बिजनेस स्टैंडर्ड - नए खरीदारों पर भारी रीपो दर व्यवस्था
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नए खरीदारों पर भारी रीपो दर व्यवस्था

अनूप राय और अभिजित लेले / मुंबई 09 12, 2019

आवास ऋण

बिजनेस स्टैंडर्ड नए खरीदारों पर भारी रीपो दर व्यवस्थाक्या आप इस बात से खुश हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के नीतिगत रीपो दर में कटौती करते ही आपकी आवास ऋण की किस्त कम हो जाएगी? रुकिए, पहले इस बात की जांच कर लीजिए कि आप ऋण पाने के हकदार हैं या नहीं? हो सकता है कि आपका वेतन पहले जितना ही हो, लेकिन आपको पहले के मुकाबले कम कर्ज मिले।

अभी केवल भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ही रीपो दर से जुड़ा आवास ऋण दे रहा है और उसने शुरुआती वर्षों के लिए पात्रता शर्तों में भारी कमी की है। दिलचस्प बात है कि अगर ब्याज दरें यथावत रहती हैं तो आय बढ़ने से किस्त में गिरावट आती है। शुरुआती वर्षों में जब उपभोक्ता की आय कम रहती है तो किस्त ज्यादा रहती है और बाद के वर्षों में जब उपभोक्ता की आय बढ़ती है तो किस्त कम हो जाती है। 

एसबीआई के एक अधिकारी ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि अभी यही ढांचा है। बैंक 8.05 फीसदी पर ब्याज पर आवास ऋण दे रहा है। नए ढांचे के तहत बैंक ने ऋण के मूलधन की राशि को समयावधि से विभाजित किया है। इस तरह अगर कोई व्यक्ति 20 साल के लिए 30 लाख रुपये का ऋण लेता है तो मूलधन पर सालाना 1,50,000 रुपये चुकाने होंगे। यह मौजूदा व्यवस्था से बहुत अधिक है जिसमें मूलधन का हिस्सा कम है लेकिन ब्याज का हिस्सा अधिक है। चूंकि ब्याज की गणना बकाया मूलधन पर की जाती है, इसलिए शुरुआती वर्षों में ब्याज का हिस्सा भी अधिक होगा। हालांकि मौजूदा व्यवस्था में जरूरी नहीं है कि यह अधिक होगा क्योंकि बैंक पहले ब्याज वसूलते हैं जबकि मूलधन का हिस्सा कम रखते हैं। 

इस तरह रीपो से जुड़े ढांचे में शुरुआती वर्षों में किस्त मौजूदा व्यवस्था से अधिक होगी। इस तरह पहली बार संपत्ति खरीदने की मंशा रखने वाले लोगों का एक बड़ा हिस्सा इससे वंचित रह जाएगा। चूंकि मूलधन तय है और ब्याज रीपो दर में संशोधन के साथ घटता-बढ़ता रहेगा, इसलिए मासिक किस्त भी तय नहीं होगी। इसके बजाय एसबीआई और अन्य बैंक अपने ही ग्राहकों को ऋण देंगे ताकि वे सीधे उनके खातों से किस्त काट सकें। 

मौजूदा व्यवस्था में शुद्घ आय के 60 फीसदी तक ऋण दिया जाता है लेकिन रीपो से जुड़ी ऋण व्यवस्था में ग्राहक को उसकी शुद्घ आय का 40 फीसदी से भी ऋण दिया जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि पहले साल की किस्त बहुत ज्यादा होगी। सरल भाषा में कहें तो अगर पहले किसी व्यक्ति को हर महीने 60,000 रुपये की किस्त चुकाने के योग्य माना जाता था तो रीपो से जुड़ी व्यवस्था के तहत उसे केवल 40,000 रुपये की किस्त चुकाने के लायक माना जाएगा। इस तरह उसे मिलने वाली ऋण की राशि में भी गिरावट आएगी। आरबीआई के निर्देश के मुताबिक एक अक्टूबर से सभी बैंकों के लिए रीपो दर से जुडऩा अनिवार्य है। बैंकरों को आशंका है कि अगर एसबीआई की व्यवस्था मानक बनती है तो सभी के लिए आवास की सरकार की योजना बुरी तरह प्रभावित होगी।      

