बिजनेस स्टैंडर्ड - चांदनी चौक : अनोखी विरासत से मेल नहीं खाता पुनर्विकास
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चांदनी चौक : अनोखी विरासत से मेल नहीं खाता पुनर्विकास

वीनू संधू /  09 10, 2019

वर्तमान के धरातल पर विरासत

बिजनेस स्टैंडर्ड चांदनी चौक : अनोखी विरासत से मेल नहीं खाता पुनर्विकास

दिल्ली के ऐतिहासिक चांदनी चौक का पुनर्विकास हो रहा है लेकिन इसमें पुराने शहर की अनोखी विरासत की झलक नदारद है। बता रही हैं वीनू संधू

मैं दो अलग-अलग दुनिया के बीच में खड़ी हूं। मेरे दाहिनी ओर दिल्ली मेट्रो का चमचमाता स्टेशन है जो आधुनिकता का प्रतीक है। बायीं तरफ ऐतिहासिक लाल किला है जो मध्यकालीन भारत में सत्ता का केंद्र था। और सामने भविष्य है-हर तरफ खुदा हुआ और अफरातफरी से भरा हुआ, जिसका नाम चांदनी चौक है। चांदनी चौक की 1.3 किलोमीटर लंबी मुख्य सड़क को नए ढंग से संवारा जा रहा है और इसे चांदनी चौक पुनर्विकास परियोजना नाम दिया गया है। इसके एक छोर पर पांचवें मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा लाल बलुआ पत्थर से बनवाया गया लाल किला है और दूसरे छोर पर उनकी पत्नी फतेहपुरी बेगम द्वारा बनवाई गई 17वीं शताब्दी की भव्य फतेहपुरी मस्जिद। कभी इस सड़क पर गाड़‍ियां चलती थीं और अब इसे 65 करोड़ रुपये की लागत से विदेशों की तर्ज पर विकसित किया जा रहा है। इस परियोजना के मार्च 2020 तक पूरा होने की संभावना है। इसमें लाल बलुआ पत्थर का भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है जिससे इसमें मुगलिया दौर की झलक देखने को मिलेगी। सिर के ऊपर से गुजरने वाले तारों को पहले ही भूमिगत कर दिया गया है। अब इस सड़क पर रात को ही वाहन चलाने की इजाजत होगी ताकि चांदनी चौक के थोक बाजार में कारोबार प्रभावित न हो। शादी की खरीदारी करने वालों के लिए यह अब भी पसंदीदा जगह है। 

बिजनेस स्टैंडर्ड चांदनी चौक : अनोखी विरासत से मेल नहीं खाता पुनर्विकासइस परियोजना को लेकर विभिन्न एजेंसियों के बीच लंबे समय तक तनातनी चलती रही। इनमें शाहजहानाबाद पुनर्विकास निगम, दिल्ली अर्बन आट्र्स कमीशन और बाजार के कारोबारी शामिल हैं। निगम का गठन 2004 में किया गया था। हालांकि पर्यटन के उद्देश्य से किए जा रहे इस सतही पुनर्विकास में इस जगह से जुड़ी भावना का नितांत अभाव है जो इतिहास से ओतप्रोत एक जीतीजागती विरासत है और जहां हर गली की अपनी कहानी है। इस परियोजना में इन गलियों को नहीं छुआ गया है। शाहजहां की बेटी जहांआरा ने चांदनी चौक का डिजाइन तैयार किया था। इसके साथ एक नहर भी बनाया गया था जिसमें रात में चांद का अक्स दिखता था। इसी कारण इसका नाम चांदनी चौक पड़ा। इसकी मुख्य सड़क असल में एक शाही रास्ता था जो लाल किले के मुख्य दरवाजे तक जाता था। बाद में औरंगजेब ने लोगों की भीड़ से बचने के लिए किले के मुख्य दरवाजे को दूसरी तरफ स्थानांतरित कर दिया था। 

