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देशों के सहयोग से ही होगा मरुस्थल समस्या का हल

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  September 09, 2019

संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण-रोधी समझौता (सीसीडी) को हमने रियो डि जनेरियो की सौतेली संतान कहा। इसकी वजह यह है कि यह एक उपेक्षित एवं बेहद अवांछित समझौता था जिस पर वर्ष 1992 में रियो सम्मेलन के दौरान दस्तखत हुए थे। अफ्रीकी एवं अन्य विकासशील देशों की इच्छा की वजह से इस समझौते पर सहमति बनी थी। असल में यह एक रिश्वत थी जिसे एक समझौते का रूप दिया गया था और समृद्ध देश इसे समझने या भरोसा करने को तैयार नहीं थे। रियो सम्मेलन का मुख्य एजेंडा जलवायु परिवर्तन था। उसके बाद जैव-विविधता संरक्षण का मुद्दा था जो दक्षिणी गोलाद्र्ध के देशों के लिए अहम था। फिर वनों के क्षरण का मसला था जिसके लिए समझौते का प्रस्ताव रखे जाने पर विकासशील देशों ने अपने संसाधनों पर अतिक्रमण की कोशिश बताते हुए कड़ा विरोध किया था। इस कड़वाहट भरे माहौल में मरुस्थलीकरण समझौता अस्तित्व में आया।

 
इस समझौते के करीब तीन दशक बाद जब दुनिया जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को महसूस करने लगी है, प्रजातियों के विलुप्त होने को लेकर जारी जंग हारने लगी है और विनाशकारी मौसमी बदलावों के खौफनाक अंजाम देखने लगी है, तब मरुस्थलीकरण के भुला दिए गए समझौते को भी अपनी सौतेली छवि से निजात पानी होगी। यह एक वैश्विक समझौता है जो हमारे वर्तमान और भविष्य को बना या बिगाड़ सकता है। सच यह है कि अपने प्राकृतिक संसाधनों- खासकर भूमि एवं जल, को संभालना हमारे लिए बड़ी चिंता का विषय बन चुका है क्योंकि आज इन संसाधनों पर बड़ा जोखिम मंडरा रहा है। कुप्रबंधन के साथ ही अजीबोगरीब मौसमी घटनाएं भी इसे गंभीर बना रही हैं। आज करोड़ों लोगों पर खतरा मंडराने लगा है।
 
लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर हम जमीन एवं पानी का अपना प्रबंधन बेहतर कर सकते हैं तो हम जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों को भी कम कर सकते हैं। हम निर्धनतम लोगों के लिए पूंजी निर्माण करने के साथ ही उनकी आजीविका को भी सुधार सकते हैं। और ऐसा कर हम ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम कर सकते हैं। पौधे लगाने से कार्बन डाईऑक्साइड पर लगाम लगेगी, मृदा स्वास्थ्य में सुधार से भी कार्बन डाईऑक्साइड पर काबू पाने में मदद मिलेगी और सबसे अहम बात, खेती एवं खानपान की आदतों में बदलाव करने से धरती को गर्म करने वाली गैसों के उत्सर्जन को कम किया जा रहा है। लिहाजा, इस समझौते को सौतेले बच्चे के बजाय मां-बाप के हाथों में सौंपने की जरूरत है। 
 
