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अदालत से लड़कर हासिल किया था वकालत का अधिकार

आदिति फडणीस /  09 08, 2019

बहुतों की नजर में उनकी शख्सियत बेहद आकर्षक एवं असाधारण थी। वहीं कुछ लोगों ने उन्हें हमेशा कष्ट पहुंचाने वाला, नैतिक सिद्धांतों से रहित, राजनीतिक तौर पर बेशरम और बौद्धिक तौर पर मस्तमौला माना। सर्वाधिक अप्रत्याशित नेताओं में से एक के तौर पर जाने वाले राम जेठमलानी की उम्र लंबी रही और अपने 96वें जन्मदिन के चार दिन पहले उनका निधन हो गया। उनके निजी जीवन के बारे में शायद ही कुछ ऐसा होगा जो पहले से पता न हो। उन्होंने टेकचंद पाठशाला से पढ़ाई शुरू की थी और उन दिनों के हिसाब से इसकी चार महीने की फीस काफी महंगी थी। उन्होंने स्कूली शिक्षा सख्खर (अब पाकिस्तान) में 14 साल की उम्र में ही पूरी कर ली थी। इसकी वजह यह थी कि पढऩे में तेज राम को कई बार साल भर में दोहरी प्रोन्नति मिली थी। अपने दादा की तरह वकालत के पेशे की तरफ राम के बढ़ते रुझान को नजरअंदाज करते हुए उनके पिता ने उन्हें विज्ञान की पढ़ाई करने के लिए भेज दिया। लेकिन जेठमलानी का वहां मन नहीं लगा। आखिरकार उन्होंने 1939 में एससी साहनी लॉ कॉलेज में प्रवेश लिया और महज 17 साल की ही उम्र में वकालत की पढ़ाई पूरी कर ली। वह अपनी क्लास में प्रथम श्रेणी से पास होने के साथ सबसे आगे रहे थे। उस समय वकालत शुरू करने के लिए 21 साल की न्यूनतम उम्र तय थी लेकिन उन्होंने जल्द अनुमति दी जाने के लिए मुकदमा लड़ा और जीत भी हासिल की। इसका नतीजा यह हुआ कि 18 साल की ही उम्र में जेठमलानी ने वकालत शुरू कर दी। उसी साल उनकी दुर्गा आहूजा (16) के साथ शादी हो गई। वह मुकदमों के सिलसिले में कभी बम्बई तो कभी कराची आते-जाते रहते। लेकिन 1947 में देश के विभाजन के समय मारकाट शुरू होने पर वह पूरे परिवार को लेकर भारत आ गए। लेकिन शुरुआती दिन उन्हें एक शरणार्थी शिविर में बिताने पड़े। उसी समय उन्होंने यह तय किया था कि वह फिर कभी गरीब नहीं रहेंगे। बाद में भी उन्हें अपना यह संकल्प हमेशा याद रहा। 

 
शरणार्थी शिविर से उनका परिवार बम्बई चला आया लेकिन वहां पर तालमेल बिठाने में काफी मुश्किल हुई। ऐसे में जेठमलानी के सामने जो भी मामले आए, उन्होंने सब हाथ में ले लिए। चाहे वह मामला अपराध का हो, कंपनी मामलों का हो या डकैती एवं लूट का हो। इसी दौरान उन्हें अपनी सहयोगी वकील रत्ना साहनी से प्यार हो गया और पहले से शादी-शुदा होते हुए भी उन्होंने दूसरी शादी कर ली।  उन्होंने बंटवारे के बाद बड़े पैमाने पर आने वाले शरणार्थियों से जुड़े मामलों को हाथ में लिया था। दरअसल पाकिस्तान से आने वाले शरणार्थियों को स्थानीय लोग परेशानी की जड़ मानने लगे थे। भारतीय कानून में भी शरणार्थियों को लेकर स्पष्ट प्रावधान नहीं थे। ऐसी स्थिति में जेठमलानी ने बेहतर भविष्य की उम्मीद में भारत आने वाले शरणार्थियों के लिए बेहतर कानून बनाने की जंग लड़ी।
 
