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नियमों का करें पालन समय पर करें भुगतान

श्याम पोनप्पा /  September 11, 2019

आम लोगों के साथ सरकार को भी अपने नजरिये में बदलाव लाने की जरूरत है। औपनिवेशिक सोच से मुक्ति के बगैर नियमों का समुचित पालन नहीं हो सकता है। बता रहे हैं श्याम पोनप्पा

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उपभोक्ताओं के खर्च और अर्थव्यवस्था पर बारीक नजर के साथ भुगतान में तेजी देखने को मिली है। मीडिया रिपोर्ट एक ऐसे वाकये का जिक्र करती हैं जिसमें यातायात नियमों के उल्लंघन के एवज में किए जाने वाले भुगतान की समस्या नजर आती है। यह मुद्दा लोगों के व्यवहार एवं शासन को लेकर बुनियादी सवालों की ओर लेकर जाता है। उत्तर प्रदेश में एक मोटरसाइकिल सवार पर हेलमेट न पहनने का आरोप लगा। उसके बाद तेजी से घटी घटनाओं ने मामले को समस्या के केंद्र तक ला खड़ा किया। इसने शासन की हालत और निर्धारित प्रक्रिया एवं कानून के प्रति हमारे गहरे असम्मान को भी दिखाया।
 
मोटरसाइकिल सवार उत्तर प्रदेश राज्य बिजली बोर्ड में ठेके पर काम करने वाला एक इलेक्ट्रिशियन था। उसने पुलिस कर्मचारियों से गुहार लगाई कि उस पर 500 रुपये का जुर्माना न लगाया जाए। उसका कहना था कि वह केवल 6,000 रुपये वेतन पाता है और पिछले चार महीनों से उसे वेतन भी नहीं मिला है। लेकिन पुलिस कानून का हवाला देते हुए उसका चालान काटने पर आमादा थी। इलेक्ट्रिशियन ने अपने वरिष्ठ अधिकारी से भी बात करवाई लेकिन पुलिस जुर्माने से छूट देने को तैयार नहीं हुई। बाद में पता चला कि उसी तरह का चालान 70 पुलिसकर्मियों का भी कटा था।
 
इसके बाद इलेक्ट्रिशियन ने उस इलाके के पुलिस थाने पर बकाया बिजली बिल के बारे में पता किया तो पिछले कई वर्षों में इस बिल के 6.62 लाख रुपये पहुंच जाने की उसे जानकारी मिली। बकाया बिल का हवाला देते हुए इलेक्ट्रिशियन ने उस थाने की बिजली काट दी। जब उससे बिजली कनेक्शन काटने की वजह पूछी गई तो उसने कानून का ही हवाला देते हुए इसे जरूरी बताया। हालांकि रस्मी तौर पर पुलिस ने बिजली विभाग को बकाया बिल जल्द भरने का आश्वासन दिया तो थाने की बिजली आपूर्ति फौरन बहाल कर दी गई। इस पूरी घटना का एक सकारात्मक परिणाम यह निकला कि राज्य बिजली बोर्ड ने ठेके पर काम करने वाले इस इलेक्ट्रिशियन समेत 9,627 कर्मचारियों का मई महीने का 17 करोड़ रुपये का बकाया वेतन दे दिया। बाकी राशि के बारे में बिजली बोर्ड ने भी जल्द भुगतान करने की बात कही।
 
सवाल खड़ा होता है कि अनुबंधित कर्मचारियों के वेतन में देर क्यों हुई? शायद इसका कारण यह है कि बिजली उपभोक्ताओं ने समय पर बिल नहीं भरे थे जिसके कारण बिजली बोर्ड के पास वेतन देने के लिए पैसे नहीं थे। मई का वेतन मिलने के बाद भी इन कर्मचारियों का तीन महीने का वेतन बाकी ही रहा। इस बीच इस पूरे प्रकरण की जांच शुरू होने की भी खबर है। ऐसी घटनाएं असामान्य नहीं हैं। अगस्त में आगरा से ऐसी खबर आई कि ताजमहल परिसर में साफ-सफाई करने वाले कर्मचारी वेतन न मिलने से हड़ताल पर जाने वाले हैं। दिल्ली से सटे नोएडा में दो बड़े शॉपिंग मॉल, एक अस्पताल और एक स्कूल के बिजली एवं सीवर कनेक्शन काट दिए गए क्योंकि उन्होंने लंबे समय से बिल नहीं भरा था। नोएडा में 107 लोग ऐसे थे जिन पर 10-10 लाख रुपये से अधिक बकाया था और अधिकतम बकाया 46.35 करोड़ रुपये था।
 
