी हैं। देश में श्रम की कम उत्पादकता के लिए भी काफी हद तक कुपोषण को जिम्मेदार माना जाता है।

सरकार ने मार्च 2018 में राष्ट्रीय पोषण अभियान की शुरुआत की थी। इसका लक्ष्य बच्चों, बच्चियों और महिलाओं में कम वजन और लंबाई न बढऩे, अल्प पोषण और रक्ताल्पता जैसी समस्याओं में सालाना 2 से 3 फीसदी की कमी लाना था।  बाद में इस अभियान का नाम बदलकर पोषण अभियान कर दिया गया और 2022 तक कुपोषण मुक्त भारत बनाने की महती जिम्मेदारी इसे सौंप दी गई।

अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो इस महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य को हासिल कर पाना मुश्किल होगा। पोषण आधारित अधिकांश योजनाएं सीमित तरीके से काम करती हैं और एक समय में एक या कुछ ही लक्ष्यों को हासिल करने पर केंद्रित रहती हैं, बजाय कि एक साथ इसके तमाम स्रोतों पर हमला करने के। इसके अलावा उनके बीच आपस में कोई तालमेल भी नहीं है। उनके लिए आवंटित फंड अक्सर इस्तेमाल ही नहीं हो पाता। इतना ही नहीं स्कूलों में मध्याह्नï भोजन और आंगनवाड़ी में पूरक आहार समेत इनमेंं से कई योजनाएं केवल भोजन मुहैया कराने पर केंद्रित रहती हैं और उनका पोषण से कोई लेनादेना नहीं होता। 

ऐसे में कुपोषण से लडऩे की बुनियादी नीति में बदलाव लाते हुए वैज्ञानिक दृष्टिïकोण पर जोर देना चाहिए। इसका एक तरीका है सरकारी योजनाओं के तहत वितरित होने वाले भोजन में विविधता लाना। इसके लिए पोषक अनाज, अंडे, दूध, सोयाबीन उत्पादों को शामिल किया जा सकता है। अब तो गेहूं, चावल, नमक, खाद्य तेल और दूध आदि को लौह, आयोडिन, जिंक, विटामिन ए और डी जैसे जरूरी खनिजों और विटामिनों के माध्यम से बेहतर बनाने के तरीके भी आ चुके हैं। ऐसा करके भी कुपोषण से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं को दूर किया जा सकता है। ऐसी तकनीक भी आ चुकी हैं जो फसलों में ही जरूरी विटामिन या खनिज शामिल कर सकती हैं। उदाहरण के लिए गोल्डन राइस में ज्यादा विटामिन ए होता है। यह कई देशों में नेत्रहीनता दूर करने में सहायक है। भारत भी कुपोषण खत्म करने के लिए ऐसी नीतियों की मदद ले सकता है।
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