बिजनेस स्टैंडर्ड - अंतरिक्ष यान खरीदने नहीं बनाने की जरूरत
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अंतरिक्ष यान खरीदने नहीं बनाने की जरूरत

अजय शाह /  September 09, 2019

अब वक्त आ गया है कि इसरो खुद को योजना बनाने, अनुबंध करने और अनुबंध की निगरानी करने वाले संस्थान में बदले। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं अजय शाह 

 
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना की तात्कालिक प्रेरणा अब कमजोर पड़ चुकी है। उनकी मेहनत के फल अब विश्व बाजार में खरीदे जा सकते हैं। यान को चांद पर उतारने की व्यावहारिक कीमत कुछ भी नहीं। ऐसा करने के लाभ अब पूरी तरह देश में क्षमता निर्माण पर पडऩे वाले प्रभाव पर निर्भर करते हैं। चूंकि इसरो का काम अलग है इसलिए समाज के लिए इसके लाभ भी सीमित हैं। ऐसे में सार्वजनिक व्यय के समाज पर पडऩे वाले अप्रत्यक्ष प्रभाव को देखते हुए इसरो को नासा जैसा बनना होगा। उसे भी अनुबंध संस्थान के रूप में काम करना होगा। इसरो की स्थापना अंतरिक्ष अनुसंधान के लाभ हासिल करने के लिए की गई थी। उस वक्त  के लिहाज से वह सोच सही थी लेकिन अब वह दौर बीत चुका है। अब संचार जैसी वाणिज्यिक गतिविधियां, रिमोट सेंसिंग जैसे काम अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष उद्योग की सहायता से किए जा सकते हैं। दुनिया भर में अब ऐसी वाणिज्यिक सेवाओं की कीमत भी ज्यादा नहीं हैं और भारतीय उपयोगकर्ता आसानी से ये सेवाएं खरीद सकते हैं। सैन्य लक्ष्य हासिल कर सैन्य बलों को हस्तांतरित किए जा चुके हैं। अब उन्हें पता है कि परमाणु हथियार संपन्न मिसाइल को वांछित ठिकाने पर कैसे भेजना है या निचली कक्षा के जासूसी उपग्रह के माध्यम से शी चिनफिंग की सुबह की सैर के दौरान उनकी तस्वीर कैसे निकाली जा सकती है। इस मामले में अब आत्मनिर्भरता उतनी अहम नहीं है। जासूसी उपग्रह की सेवाएं विश्व बाजार से आसानी से खरीदी जा सकती हैं।
 
चंद्रमा पर यान उतारना रोमांचित कर सकता है लेकिन इसका कोई वास्तविक लाभ नजर नहीं आता। हम इसरो के बजट व्यय को कैसे उचित ठहरा सकते हैं? इसरो पर बहुत अधिक धनराशि व्यय की जा रही है। हम यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि यह पैसा समझदारी के साथ व्यय किया जा रहा है और इससे समाज को अधिकतम लाभ मिल रहा है? प्रमुख अंतर्दृष्टि इसके अप्रत्यक्ष लाभों से जुड़ी है। इन अप्रत्यक्ष लाभों की दृष्टि से देखें तो जनता का पैसा अंतरिक्ष अनुसंधान में लगाना उचित है। परंतु संस्थागत व्यवस्था कुछ ऐसी होनी चाहिए कि ऐसे लाभ अधिकाधिक मात्रा में सामने आ सकें।
 
एक सिरे पर इसरो है जो भलीभांति अवरुद्ध है। जनता का पैसा इसरो में जाता है, इंजीनियरों की टीम यान बनाती है, वे यह जानकारी हासिल करते हैं कि यान को चंद्रमा पर कैसे उतारना है, लेकिन वे देश की मुख्यधारा से पूरी तरह कटे हुए हैं। खासतौर पर उनके काम से जुड़ी गोपनीयता के कारण। इस परिदृश्य में देखें तो इस व्यय से देश को होने वाले लाभ बहुत सीमित हैं। दूसरे सिरे पर नासा है। नासा में जन नीति और व्यय की उपलब्धियां इंजीनियरिंग की उपलब्धियों से पहले आती हैं। नासा ने कोई अंतरिक्ष उपकरण शायद ही बनाया हो। नासा के कर्मी उपकरण बनाने वाले इंजीनियर नहीं हैं, वे अफसरशाह हैं जो उन निजी कंपनियों और निजी विश्वविद्यालयों से अनुबंध करते हैं जो इंजीनियर उपलब्ध कराते हैं।
 
