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मध्यस्थता अधिनियम पर हावी होगा विशेष कानून

अदालत से
एम जे एंटनी /  September 08, 2019

उच्चतम न्यायालय ने एक फैसले में कहा है कि भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) को लेकर कोई विवाद होने पर केंद्र सरकार को मध्यस्थ नियुक्त करने का विशेषाधिकार है और इस दौरान मध्यस्थता एवं मेलमिलाप अधिनियम 1996 नहीं लागू होगा। एनएचएआई ने दार्जिलिंग में सैयदाबाद टी कंपनी की एक जमीन का अधिग्रहण किया था। उसके एवज में दिए जाने वाले मुआवजे को लेकर विवाद खड़ा होने पर चाय कंपनी ने सरकार से मध्यस्थ नियुक्त करने का अनुरोध किया। सरकार की तरफ से कोई कदम न उठाए जाने पर कंपनी ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में अर्जी लगाकर मध्यस्थता कानून के मुताबिक मध्यस्थ नियुक्त करने की मांग की। फिर सरकार ने आनन-फानन में मध्यस्थ नियुक्त कर दिया। लेकिन उच्च न्यायालय ने यह कहते हुए इसे गलत ठहराया कि मध्यस्थता कानून का उल्लेख हो जाने के बाद सरकार मध्यस्थ की नियुक्ति नहीं कर सकती है। उसके बाद मध्यस्थ ने मामला हाथ में लेने से मना कर दिया और कानूनी दायरे को लेकर 12 वर्षों तक खींचतान चलती रही। उच्चतम न्यायालय के फैसले से यह गतिरोध खत्म हुआ है। उसने कहा है कि एनएचएआई अधिनियम जैसा विशेष कानून मध्यस्थता अधिनियम जैसे सामान्य कानून का अध्यारोहण कर लेगा। यह सिद्धांत बिजली अधिनियम को लेकर उठे मध्यस्थता विवाद में भी लागू किया गया था।

 
निदेशक भी नामित कर सकता है मध्यस्थ
 
दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि हितों का टकराव होने की स्थिति में अदालतें स्वतंत्र मध्यस्थों की नियुक्ति करती रही हैं लेकिन मध्यस्थता अधिनियम एक पक्ष के मध्यस्थ नियुक्त करने के एकतरफा अधिकार के साथ माकूल नहीं बैठा है। कानून केवल अयोग्य व्यक्ति को मध्यस्थ नियुक्त किए जाने पर रोक लगाता है। न्यायालय ने कादिमी इंटरनैशनल बनाम एमार एमजीएफ लैंड लिमिटेड मामले का निपटारा करते हुए यह फैसला दिया है। उसने कहा है कि एक अकेले मध्यस्थ को कंपनी का कोई भी निदेशक नियुक्त कर सकता है। जब एक विवादित पक्ष के निदेशक ने इस मध्यस्थ की नियुक्ति की तो दूसरे पक्ष ने उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए आपत्ति दर्ज कराई। उसने दलील दी कि मध्यस्थता अधिनियम में 2015 का संशोधन लागू होने के बाद विवादित पक्ष से जुड़े रहे कुछ खास लोगों को मध्यस्थ बनने के अयोग्य घोषित किया जा चुका है। उसका यह भी कहना था कि जब किसी कंपनी का निदेशक खुद मध्यस्थ नहीं बन सकता है तो उसके द्वारा की गई नियुक्ति भी निरस्त मानी जाए। लेकिन न्यायालय ने फैसले में कहा है कि संसद ने कानून में संशोधन कर विरोधी पक्ष से मध्यस्थ नियुक्त करने का अधिकार नहीं छीना है। संसद ने केवल एक अयोग्य ठहराए गए व्यक्ति को मध्यस्थ बनने से रोकने का काम किया है।
 
स्थगन आदेश से भूमि अधिग्रहण पर रोक
 
जब कोई अदालत एक भूमि अधिग्रहण मामले में स्थगन आदेश देती है तो उस अधिग्रहण प्रक्रिया में शामिल सभी भूखंडों को निलंबित कर दिया जाना चाहिए। अगर एक भूखंड मालिक को भी अपनी जमीन के अधिग्रहण पर स्थगन आदेश मिल जाता है तो पूरे इलाके में अधिग्रहण प्रक्रिया आगे जारी नहीं रखी जा सकती है। अधिकारियों को अधिग्रहण प्रक्रिया वहीं रोकनी होगी। उच्चतम न्यायालय ने बंबई उच्च न्यायालय के एक फैसले को पलटते हुए यह निर्णय सुनाया है। महाराष्ट्र राज्य बनाम मोती रतन एस्टेट मामले में दायर अपील में भूस्वामियों ने कहा था कि पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के तहत निर्धारित दो वर्षों के भीतर अधिसूचित नहीं होने से यह अधिग्रहण निरस्त हो चुका है। उच्चतम न्यायालय ने इस दलील से असहमति जताते हुए कहा है कि स्थगन आदेश की अवधि दो साल की इस मियाद में नहीं जोड़ी जाएगी। इस स्थिति में अधिग्रहण प्रक्रिया निर्धारित समय में ही पूरी कर ली गई है। 
 
