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मजबूत है सरकार तो क्यों नहीं अपनाती जरूरी सुधार?

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  September 10, 2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने समर्थकों में खासी लोकप्रियता हासिल है। समर्थक उन्हें साहसी निर्णय लेने वाला नेता मानते हैं। उदाहरण के लिए दूसरे कार्यकाल के शुरुआती दिनों में उन्होंने वहीं से शुरुआत की जहां पहला कार्यकाल खत्म किया था। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 370 पर सर्जिकल स्ट्राइक कर दी जिससे जम्मू कश्मीर राज्य का दर्जा ही बदल गया। राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया गया। अजीब यह है कि मौजूदा सरकार अर्थव्यवस्था और बेरोजगारी की भारी समस्याओं को हल करने के लिए वही उत्सुकता नहीं दर्शा रही है। अर्थव्यवस्था की स्थिति डांवाडोल है और अर्थशास्त्री यह चर्चा करने में व्यस्त हैं कि मंदी की प्रकृति चक्रीय है या ढांचागत। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य भी इस विषय पर सहमत नहीं हैं। क्या मोदी के पहले कार्यकाल में लिए गए नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर की अग्रिम समय सीमा ने वह परिस्थिति तैयार की जिसे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह 'मानवनिर्मित मंदी' कह रहे हैं। 

 
कारण चाहे जो भी हो, इस बात को लेकर तमाम विचारधाराओं के लोगों के बीच आम सहमति है कि अब कुछ करने का वक्त आ गया है। अगस्त के अंतिम सप्ताह में जब यह स्पष्टï हो गया कि वित्त वर्ष 2020 की पहली तिमाही के जीडीपी आंकड़े कमजोर रहने वाले हैं, सरकार ने कुछ घोषणाएं शुरू कीं। इन घोषणाओं में नीतिगत खामियों को दूर करना, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के नियमों में बदलाव, वाहन क्षेत्र में नई जान फूंकने से जुड़े कुछ उपाय, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सुधार तथा विनिवेश करने संबंधी कदम शामिल थे। 
 
क्या अगस्त में उठाए गए कदम देश की लडख़ड़ाती अर्थव्यवस्था में सुधार लाने वाले साबित होंगे? अब बात करते हैं 24 अगस्त की घोषणाओं की। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों पर लगने वाले अधिभार को वापस लेने की घोषणा से भी शेयर बाजार बहुत अधिक उत्साहित नहीं हुआ, जबकि निवेशक इसके कारण काफी परेशानी का सामना कर रहे थे। वाहन क्षेत्र की गिरावट दूर करने के लिए सरकार खरीदार के रूप में सामने आ रही है। उसने सरकारी विभागों द्वारा वाहन खरीद पर लगी रोक को समाप्त कर दिया है। उसने एकबारगी पंजीयन शुल्क के नियम को भी जून 2020 तक टाल दिया है। ये तमाम पहलें बिक्री को कुछ हद तक बढ़ाएंगी लेकिन ये वाहन बाजार के गणित को हल नहीं करतीं। दो दशक पहले की तरह सरकार अब वाहन बाजार में रसूखदार खरीदार नहीं है। बीते तीन वर्ष के दौरान सामान्य खरीदारों का डीलरों के यहां नहीं पहुंचना, उपभोक्ताओं के भरोसे के डगमगाने का सबसे प्रत्यक्ष उदाहरण है। यह तमाम इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं और उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार में देखा जा सकता है।
 
गत 28 अगस्त को सरकार ने एकल ब्रांड खुदरा, कोयला खनन, अनुबंधित विनिर्माण और डिजिटल मीडिया में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आसान कर दिया। इससे जुड़ी घोषणाओं पर मीडिया में काफी उत्साह देखने को मिला क्योंकि इसका मतलब था ऐपल जैसी कंपनी के बहुचर्चित स्टोर का भारत में खुलना। लेकिन केवल ऐपल जैसा एक ब्रांड भारतीय अर्थव्यवस्था की तकदीर नहीं बदल सकता, भले ही अनुबंधित विनिर्माण के बदले नियम के तहत देश में ज्यादा तादाद में आईफोन बनने शुरू हो जाएं। इसके अलावा एफडीआई की नीति केवल शुरुआत है। ऐपल की अनुबंधित विनिर्माता फॉक्सकॉन यह देख चुकी है कि किसी राज्य के नेता की प्रतिबद्धता (महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस) का अर्थ हमेशा जमीनी काम की शुरुआत नहीं होती। गत 31 अगस्त को पहली तिमाही में जीडीपी के निराशाजनक आंकड़े सामने आने के कुछ घंटे पहले ही यह घोषणा की गई कि 10 बड़े सरकारी बैंकों का विलय कर चार बैंक बनाए जा रहे हैं। इसे भला किस तरह सुधार कहा जा सकता है? शायद इसलिए क्योंकि सरकार की योजना मजबूत बैलेंस शीट वाले बड़े बैंक स्थापित करने की है। दिक्कत यह है कि विलय के चुने गए कई बैंक ऐसे हैं जिनमें कर्मचारियों की तादाद जरूरत से ज्यादा है और जिनके पास कोई कारोबार नहीं है। पर्सी मिस्त्री ने ऐसे बैंकों को जॉम्बी बैंक कहा था। सवाल यह है कि उनका विलय ऋण वृद्धि में कैसे सहायक होगा? इसका जवाब अभी मिलना है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बाद में स्पष्ट किया कि इस विलय से एक भी नौकरी नहीं जाएगी और न ही कोई बैंक शाखा बंद होगी। ऐसे में विलय की दलील ही समाप्त हो जाती है। अगर कर्मचारियों की तादाद में कमी नहीं करनी है या शाखाएं बंद नहीं करनी हैं तो विलय का तुक क्या है?
 
विनिवेश के मामले में भी देखें तो एक सरकारी कंपनी दूसरी कंपनी में हिस्सेदारी खरीद रही है। इन दोनों को साथ मिलाकर देखें तो इन तथाकथित आर्थिक सुधारों में कल्पनाशीलता का अभाव नजर आता है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं श्रम और भूमि कानूनों के मामले में ढांचागत सुधारों को अपनाने की इच्छाशक्ति नजर नहीं आती। कृषि बाजारों को सुसंगत बनाने की दिशा में भी कुछ नहीं हो रहा है। दलील दी जाती रही है कि ये मुद्दे राज्य के हाथ में हैं और केंद्र के पास करने को कुछ खास नहीं है। यह दलील थोथी है नीतियों में सुधार की दृष्टि से इतना अनुकूल राजनीतिक माहौल पहले शायद ही कभी रहा हो। आधे से अधिक राज्यों में केंद्र के सत्ताधारी दल या उसका गठबंधन सत्ता में काबिज हैं। दूसरी तरह देखें तो एक मजबूत सरकार ऐसे साहसी कदम उठाने की स्थिति में है, जो कोई अन्य सरकार शायद ही उठा पाती।
Keyword: narendra modi, jammu kashmir, 370, economy,,
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