भारतीय वास्तुकला, डिजाइन और शोध से जुड़े नोएडा के स्टूडियो रसिका रिसर्च ऐंड डिजाइन की संस्थापक-निदेशक सुरभि गुप्ता ने कहा, 'चांदनी चौक की शाहजहानाबाद के लिए वही अहमियत थी जो राजपथ की नई दिल्ली के लिए थी।' इसका एक भरापूरा इतिहास है और इसके इर्दगिर्द कई भव्य ऐतिहासिक इमारतें हैं। लेकिन इसकी विरासत केवल इमारतों तक ही सीमित नहीं है। उन्होंने कहा, 'विरासत चांदनी चौक के कण-कण में, यहां के बाशिंदों में, उनके खानपान और संस्कृति में, यहां की आबोहवा में और खुशबू में है।'

कुछ लोगों का कहना है कि भारत की तरह ही चांदनी चौक की गंगा-जमुनी तहजीब है। तो फिर आप इसे कैसे समझना शुरू करेंगे? इंडिया सिटी वॉक्स के संस्थापक सचिन बंसल ने कहा, 'आप इसे समझते नहीं हैं। आप इसे महसूस करते हैं।' उनकी कंपनी देशभर में विरासत का अनुभव कराती है और पुरानी दिल्ली पर उसकी कृति 'द बिल्ट लीगसी ऑफ मुगल्स' को बेस्ट हेरिटेज वॉक का राष्टï्रीय पर्यटन पुरस्कार मिला था। बंसल का दफ्तर चांदनी चौक में दुकानों की एक कतार के ऊपर है जहां आजकल नाकाबंदी है और खुदाई का काम चल रहा है। कभी यह जगह वार्नर ब्रदर्स पिक्चर्स (इंडिया) इस्तेमाल करती थी। चांदनी चौक का यह हिस्सा फिल्म वितरकों का प्रमुख केंद्र है। 

हालांकि उनके आलीशान दफ्तर तक जाने के लिए कई संकरी सीढ़‍ियों से होकर जाना पड़ता है। उनके साथ काम करने वाली छोटी टीम किस्सागोई में माहिर हैं और कुछ ने तो इतिहास, वास्तुकला, टेक्सटाइल और खानपान पर डॉक्टरेट कर रखी है। रिक्शा चलाने वाले कुछ लोग भी उनसे जुड़े हैं जो पर्यटकों को यहां की सैर कराते हैं। कुछ ही दिन पहले जब मजदूर इस इलाके में खुदाई कर रहे थे तो उन्हें कंक्रीट की एक सिल्ली मिली थी। इसे देखने के लिए बंसल की टीम तुरंत वहां पहुंची। यह अंग्रेजों द्वारा इस इलाके में बिछाई गई ट्राम की पटरी का हिस्सा था।

बिजनेस स्टैंडर्ड चांदनी चौक : अनोखी विरासत से मेल नहीं खाता पुनर्विकासबंसल इस खोज से खुश हैं लेकिन उनका कहना है कि आप चांदनी चौक की जीवंत और सामंजस्यपूर्ण विरासत को एक ही तरीके से समझ सकते हैं। इसके लिए आपको यहां के माहौल में डूबना होगा। मैंने ऐसा ही करने का फैसला किया। मेरे साथ आधुनिक इतिहास की विद्वान और सोनीपत के अशोक विश्वविद्यालय में पढ़ा चुकीं सौमी रॉय हैं। ऐसे समय में जब देश में एकरूपता पर जोर है, चांदनी चौक भारत की विविधता की झलक पेश करता है। लाल किले के दूसरी ओर दिगंबर जैन लाल मंदिर है जिसे बादशाह के जैन सुरक्षाकर्मियों ने 1656 में बनाया था। इसे उर्दू मंदिर भी कहा जाता है। सुविधा के लिए ऐसा किया गया क्योंकि बादशाह के सैनिक उर्दू बोलते थे। इसके पीछे मशहूर जैन पक्षी अस्पताल है। इसे भी उतना ही पुराना माना जाता है। इसमें घायल और बीमार पक्षियों का इलाज होता है और फिर उन्हें आजाद कर दिया जाता है।

इससे थोड़ा आगे बढ़ने पर गौरी शंकर मंदिर है। कहा जाता है कि इसे एक मराठी सैनिक ने बनाया था। इसके बाद ऐतिहासिक सीस गंज गुरुद्वारा है जहां औरंगजेब के हुक्म पर सिख गुरु तेग बहादुर का सिर काट दिया गया था। इसके पास सुनहरी मस्जिद है जहां से ईरान के हमलावर नादिर शाह ने 1739 में चांदनी चौक में लूट और नरसंहार को देखा था। यहां से सड़क की दूसरी ओर सेंट्रल बेपटिस्ट चर्च है। यह भारत का पहला उर्दू चर्च है जहां अब भी हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू में प्रार्थना होती है। आखिर में फतेहपुरी मस्जिद है।

