बिजनेस स्टैंडर्ड - कमजोर पड़ा देश का सबसे सक्षम हथियार
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, December 11, 2019 06:07 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

कमजोर पड़ा देश का सबसे सक्षम हथियार

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  September 08, 2019

देश इस समय बढ़ते रणनीतिक खतरे का सामना कर रहा है। यह खतरा नियंत्रण रेखा पर पाकिस्तान द्वारा नई ब्रिगेड तैनात करने या उसके किसी मिसाइल परीक्षण से जुड़ा नहीं है। न ही यह चीन द्वारा किसी तरह की नई घुसपैठ है। यह खतरा तीन तरह का नहीं है। यह न तो सैन्य है, न ही यह हमारे पारंपरिक शत्रुओं की ओर से उत्पन्न हुआ है और न ही यह सीमा पार से आया है। इस नये खतरे से जुड़ी तीन बातें हैं: यह आर्थिक है, इसके कारण आंतरिक हैं और यह बीते दो दशक की सबसे बड़ी उपलब्धि को नष्ट कर सकता है जो है वैश्विक साख। मुंबई पर हुए आतंकी हमले के बाद विश्व स्तर पर हमारी छवि सुधरी है। इसमें हमारी स्थिरता और लोकतंत्र की भूमिका तो है ही लेकिन सबसे बड़ी भूमिका बढ़ती आर्थिक ताकत की है। 

 
इसे ऐसे समझें कि जब अर्थव्यवस्था 8 फीसदी या अधिक की दर से बढ़ रही हो तो आपके सात खून माफ होते हैं, 7 फीसदी की दर पर आपके पांच खून माफ होते हैं लेकिन इसके 5 फीसदी से नीचे आते ही आपकी स्थिति बिगड़ जाती है। एक उभरती विश्व शक्ति, तीसरी दुनिया की नाकाम अर्थव्यवस्था में बदलने लगती है जिसकी प्रतिव्यक्ति आय 2,000 डॉलर सालाना है। ध्यान रहे श्रीलंका की प्रति व्यक्ति आय इससे दोगुनी है। सन 1991 में आर्थिक सुधार लागू होने के बाद 25 वर्षों में भारत दुनिया के पसंदीदा देश के रूप में उभरा। पश्चिम, पूर्व और पश्चिम एशिया में भारत की विशिष्ट सामाजिक-राजनीतिक भूमिका रही है। जब दुनिया के अन्य देश संघर्ष कर रहे हैं तब वह अपनी विविधता के साथ विकास कर रहा है, लोकतंत्र और सामरिक स्थिति ने उसके वैश्विक कद में इजाफा किया है। करगिल, ऑपरेशन पराक्रम और मुंबई हमलों के बाद दुनिया में मिला समर्थन इसका गवाह है। 
 
इस बीच हमारी सबसे बड़ी ताकत आर्थिक थी। तेजी से विकसित होती दुनिया में भी भारत सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था रहा और बढ़ती तकनीकी क्षमता, नवाचार, विदेशी पूंजी को लेकर अनुकूलता, स्थिर बाजार और कर व्यवस्था के कारण उसे वैश्विक पहचान मिली। 2008 के वित्तीय संकट से उबरने के लिए भी उसे सराहा गया। इस पूरी अवधि में उथलपुथल वाली दुनिया में भारत स्थिर गति से बढ़ता रहा। यह पोर्टफोलियो और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का केंद्र बना रहा। चीन समेत सभी बड़े देश और उनकी कंपनियां भारत की स्थिरता और सुरक्षा में अपना हित देखती थीं। यही कारण है कि ऐसे समय में जबकि देश का सैन्य व्यय कम था और आधुनिकीकरण की गति में हम पीछे थे, फिर भी देश की अर्थव्यवस्था उसकी बड़ी ताकत बनी रही। बढ़ती जीडीपी, तमाम परमाणु हथियारों से अधिक शक्तिशाली थी। अगर कोई बड़ी ताकत आपके सॉवरिन या कॉर्पोरेट बॉन्ड में निवेश करती है तो वह नहीं चाहती कि उसका कोई कदम या नीति आपको अस्थिर करे। यहां तक कि चीन का 60 अरब डॉलर तक बढ़ता व्यापार अधिशेष भी काफी हद तक भारत पर निर्भर रहा।
 