सन 1958 से 1965 तक नासा की वास्तविक उपलब्धि ऐसी प्रक्रियाएं विकसित करने की रहीं जिनके जरिये नासा का फंड पूरी अर्थव्यवस्था में फैला। सन 1960 में नासा 0.3 अरब डॉलर राशि का अनुबंधित काम कर रही थी। सन 1968 में अपोलो 11 के चांद पर पहुंचने से एक साल पहले उसका अनुबंध 4 अरब डॉलर का था। इस राशि का चौथाई हिस्सा अमेरिका के बाहर जा रहा था। नासा का वास्तविक प्रभाव वह क्षमता थी जो इन अनुबंधों से जुड़े तमाम लोगों को हासिल हुई। नासा पर व्यय की गई राशि इसलिए उपयोगी नहीं थी कि इंसान को चांद पर चलते देखना प्रेरक था, बल्कि ऐसा इसलिए था क्योंकि अमेरिका और उससे बाहर की दुनिया से हजारों नए विचार तकनीकी क्षमता के क्षेत्र में प्राप्त हुए। जेट प्रोपलसन लैबोरेटरी (जेपीएल) नासा का प्राथमिक अंतरिक्ष यान केंद्र है जिसमें 6,000 कर्मचारी और कुछ हजार अंशकालिक कर्मचारी हैं। इसका संचालन कैलटेक नामक निजी विश्वविद्यालय करता है। नासा इसे 3 अरब डॉलर की राशि सालाना मुहैया कराती है। जेपीएल ने वृहस्पति की तस्वीर ली लेकिन इससे बढ़कर इसने कैलटेक विश्वविद्यालय तथा पूरे देश में व्यापक ज्ञान का संचार किया। 
 
नासा में फिलहाल तीन ऐसे कार्यक्रम चल रहे हैं जो निजी कंपनियों की क्षमता मे इजाफा करेंगे। वाणिज्यिक यात्री कार्यक्रम के तहत निजी कंपनियां अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र ले जाएंगी। इसके अनुबंध स्पेस एक्स और बोइंग कंपनियों को दिए गए हैं। वहीं वाणिज्यिक माल वहन कार्यक्रम के अधीन स्पेस एक्स और नॉर्थरोप ग्रुमैन रोबोटिक कार्गो उड़ान को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र ले जाएंगी। वाणिज्यिक चंद्र अंतरिक्ष उपकरण सेवा में दो कंपनियां अनुबंधित हैं। इनमें से प्रत्येक को 8 करोड़ डॉलर की राशि दी जा रही है। एस्ट्रोबोटिक कंपनी का पेरेग्रिन लैंडर नासा के 14 उपकरणों को चंद्रमा पर ले जाएगा जबकि इंट्यूसिव मशीन का नोवा-सी लैंडर नासा के करीब पांच उपकरणों को चांद पर ही एक अन्य स्थान पर ले जाएगा। 
 
अनुबंध के इन तीनों आयामों के चलते तमाम रोमांचक वीडियो सामने आएंगे। इससे भी अहम, निजी क्षेत्र में सक्षम संस्थान तैयार होंगे। वहां से ज्ञान पूरे समाज और दुनिया में फैलेगा। आवश्यकता है कि इसरो इन विचारों पर आगे बढ़ता हुआ खुद को योजना बनाने, अनुबंध करने और अनुबंध की निगरानी करने वाले संस्थान में बदले। इससे सार्वजनिक व्यय देश में ज्ञान का विस्तार करने के काम आएगा। साथ ही चंद्रमा के अंधेरे क्षेत्र में भी हम अधिक उपलब्धियां हासिल कर सकेंगे। भारतीय रक्षा, अंतरिक्ष और परमाणु कार्यक्रमों की एक प्रमुख चिंता उनकी लागत की है। उदाहरण के लिए देश के परमाणु ऊर्जा उत्पादक संयंत्र वैश्विक स्तर की तुलना में बहुत सस्ते नहीं हैं। यह समस्या अंतरिक्ष विज्ञान में भी आ सकती है। अंतरिक्ष शोध में होने वाले कुल व्यय का अनुमान लगाना मुश्किल है। 
 
इस समस्या को दूर करने के लिए उपग्रह या रॉकेट बनाने का काम निजी कंपनियों को सौंपा जाना चाहिए जो वाणिज्यिक रूप से विश्व बाजार में प्रतिस्पर्धा कर सकें। अमेरिका में हम ऐसा होते देख चुके हैं। वहां निजी कंपनियां यानों का पूरा डिजाइन तैयार करती हैं और नासा केवल उन्हें अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष केंद्र तक ले जाती है। मौसम की जानकारी देने वाले उपग्रहों पर जनता का पैसा अधिक सटीक ढंग से व्यय होगा अगर कई निजी कंपनियां इन सेवाओं के लिए प्रस्तिस्पर्धा कर रही हों। अभी स्थिति यह है कि इस काम के लिए  इसरो को बजट आवंटित किया जाता है। इसरो को अब आसान कामों से दूरी बनानी चाहिए और नई पीढ़ी के ज्ञानार्जन में लग जाना चाहिए। इसके लिए उसे इंजीनियरों को सेवा देने के बजाय अनुबंध पर काम करना चाहिए।
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी, नई दिल्ली में प्रोफेसर हैं)
Keyword: ISRO, satelite, moon, mission,,
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