इसके आसपास कई पुरानी हवेलियां हैं। इनमें भारतीय-इस्लामी वास्तुकला की झलक देखने को मिलती है। राजपूत और फिर यूरोपीय प्रभाव के कारण इनमें झरोखा, छतरी, संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर का व्यापक इस्तेमाल हुआ है। कई हवेलियां जर्जर हालत में हैं लेकिन कई समय के थपेड़ों में अपना अस्तित्व बचाने में कामयाब रहीं। इनमें एचडीएफसी, बैंक ऑफ इलाहाबाद, बैंक ऑफ बड़ौदा, भारतीय स्टेट बैंक की शाखाएं हैं। भारतीय स्टेट बैंक की शाखा जाबांज बेगम समरू की हवेली में है। इसमें बड़े-बड़े मेहराब और रोमन शैली के स्तंभ हैं। चांदनी चौक देश में कारोबार का मुख्य केंद्र है और यहां मुख्यत: नकद कारोबार होता है। यही वजह है कि यहां बैंकों की अहम भूमिका है। 

यहां आपको विदेशी ब्रांड नहीं मिलेंगे। लेकिन मुख्य सड़क के किनारे मैकडॉनल्ड का एक रेस्त्रां हैं। इसमें मैकडॉनल्ड फैमिली रेस्त्रां लिखा गया है जो इसे स्थानीय आबादी के बीच इसे ज्यादा स्वीकार्य बनाता है। खासकर उसकी 10 रुपये की सॉफ्टी दिहाड़ी मजदूरों के बीच बेहद लोकप्रिय है। मैं सोचती हूं कि परियोजना पूरी होने के बाद भी मजदूर आइसक्रीम के लिए आएंगे? इस जगह की खासियत को देखते हुए मुझे लगता है कि वे जरूर ऐसा करेंगे। लेकिन मैं रेस्त्रां के बाहर बैठे अजीबोगरीब लाल टोपी वाले लोगों के बारे में निश्चित नहीं हूं। ये कानों की सफाई करने वाले हैं जो कान साफ करने के लिए महिला, पुरुष, भारतीय या विदेशी, सभी के पीछे पड़े रहते हैं। आप उन्हें उनकी टोपी से पहचान सकते हैं जिन पर कान साफ करने वाली बत्ती लगी रहती है।

बिजनेस स्टैंडर्ड चांदनी चौक : अनोखी विरासत से मेल नहीं खाता पुनर्विकासकान की सफाई करने वाले यहां की खासियत हैं। उसी तरह खानपान की तरह-तरह की चीजें भी चांदनी चौक की विरासत का हिस्सा है। यहां आपको मक्खन चाय, ईरानी चाय, नमक वाली चाय मिल जाएगी। हर गली में अलग तरह की चाय मिलती है। यहां का समोसा और जलेबी भी अलग तरह की है। यहां समोसे में आलू की जगह मटर भरी जाती है और जलेबी सामान्य आकार से तीन गुना बड़ी होती है। इसे जलेबा कहा जाता है। अगर आप इनका स्वाद लेना चाहते हैं तो इसके लिए 'जलेबी वाला' सबसे मुफीद जगह है। 1884 में स्थापित यह दुकान चांदी के गहनों के बाजार दरीबा कलां के मुहाने पर है। जबसे यह दुकान खुली है, तबसे इसके आकार में कोई बदलाव नहीं आया है लेकिन जलेबी की कीमत 1980 में 30 रुपये थी जो अब 500 रुपये किलो हो गई है। 

मशहूर परांठे वाली गली में आपको परंपरागत परांठों के अलावा नींबू, करेला, भिंडी और केले के परांठे भी मिल जाएंगे। इन्हें देसी घी में बनाया जाता है। पंडित कन्हैयालाल ऐंड दुर्गा प्रसाद दीक्षित परांठे वाले की छठी पीढ़ी सफलतापूर्वक इस धंधे को चला रही है। इस दुकान में कम बिक्री वाले दिनों में 50 किलो लोई की खपत होती है जबकि व्यस्त दिनों में यह मात्रा 80 किलो तक पहुंच जाती है। इस गली में कभी परांठों की दस दुकानें हुआ करती थी लेकिन अब पांच ही रह गई हैं। यह इस बात का संकेत है कि इस विरासत को बचाने के लिए प्रयासों को तेज करने की जरूरत है और साथ ही इस इलाके के लोगों का जीवन स्तर भी सुधारा जाना चाहिए।