दिलचस्प है कि सभी बैंकों ने ऐसे समय में अपने आवास ऋण रीपो रेट से जोड़ दिए हैं जब यह पहले ही एक दशक के निचले स्तर पर है और अगले एक या दो साल में इसके ऊपर जाने की उम्मीद है। विश्लेषकों ने कहा कि यह मानते हुए कि ऋण की अवधि 20 से 30 साल की होगी, ऐसे में ग्राहक संभवत: उन्हें पेशकश की जाने वाली दर के मुकाबले ऊंची ब्याज दरों का बोझ उठाएंगे। एक वरिष्ठï ब्रोकर ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर बताया, 'मौजूदा रीपो दर से जुड़ी प्रणाली में अधिक मूलधन के भुगतान से एमोर्टाइजेशन तेजी से होगा, जिससे ऋण की अवधि के दौरान कम कम ब्याज जाएगा, वहीं गैर रीपो दरों से जुड़े आवास ऋणों पर दरों की तिमाही समीक्षा के मुकाबले ब्याज दरें तत्काल बढ़ जाती हैं। यह एक तरह से ग्राहकों के लिए झटका हो सकता है।'

अर्थशास्त्रियों को मौजूदा स्तर से रीपो दर में बहुत अधिक गिरावट की उम्मीद नहीं लग रही है और अगर महंगाई बढ़ती है तो इसमें इजाफा शुरू हो जाएगा। आरबीआई के सामने महंगाई 2 से 6 प्रतिशत के बीच रखने का लक्ष्य है और इसे नियंत्रित करने के लिए रीपी दर में बदलाव एक अहम औजार है। ऐसा नहीं है कि ग्राहक इस खास तरह की ऋण संरचना से पीछे हट जाएंगे और आवास वित्त कंपनियों से ऋण लेना शुरू कर देंगे।

आवास वित्त कंपनियां भी अपनी ब्याज दरें एक बाहरी मानक दर से जोडऩे पर विचार कर रही हैं। देश की सबसे बड़ी आवास ऋणदाता कंपनी हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनैंस कॉर्प (एचडीएफसी) के वाइस चेयरमैन केकी मिस्त्री ने एक समाचार पत्र को बताया था कि उनकी परिसंपत्ति देनदारी समिति उधारी दर एक बाहरी बेंचमार्क से जोडऩे का प्रयास करेगी। हालांकि उन्होंने कहा कि यह तभी होगा जब हम यह प्रणली अपनी देनदारी से भी मिलान करने की स्थिति में होंगे। दूसरी कंपनियां भी ऐसी योजनाएं लाने की तैयारी कर रही हैं।

एलआईसी हाउसिंग फाइनैंस के प्रबंध निदेशक एवं मुख्य कार्याधिकारी सिद्धार्थ मोहंती ने कहा कि उनकी कंपनी उधारी दर बाहरी मानक दर से जोडऩे पर विचार कर रही है। मोहंती ने कहा कि उनकी परिसंपत्ति देनदारी समिति इस पर निर्णय लेगी। उन्होंने कहा, 'इस पर निर्णय लेने से पहले हमें लागत सहित सभी बातों को ध्यान में रखना होगा। वित्तीय ढांचे में जो भी बदलाव होगी कंपनी उस हिसाब से अपनी नीति बदलेगी।' इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनैंस के एक प्रवक्ता ने कहा कि  अगले दो हफ्तों में उनकी परिसंपत्ति देनदारी समिति इस मुद्दे पर निर्णय लेगी।

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