रियो सम्मेलन में उत्तरी गोलाद्र्ध के देशों का कहना था कि उनका इस मुद्दे से क्या लेना-देना है? मरुस्थलीकरण एक वैश्विक मुद्दा नहीं है लिहाजा इस पर एक अंतरराष्ट्रीय समझौता भला क्यों होना चाहिए? रियो में मरुस्थलीकरण समझौते की वकालत करने वाले अफ्रीकी देशों का कहना था कि रेगिस्तानी इलाका बढऩे से उनके उत्पादों की कीमतें गिर रही हैं जिससे उनके जमीन के भाव कम होने लगे हैं। यह मरुस्थलीकरण एवं भूमि अपकर्ष को बढ़ावा देता है। आज मरुस्थलीकरण के वैश्विक मुद्दा होने को लेकर कोई संदेह नहीं होना चाहिए। इसके लिए देशों के बीच सहयोग की जरूरत है। सच है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव दिखने अभी बस शुरू ही हुए हैं। तापमान के लगातार बढ़ते जाने और इस चक्र के बेकाबू हो जाने पर ये प्रभाव और घातक होने लगेंगे। यह भी साफ है कि आज दुनिया में गरीब लोग इस 'मानव-निर्मित' त्रासदी के सबसे बड़े शिकार हैं। रेतीले तूफान में किसी धनी शख्स की जान नहीं जाती है। इसी तरह चक्रवाती तूफान की चपेट में आने पर किसी धनवान की आजीविका खतरे में नहीं पड़ती है। लेकिन सच यह है कि ऐसा अजीब मौसम इसका पूर्वाभास देता है कि भविष्य में हमारे लिए क्या छिपा हुआ है? यह बदलाव एकरेखीय नहीं है और न ही इसका पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। यह एक झटके की तरह आएगा और हम उसके लिए तैयार भी नहीं होंगे। न तो विकासशील देश और न ही विकसित देश। जलवायु परिवर्तन का असर सब पर एक जैसा होगा, उसमें कोई भेद नहीं होगा। 
 
यह भी साफ है कि इस विनाशकारी बदलावों के चलते आपदाओं की संख्या बढ़ जाएगी क्योंकि अजीब एवं असामान्य मौसम की आवृत्ति एवं तीव्रता भी बढ़ेगी। ऐसा होने पर गरीब और भी अधिक गरीब होता जाएगा। समाज के हाशिये पर मौजूद लोग वंचित होने पर अपनी जमीनों से दूर जाने के लिए बाध्य होंगे ताकि वे जिंदा रहने के लिए आजीविका कमा सकें। उनके पास दूसरे देश या दूसरे शहर तक विस्थापन के अलावा कोई चारा नहीं रह जाएगा। यह दोहरा जोखिम गरीबों की पहले से ही खराब हालत को और बिगाड़ देगी और शरणार्थियों की संख्या बढऩे से हमारी दुनिया अधिक असुरक्षित एवं हिंसक होती जाएगी। यह विनाशकारी बदलाव का ऐसा चक्र जिससे हमें लडऩा ही होगा। इस तरह मरुस्थलीकरण का संबंध हमारे वैश्वीकृत विश्व से है क्योंकि सभी एक दूसरे से जुड़े और एक दूसरे पर निर्भर हैं। 
 
यही हमारे लिए एक अवसर भी है। यह समझौता मरुस्थलीकरण के बारे में न होकर मरुस्थलीकरण से जंग के बारे में है। हम जिस भी तरीके से मरुस्थलीकरण, भूमि अपकर्ष या पानी की कमी का सामना कर सकते हैं, उस तरीके से हम आजीविका में सुधार और जलवायु परिवर्तन का खतरा कम कर पाएंगे। भूमि एवं पानी जैसे संसाधनों के संयमित इस्तेमाल का एजेंडा जलवायु परिवर्तन के खिलाफ संघर्ष के केंद्र में है। यह लोगों की हालत बेहतर बनाने के लिए स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के निर्माण के केंद्र में है। गरीबी से जंग और इंसानी वजूद को बचाए रखने की जंग जीतने के लिए ऐसा करना ही होगा। मरुस्थलीकरण पर लगाम लगाने का संयुक्त राष्ट्र समझौता इसी बारे में है। ऐसे वैश्विक नेतृत्व की उम्मीद कीजिए जो इस बदलाव का वाहक बन सके।
 
(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवॉयरनमेंट की प्रमुख हैं)
Keyword: environment, world, india, health, population, CCD,,
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