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बीटी कपास पर बढ़ा किसानों का विश्वास

दिलीप कुमार झा / मुंबई September 09, 2019

खरीफ के इस बुआई सीजन में बीटी (बैसिलस थुरिंगिनेसिस) कपास के तहत कुल रकबा बढ़कर 93.5 प्रतिशत हो गया है। तीन साल पहले यह गिरकर 90 प्रतिशत रह गया था। पिछले कुछेक साल से इसका इस्तेमाल 95-96 प्रतिशत के स्तर से घटने लगा था क्योंकि बीटी बीजों के इस्तेमाल के बावजूद पिंक बॉल वर्म कीट और अन्य मसलों की वजह से फसल को नुकसान हो रहा था। वैकल्पिक बीजों को लोकप्रिय करने के प्रयास के बावजूद इसने जोर नहीं पकड़ा। वर्ष 2016 में बीटी कपास की हिस्सेदारी गिरकर 83 प्रतिशत रह गई थी।

 
कोटक सिक्योरिटीज की रिपोर्ट - कमोडिटी इनसाइट में देश के मौजूदा कपास बुआई सीजन के दौरान बीटी के अंतर्गत कुल 1.17 करोड़ हेक्टेयर कपास रकबे पर प्रकाश डाला गया है। गैर-बीटी कपास के अंतर्गत कुल रकबा 80 लाख हेक्टेयर बताया गया है। कृषि मंत्रालय द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़ों में अनुमान जताया गया है कि इस साल कपास बुआई का कुल रकबा 31 अगस्त तक 1.25 करोड़ हेक्टेयर रहा है जो पिछले वर्ष की तुलना में 7.3 प्रतिशत अधिक है। बीटी के तहत फिर से कपास बुआई को बढ़ावा देने के लिए इस साल किसानों को दो प्रमुख कारणों से प्रोत्साहन मिला है। पहला, गत वर्ष बारिश की कमी के कारण हुई फसल क्षति ने किसानों को इस कीट प्रतिरोधी ट्रांसजेनिक फसल बोने के लिए प्रेरित किया जिसमें सामान्य विशेषताओं के साथ कुछ अधिक उत्पादन प्राप्त करने की क्षमता रहती है। दूसरे, न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि ने भी किसानों को अपनी पुरानी कृषि पद्धति पर लौटने के लिए आकर्षित किया। 2016-17 तक भारतीय किसान इस नकदी फसल के लिए आवंटित क्षेत्र के 95 प्रतिशत भाग में बीटी कपास की बुआई कर रहे थे।
 
रिपोर्ट में कोटक सिक्योरिटीज के अनुसंधान प्रमुख रवींद्र राव ने कहा है कि कपास के तहत कुल 1.25 करोड़ हेक्टेयर रकबा में से 93.6 प्रतिशत या 1.17 करोड़ हेक्टेयर रकबा इस साल बीटी के अंतर्गत आ गया है।  इस कारण इस कीट प्रतिरोधी ट्रांसजेनिक फसल ने किसानों में फिर से विश्वास पैदा किया है जो तीन साल पहले कपास पैदावार में ठहराव के कारण डगमगा गया था, जबकि इसके इस्तेमाल के शुरुआती सालों में खासा इजाफा हुआ था। पिछले साल कपास की कीमतें अत्यधिक अस्थिर रहीं। लंबे समय तक न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से नीचे रहने के बाद कपास के दामों में सुधार आया। सरकार ने इस साल कपास का एमएसपी 100 रुपये तक बढ़ाकर फिर से 5,550 रुपये प्रति क्ंिवटल कर दिया जो पिछले साल 5,450 रुपये प्रति क्विंटल था।
 
मुंबई के कपास व्यापारी और निर्यातक अरुण सकसेरिया ने कहा कि सरकार को अधिक खुबियों के साथ बीटी शृंखला में उपलब्ध ज्यादा उपज वाले नवीनतम बीजों की बुआई की अनुमति देनी चाहिए। वैश्विक स्तर पर किसान इसकी बुआई पहले से ही कर रहे हैं। भारतीय किसान बीटी ट्रांसजेनिक बीजों की बोलगार्ड-प्रथम और द्वितीय किस्मों का उपयोग कर रहे हैं जिनसे उपज में ठहराव की खबरे मिली हैं। किसी भी विकल्प के अभाव में किसान उपलब्ध बीजों के साथ ही बुआई कर रहे हैं। महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना जैसे कपास उगाने वाले प्रमुख राज्यों में मॉनसूनी वर्षा के असमान वितरण से फसल को गंभीर नुकसान पहुंचा है। अगस्त के अंत तक महाराष्ट्र में कपास का रकबा 43.7 लाख हेक्टेयर पार कर चुका है, जबकि पिछले वर्ष 41 लाख हेक्टेयर में बुआई की गई थी। इस साल गुजरात में कपास की बुआई में मामूली गिरावट देखी गई है जो पिछले साल के 26.9 लाख हेक्टेयर की तुलना में फिसल 26.5 लाख हेक्टेयर रह गई।
 
इस बीच सितंबर के पहले चार दिनों में देश भर में कपास की आपूर्ति 3,370 टन तक पहुंच चुकी है जो पिछले महीने की समान अवधि में रही आपूर्ति की तुलना में लगभग दोगुनी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार के सकारात्मक संकेतों और मध्य प्रदेश में कुछ फसल क्षति की सूचना से अगले कुछ सीजनों में कुछ हद तक कपास की कीमतों को मदद मिलने की संभावना है। बेंचमार्क राजकोट मंडी में कपास के दाम फिलहाल प्रति क्विंटल 9,100 रुपये बोले जा रहे हैं।
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