चांदनी चौक में 17वीं शताब्दी में करीब 1,550 दुकानें थीं जो आज बढ़कर 8,000 पहुंच गई हैं। यहां हर गली की अपनी खूबी है। गली खजांची में साडिय़ां और ट्रॉफियां मिलती हैं। किनारी बाजार में कढ़ाई का सामान मिलता है जबकि एस्पेलेनेड रोड कैमरे और साइकिल का थोक बाजार है। बल्लीमारान की शुरुआत जूतों की दुकान से होती है लेकिन आगे इसमें चश्मे और चूडिय़ां वालों की दुकाने हैं, फिर बेकरी की दुकानें और आखिर में शादी के कार्ड की दुकानें हैं। बंसल इसे 'संगठित अफरातफरी' कहते हैं। बल्लीमारान को इसका नाम कैसे मिला, इसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। इसी गली में शायर मिर्जा गालिब की हवेली मौजूद है जिसे अब संग्रहालय का रूप दे दिया गया है। कहा जाता है कि यही से यूनानी दवाओं की शुरुआत हुई थी। हकीम पहले बिल्लियों पर दवा आजमाते थे और इसी वजह से इसका नाम बिल्ली मारान पड़ा। दूसरी जनश्रुति यह है कि इस गली में बल्लियां बनाने वाले रहते थे। 

मुख्य सड़क पर तारों के जाल को भूमिगत कर दिया गया है लेकिन संकरी गलियों में वे अब भी लटकते हुए नजर आ रहे हैं। किनारी बाजार में आलीशान और हवादार नौ घर में भी आपको तारें लटकते हुए मिल जाएंगे। देश के जाने माने डिजाइनर कपड़ा लेने के लिए नियमित रूप से यहां आते रहते हैं। एक संरक्षणवादी ने कहा, 'चांदनी चौक बेहद जटिल जगह है और यहां बहुत भीड़भाड़ रहती है लेकिन आपको याद रखना होगा कि इसका विस्तार धीरे-धीरे हुआ है। इसलिए यहां का विकास भी ऐसे ही धीरे-धीरे होना चाहिए और एक बार में एक समस्या का समाधान होना चाहिए। सफाई, पानी और बिजली की समस्या का एक-एक कर समाधान होना चाहिए।'

बिजनेस स्टैंडर्ड चांदनी चौक : अनोखी विरासत से मेल नहीं खाता पुनर्विकासलोगों की बेरुखी का भी चांदनी चौक की ऐतिहासिक हवेलियों पर असर पड़ रहा है। बिना छत वाली खजांची हवेली कभी शाहजहां के मुनीम का आवास हुआ करती थी। इसमें उत्कीर्ण की गई नीली और सफेद मेहराबें हैं जो संगमरमर के स्तंभों पर खड़ी हैं। लेकिन एक फिल्म की शूटिंग के दौरान इसे लाल रंग में रंग दिया गया था। फतेहपुरी मस्जिद के करीब खारी बावली है। 17वीं शताब्दी में बसी यह जगह एशिया में मसालों की सबसे बड़ी मंडी है। यहां आपको मजूदर मसालों की बोरियां सीढ़‍ियों पर ऊपर-नीचे ले जाते हुए मिल जाएंगे और अगर आप उनके रास्ते में आते हैं तो आपको 'चलो, चलो, चलो' की आवाज सुनाई देगी। वे विनम्र हैं लेकिन अपने काम में मशगूल हैं और भीड़भाड़ के बावजूद अपना काम करते रहते हैं। उनकी तरह चांदनी चौक भी कभी नहीं ठहरता है। वह वक्त के मुताबिक खुद को ढालता है और पुनर्विकास की अफरातफरी में भी उसने खुद को इसके अनुरूप ढाल दिया है।

बिजनेस स्टैंडर्ड चांदनी चौक : अनोखी विरासत से मेल नहीं खाता पुनर्विकास

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