बिजनेस स्टैंडर्ड - आर्थिक प्रोत्साहन जरूरी
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आर्थिक प्रोत्साहन जरूरी

संपादकीय /  September 10, 2019

दिल्ली सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि वह पड़ोसी राज्यों में फसल अवशेष जलाए जाने के कारण होने वाली वायु प्रदूषण की समस्या से निपटने की योजना बना रही है। यह अच्छा कदम है और पास-पड़ोस के अन्य राज्यों को भी इस दिशा में आगे बढऩा चाहिए। देश के उत्तर पश्चिम में स्थित राज्यों में धान की पुआल और अन्य अवशेष जलाने के खिलाफ की गई पहल शुरुआती गतिरोध को पार कर चुकी हैं और इनके परिणाम भी नजर आने लगे हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने हाल ही में उपग्रह आधारित अध्ययन के बाद दावा किया कि 2017 की तुलना में गत वर्ष हरियाणा में फसल अवशेष जलाने में 41 फीसदी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 25 फीसदी और पंजाब में 15 फीसदी कमी आई। यह छोटी लेकिन अहम शुरुआत है। हालांकि, सुनिश्चित परिणाम हासिल करने के लिए अभी काफी कुछ किए जाने की आवश्यकता है।

 
फसल अवशेष जलाने से रोकने की केंद्र और राज्यों की मौजूदा नीति में बड़ी कमी यह है कि ये नीतियां प्रमुख तौर पर हैप्पी सीडर नामक उपकरण को बढ़ावा देती हैं। ट्रैक्टर पर लगने वाली यह मशीन एक बार में धान के अवशेष हटाकर गेहूं की अगली फसल की बुआई कर देती है। यह उपकरण चाहे जितना बेहतर हो लेकिन इतनी बड़ी समस्या के लिए एक मशीन आधारित हल की अपनी कमियां हैं। यह एक महंगा उपकरण है और 50 फीसदी की सब्सिडी के बावजूद यह अधिकांश किसानों के बजट से बाहर है। सहकारी संघों और कृषि उत्पादक संगठनों द्वारा इन मशीनों को खरीदने पर 80 फीसदी की सब्सिडी की पेशकश की गई है जहां से किसान इन्हें किराये पर ले सकते हैं। साल में केवल तीन सप्ताह के इस्तेमाल के चलते इनमें निवेश को बुद्धिमानी नहीं माना जाता। इसके अलावा इसे केवल उच्च शक्ति वाले ट्रैक्टर के जरिये चलाया जा सकता है जो अधिकांश किसानों के पास होता ही नहीं। इतना ही नहीं, कई किसानों को लगता है कि अवशेष के निपटान पर होने वाले खर्च के बजाय उसे जलाना अधिक आसान है। फसल जलाना अधिक आसान समझते हैं। यह बात अलग है कि उच्च उत्पादन से उस नुकसान की भरपाई हो जाती है।
 
स्पष्ट है कि फसल अवशेष जलाना एक आर्थिक मसला है और इसका हल भी आर्थिक प्रोत्साहन में ही निहित है। जरूरत इस बात की है कि धान के अवशेष का मूल्यवर्धन कर उसे बाजार में बेचे जाने लायक बनाया जा सके। अगर उन्हें इससे आय होने लगे तो किसान इन अवशेषों को एकत्रित करने से परहेज नहीं करेंगे। गेहूं का भूसा जहां पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल होता है और बाजार में अच्छी कीमतों पर बिकता है, वहीं धान की पुआल अपाच्य होने के कारण इस काम नहीं आती। ऐसे में इसके सार्थक उपयोग के अन्य रास्ते तलाश करने होंगे। अच्छी बात यह है कि अब ऐसी तकनीक सामने आ रही हैं जिनकी सहायता से धान के अवशेष से जैविक गैस या अन्य तरह के ईंधन तैयार किए जा सकते हैं। इंडियन ऑयल और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी तेल कंपनियां पंजाब में इस कचरे से बायो-सीएनजी बनाने के संयंत्र लगा रही हैं। उन्हें इस सिलसिले में लॉजिस्टिक्स तथा अन्य मदद की आवश्यकता पड़ सकती है।
 
इसके अलावा फसल अवशेष के तीव्र अपघटन से कंपोस्ट खाद बनाने के तरीके भी तलाशे जाने चाहिए। इस दिशा में कुछ सफलता मिल चुकी है जिसे बढ़ावा देना होगा। एकल इस्तेमाल वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध के बाद पैकेजिंग क्षेत्र में भी इसके लिए नए अवसर हैं। अतीत की तरह धान की खूंटी का इस्तेमाल नाजुक वस्तुओं को पैक करने में कुशन की तरह किया जा सकता है और यह थर्मोकोल तथा अन्य तरह के प्लास्टिक की जगह ले सकता है। 
Keyword: environment, pollution, parali,,
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