पीडि़त की उम्र के आधार पर तय हो मुआवजा
 
सड़क हादसों में हुई मौत के मुआवजे की गणना करते समय पीडि़त की उम्र को आधार बनाया जाना चाहिए न कि उसके आश्रितों की उम्र के आधार पर। हादसे में जान गंवाने वाले शख्स के कई आश्रित हो सकते हैं और उनकी उम्र भी अलग-अलग होगी। ऐसे में आश्रितों के उम्र की प्रासंगिकता नहीं रह जाती है। उच्चतम न्यायालय ने सुनीता टोकस बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस मामले में यह निर्णय सुनाया है। दोपहिया वाहन पर पीछे बैठकर जा रहे एक युवक की हादसे में मौत हो गई थी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने मृतक की मां की उम्र को ध्यान में रखते हुए नौ लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश बीमा कंपनी को दिया था। इससे असंतुष्ट महिला ने उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाया तो मुआवजा राशि बढ़ाकर 11.39 लाख रुपये कर दी गई। शीर्ष अदालत ने युवक की उम्र को ध्यान में रखते हुए मुआवजा बढ़ाने का फैसला सुनाया। वह एक प्रशिक्षित तैराक था और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में कई पदक जीत चुका था। इस तरह उसके भीतर असीम संभावनाएं थीं जो हादसे की वजह से खत्म हो गईं। उच्चतम न्यायालय ने इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए मुआवजे की नए सिरे से गणना की। उसने बीमा कंपनी को सात फीसदी ब्याज के साथ यह राशि चुकाने को कहा है।
 
चूककर्ताओं के लिए वैकल्पिक समाधान
 
यह सवाल एक बार फिर खड़ा हुआ है कि क्या कर्ज भुगतान में चूक करने वाली कंपनी कर्ज वसूली अधिकरण के पास जाने के बजाय सीधे उच्च न्यायालय के पास जा सकती है? गुजरात उच्च न्यायालय के समक्ष जी ए इंडस्ट्रीज बनाम बैंक ऑफ बड़ौदा मामले में यह मसला उठा। इस कंपनी ने बैंक से एक कर्ज लिया था जिसे वह नोटबंदी एवं जीएसटी संबंधी गतिरोधों के चलते लौटा नहीं पाई। बैंक ने कर्ज की वसूली के लिए सरफाएसी अधिनियम के तहत उसकी परिसंपत्तियों का कब्जा लेना चाहा। कर्ज वसूली अधिकरण ने कंपनी की आपत्तियों को खारिज कर दिया तो उसने उच्च न्यायालय की शरण ली। कंपनी ने बैंक की इस कार्रवाई को एमएसएमई इकाइयों के लिए जारी आरबीआई निर्देशों का उल्लंघन बताया। बैंक ने कहा कि कर्ज भुगतान मामलों की रिट याचिका के तौर पर सुनवाई करने पर उच्चतम न्यायालय कई बार उच्च न्यायालयों को फटकार लगा चुका है। लेकिन उच्च न्यायालय ने तमाम पहलुओं का विश्लेषण करने के बाद रिट याचिका स्वीकार कर ली। उसने यह भी कहा है कि 'अधिकरण को न्यायोन्मुख नजरिया अपनाना चाहिए था। अगर यह मान भी लिया जाए कि फर्म के पास वैकल्पिक समाधान मौजूद था तो भी न्यायक्षेत्र के अपने विशेषाधिकार के तहत मैं इसे अधिकरण के आदेश को निरस्त करने के लायक मानता हूं।' मामले को फिर से अधिकरण के पास भेज दिया गया है।
 
पीएफ अंशदान: कंपनी के निदेशकों पर नहीं चलेगा अभियोग
 
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने कर्मचारी भविष्य निधि में कंपनी की तरफ से निर्धारित अंशदान नहीं जमा करने वाली कंपनी के निदेशकों के अभियोजन को निरस्त कर दिया है। मलहाती टी ऐंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम पश्चिम बंगाल राज्य मामले में पीएफ अंशदान जमा नहीं करने पर चाय कंपनी के कुछ निदेशकों के खिलाफ आईपीसी के तहत आपराधिक अभियोग चलाया जा रहा था। जलपाईगुड़ी के जिला न्यायाधीश ने इस अभियोजन का आदेश दिया था। उच्च न्यायालय ने इस अभियोजन को निरस्त करते हुए कहा है कि नियोक्ता का मतलब कंपनी के निदेशक से नहीं होता है। कंपनी ही नियोक्ता होती है न कि उसके निदेशक। लिहाजा पीएफ अंशदान नहीं जमा करने पर निदेशकों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता है।
Keyword: supreme court, high court,,
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