ऐसा नहीं है कि आम लोग और निजी फर्में ही बिल भरने में लेटलतीफी करते हैं, कुछ सरकारी संस्थाएं भी इन चूककर्ताओं में शामिल हैं। भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) की एक पूर्व अध्यक्ष ने हाल ही में एक टेलीविजन साक्षात्कार में कहा था कि निजी क्षेत्र पर सरकारी बकाये का तो पुख्ता आंकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन अनौपचारिक अनुमानों के मुताबिक यह आंकड़ा दो लाख करोड़ से लेकर पांच लाख करोड़ रुपये तक हो सकता है। इनमें केंद्र एवं राज्य सरकारों के अलावा राज्य बिजली बोर्ड जैसी सरकारी कंपनियों की बकाया राशि भी शामिल हैं। उनकी राय है कि अगर इस बकाया राशि का भुगतान कर दिया जाता है तो वह अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा वरदान साबित होगा। इसकी वजह यह है कि बकाया राशि मिलने से सरकार की पूंजी निर्माण जरूरत पूरी होगी और आर्थिक गतिविधियों में नई जान आएगी। उन्होंने कहा कि बकाया बिलों के भुगतान पर दी जानी छूट या प्रोत्साहन योजनाओं के लिए वित्त का इंतजाम सरकार अपने बॉन्ड से कर सकती है। ऐसे फंड को पूंजी निर्माण में उत्पादक इस्तेमाल के लिए लगाया जा सकता है।
 
नजरिये के लिहाज से देखें तो समस्या का जन्म प्रोटोकॉल लागू करने में सुस्ती से होता है, चाहे वह समयबद्ध भुगतान का अनुशासन हो या कायदे-कानूनों की बात हो। समय पर बिल न भरने की यही बुराई यातायात नियमों का पालन न करने और गलत तरीके से गाड़ी चलाने वाले लोगों को हतोत्साहित करने में व्याप्त भ्रम में भी नजर आता है। कुछ मामलों में यह डिजाइन अपने आप में दोषपूर्ण है। मसलन, कोयले एवं स्पेक्ट्रम जैसे ढांचागत संसाधनों की कीमत कम रखने की जरूरत है ताकि उत्पादकता बढ़ाई जा सके। अगर इन संसाधनों की नीलामी प्रीमियम कीमतों पर होती है तो वाजिब कीमतों पर अच्छी गुणवत्ता वाले माल की प्रचुर आपूर्ति होने के बजाय आपूर्ति की मात्रा या गुणवत्ता कम हो जाएगी या फिर उसकी कीमत बढ़ जाएगी। बिजली उत्पादन में अड़चन जैसे उदाहरण उन प्रक्रियाओं के हैं जिनके डिजाइन सोच- समझकर नहीं बनाए गए हैं। बिजली खरीद के लिए साख पत्र की जरूरत बनी हुई है लेकिन इसे लागू नहीं किया गया है। क्या एक नया निर्देश इसे लागू करेगा जब समझदार बैंक केवल उन्हीं वितरण कंपनियों को साख पत्र जारी करेंगे जिनकी वित्तीय स्थिति बेहतर है? इस डिजाइन की खामियां खंडित एवं प्रकरणगत अवलोकन, अलग दायित्व, पेशेवर क्षमता की कमी का नतीजा हो सकती हैं।
 
ऐसी असफलताएं दशकों से कायम हैं और इसका सत्ता में आसीन सरकारों से कोई लेना-देना नहीं है। मोबाइल फोन या सड़क निर्माण या बिजली आपूर्ति में हासिल कुछ शुरुआती सफलताएं भी कायम नहीं रह पाई हैं और न ही वे टिकाऊ वृद्धि लायक व्यापक परिणाम दे पाए हैं। वे अपना प्रदर्शन बनाए रख पाने में सफल नहीं रहे हैं और अब बैंकिंग एवं गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों के लिहाज से समस्या की जड़ बन चुके हैं। इसके मूल कारण हमारी आदतों में शामिल विरोधाभास हो सकते हैं। सामंती एवं औपनिवेशिक काल के बाद की धारणाएं रखना और वेस्टमिंस्टर प्रणाली के लिए अपेक्षित संस्कृति और नीतियों, प्रथाओं एवं प्रशिक्षण की तैयारी न होना इसकी वजह है। नतीजा यह होता है कि या तो सरकार और नागरिक एक-दूसरे के साथ 'हम और वो' की जंग में उलझ जाते हैं या प्रकरण आधारित योजनाएं धराशायी हो जाती हैं। हमारे राजनीतिक नेतृत्व और हमें दोनों को यह समझना है कि हम एक ही नाव में सवार हैं और अपने साझा हितों के लिए अनुशासन के साथ मिलकर काम करने का कोई विकल्प नहीं है। 
 
आज कोई औपनिवेशिक स्वामी नहीं है केवल वैसी मानसिकता है जिसे हम आज भी ढोए जा रहे हैं। हमें समय के साथ इस सोच में बदलाव लाने की जरूरत है। समय पर भुगतान, यातायात नियमों का पालन, कचरा प्रबंधन, ढांचागत सेवाओं, वित्त, उद्योग, खेती, कला और रोजमर्रा की जिंदगी में भी हमें नई सोच अपनानी होगी।
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