उसके बाद समाजवादी कानूनों की बारी आई। नेहरु और उसके बाद इंदिरा गांधी के लाइसेंस-कोटा राज में आर्थिक अपराध वाले कई तरह के लोग पैदा हो गए थे। उन दिनों अच्छी जीवनशैली की चाह रखने वाले लोगों को विदेशी सामान मुहैया कराना भी एक धंधा था लेकिन सरकार इसे तस्करी का गैरकानूनी काम मानती थी। स्वाभाविक तौर पर इन लोगों को भी कानूनी मदद की जरूरत पड़ती थी। जेठमलानी ने ऐसे लोगों की मदद से भी गुरेज नहीं किया। उनके एक सहकर्मी ने उन्हें 'तस्करों का वकील' भी कहा था। इन आरोपों पर जेठमलानी ने एक बार कहा था, 'जब मैं किसी व्यक्ति को तस्करी से मिले नोटों के साथ देखता हूं तो मैं यह अपनी जिम्मेदारी समझता हूं कि उसे उस धन से निजात दिला दूं।' एक समय तो जेठमलानी के 90 फीसदी केस तस्करी से ही संबंधित थे। उस समय तक जेठमलानी का क्रिमिनल वकील के तौर पर करियर पूरे शबाब पर था। उनकी नजर राष्ट्रीय मुद्दों पर भी बनी हुई थी। उन्होंने चीन के साथ युद्ध में नेहरु की भीरूता को लेकर तीखे हमले किए। फिर इंदिरा और कांग्रेस पार्टी आपातकाल लागू होने के बाद उनके निशाने पर आ गए। 
 
उसके पहले जेठमलानी 1971 में उल्हासनगर से अपना पहला चुनाव लड़ चुके थे। भारतीय जनसंघ ने उनका समर्थन किया था लेकिन वह चुनाव हार गए। कांग्रेस सरकार पर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए मीसा कानून का दुरुपयोग करने के आरोप खूब लग रहे थे। इन नेताओं की कानूनी मदद के लिए जेठमलानी आगे आए। मूल अधिकारों को लेकर चर्चित केशवानंद भारती केस में उनकी वह व्यंग्यात्मक टिप्पणी काफी चर्चित हुई थी, 'टिंबकटू के सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला सुनाया है कि एक वेश्या पश्चवर्ती प्रभाव से कुंवारी बन सकती है।' 
 
आपातकाल के बाद 1977 में हुए आम चुनावों में जेठमलानी बम्बई उत्तर सीट से भारी मतों से लोकसभा सांसद चुने गए। वह राजधानी दिल्ली के जनपथ मार्ग पर रहने लगे और जल्द ही उन्हें अपने आवास के बाहर यह बोर्ड लगाना पड़ा कि उन्होंने मुकदमे लेने बंद कर दिए हैं। वह 1980 के चुनाव में दोबारा सांसद चुने गए। इस दौरान उन्होंने हाजी मस्तान जैसे तस्कर का मुकदमा भी लड़ा। वर्ष 1988 में वह रामकृष्ण हेगड़े और रामनाथ गोयनका की मदद से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए।  उनके चर्चित मुकदमों में सैयद मोदी हत्याकांड में संजय सिंह और अमित मोदी को मुक्त कराना, इंदिरा हत्याकांड के आरोपियों केहर सिंह और सतवंत सिंह का बचाव करना, पूर्व खालिस्तानी अलगाववादी सिमरनजीत सिंह मान, संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु और आसाराम बापू के मामले भी रहे। अपने लंबे जीवन में जेठमलानी ने तमाम मित्र, दुश्मन एवं समर्थक बनाए। लेकिन वह उनके बारे में अपने विचारों को खुलकर कहने में कभी नहीं झिझके। सच तो यह है कि कभी भी दूसरा राम जेठमलानी नहीं हो सकता है।
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