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कलाई पर टिक-टिक करेगी मिग-21 से बनी घड़ी

पवन लाल /  September 10, 2019

अगर आप लड़ाकू विमानों को उड़ान भरते देखकर बेहद रोमांचित महसूस करते हैं और उनसे अपना खास लगाव महसूस करते हैं तो उनसे जुडऩे का एक सुनहरा मौका आ रहा है। लड़ाकू विमान के कबाड़ से बेहद खास घड़ी बनाई जा रही है जिसे आप अपनी कलाई पर पहन सकते हैं। दशकों से भारतीय वायुसेना के जांबाज लड़ाकू विमान रहे मिग-21 के कबाड़ का इस्तेमाल इन एक्सक्लूसिव घडिय़ों को बनाने में किया जा रहा है। एक साल पहले ही वजूद में आई बैंगलोर वॉच कंपनी ने एयरोस्पेशल संस्करण वाली घडिय़ां बनाने की घोषणा की है। कंपनी मैक-1एक्स नाम से आने वाली केवल 21 घडिय़ां ही बना रही है।

 
इस कंपनी के संस्थापक निरुपेश और उनकी पत्नी मर्सी जोशी हैं। दोनों प्रौद्योगिकी सलाहकार रह चुके हैं। बोस्टन और हॉन्ग कॉन्ग में काम करने के बाद 2016 में वापस भारत आए थे और 2018 में उन्होंने कंपनी की शुरुआत की थी। निरुपेश हॉन्ग कॉन्ग में वशहूं कोंटांटा और जॅजै लुकुल्ट वॉच बुटीक में काम कर चुके हैं। उन्होंने कहा, 'उन घडिय़ों के साथ कई यादगार कहानियां जुड़ी हुई थीं।' यह बात सच है। दुनियाभर में घड़ी बनाने वाली छोटी-बड़ी कंपनियां अपनी मार्केटिंग रणनीति के लिए इस तरह की कहानियों की तलाश में रहती हैं। रिचमोंट ग्रुप के पनेरई ब्रांड की घडिय़ों की सफलता का राज भी उनके साथ जुड़ा ऐतिहासिक किस्सा ही था। कंपनी ने इस बात को भुनाया कि इटली के नौसैनिक उसके ब्रांड की घड़ी पहनते थे। फॉन्डरी 47 जैसे नए ब्रांड ने अहिंसा के समर्थन में अपनी घडिय़ों में एके 47 के हिस्सों को इस्तेमाल किया जबकि रोमैन जेरोम ने टाइटैनिक, बर्लिन की दीवार और अपोलो अंतरिक्ष यान में इस्तेमाल सामग्री का सहारा लिया। 
 
जोशी दंपती का मानना है कि भारत में ऐसे किस्से बिखरे पड़े हैं जिन्हें घडिय़ों के साथ जोड़ा जा सकता है। रूस में डिजाइन मिकोयान-गुरेविच सुपरसोनिक जेट और इंटरसेप्टर क्राफ्ट को मिग-21 टाइप 77 के नाम से जाना जाता है। इस विमान ने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्घ में अहम भूमिका निभाई थी। यह विमान 2013 में सेवा से बाहर कर दिया गया था। इस सेवानिवृत्त विमान की तलाश में जोशी ने हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के कबाडख़ाने की खाक छानी। परिचालन से हटा दिए जाने पर एचएएल ने ही इन विमानों को खरीदा था। उनकी योजना विमान में इस्तेमाल हुई धातु के हिस्सों को खरीदने की थी ताकि वे घड़ी बनाने में इसका इस्तेमाल कर सकें। आखिरकार जोशी को सफलता मिल गई। उन्होंने विमान का एक फुट लंबा और दो फुट चौड़ा टुकड़ा खरीद लिया। यह एयरोस्पेस ग्रेड का एल्यूमीनियम था। 
 
इसके बाद उन्होंने डिजाइन लैब में इस लोहे के वृत्ताकार टुकड़े काटे और उन्हें घड़ी का डायल बनाने में इस्तेमाल किया। ऐसी केवल 21 घडिय़ां बनाई जाएंगी जो इस महीने बिक्री के लिए उपलब्ध होंगी। कंपनी के पास अभी कोई स्टोर नहीं है और इन घडिय़ों की बिक्री केवल ऑनलाइन ही होगी। दरअसल कई छोटी घड़ी कंपनियां रियल एस्टेट के खर्च और वितरकों के कमीशन से बचने के लिए ऑनलाइन बिक्री का सहारा ले रही हैं। रिगैलिया लक्जरी रिटेल बोवे जैसी महंगी स्विस घडिय़ां बेचती है। कंपनी की संस्थापक प्रतीक डालमिया ने कहा कि ब्रांड बनाना आसान नहीं है लेकिन ऐसे खरीदारों की कमी नहीं है जो ऐसी खास चीज खरीदने में दिलचस्पी रखते हैं। घड़ी बनाने वाली स्विस कंपनी रेक भी यही करती है। वर्ष 2014 में शुरू हुई रेक स्पिटफायर विमान, पोर्शे 911, फोर्ड मस्तैंग और मिनी कूपर्स जैसे मशहूर वाहनों के हिस्सों का इस्तेमाल कर रही है। जोशी कहते हैं कि उनकी कंपनी ने ग्राहकों की संतुष्टि के लिए एनएबीएल से मान्यता प्राप्त एक प्रयोगशाला के साथ मिलकर मिग-21 के कबाड़ की पुष्टि भी करवाई है। इसके अलावा ऑक्सीकरण एवं क्षरण से बचाव के लिए धातु के टुकड़े पर लेप भी चढ़ाया गया। उसके बाद इन घडिय़ों को बनाया गया है। मिग डायल वाले इन घडिय़ों की कीमत 55,000 रुपये से अधिक हो सकती है। 
Keyword: watch, mig21,,
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