वे भारत को ढेर सारी मशीनरी, बिजली उत्पादन उपकरण और इंजीनियरिंग वस्तुएं बेचते हैं लेकिन भला दुनिया का और कौन सा देश होगा जो अरबों डॉलर मूल्य की कम गुणवत्ता वाला चीनी कचरा खपा सके। खिलौने, चप्पल, फर्नीचर, पैरासोल, अगरबत्ती, प्लास्टिक की चूडिय़ां आदि देश के मझोले शहरों और गांवों के बाजार में पटे पड़े हैं। चीन भारत की आयात क्षमता पर काफी हद तक निर्भर है और यह बात इसे एक सामरिक संपत्ति बनाती है। सन 1999 में करगिल, 2001-02 में संसद पर हमले, 2008 में मुंबई हमले के बाद जब-जब भारत और पाकिस्तान के बीच जंग जैसे हालात बने, तब तब चीन की प्रतिक्रिया अपेक्षाकृत मित्रवत रही। यहां तक कि 2009 में दलाई लामा की तवांग यात्रा को लेकर उपजे तनाव को भी शांति से निपटा लिया गया। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में काफी समय तक वृद्धि की गति बरकरार रही बल्कि 2012-14 के धीमेपन के बाद उसमें तेजी भी आई। भारत और नरेंद्र मोदी दोनों को इसका लाभ मिला। वैश्विक नेताओं के बीच उनका कद बढ़ा। परंतु नोटबंदी करके उन्होंने खुद इसे पलीता लगाया। तब से देश की अर्थव्यवस्था गिरावट पर है। बीती चार तिमाहियों में भारी गिरावट आई है और जल्द सुधार की कोई सूरत नहीं दिख रही। इसका असर भारत के वैश्विक कद पर पड़ रहा है। अनुच्छेद 370 हटाने पर आई प्रतिक्रियाएं इसकी गवाह हैं। यह सही है कि सन 1971 के युद्ध के बाद से यह पहला मौका था जब भारत ने इस कदर आक्रामकता दिखाई लेकिन हमारी छवि के पराभव का संकेत इससे पहले तब मिल चुका था जब डॉनल्ड ट्रंप ने इमरान खान की मौजूदगी में भारत-पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता की पेशकश की।
 
ट्रंप तो ट्रंप ही हैं लेकिन अगर भारत की अर्थव्यवस्था पहले की तरह दमदार होती, अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश कर रही होतीं और मुनाफा कमा रही होतीं तो शायद ऐसा नहीं होता। इसके बजाय वॉलमार्ट, एमेजॉन, दवा निर्माता कंपनियां आदि सभी उनके पास जाकर भारत के कराधान और अन्य नीतियों में अचानक बदलाव की दुहाई दे रही थीं। ब्रिटेन की कमजोर टोरी सरकार कश्मीर मसले पर भारत से झिड़कते हुए बात कर रही है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी उसका व्यवहार अनुकूल नहीं है। टोली ब्लेयर की लेबर पार्टी की सरकार ने भी अतीत में तेजी के दौर में भारत के प्रति गहरी आस्था दिखाई। 2002 और 2012 के बीच ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने छह बार भारत की यात्रा की। टाटा द्वारा जगुआर लैंड रोवर और कोरस कंपनियों को 14.3 अरब डॉलर में खरीदने और ब्रिटेन में सबसे बड़े निजी नियोक्ता बन जाने के बाद ब्रिटेन के हर दल द्वारा भारत को तवज्जो देना लाजिमी था।
 
तमाम विश्लेषण काल्पनिक हैं लेकिन इन्हें केवल इसलिए नहीं नकारा जा सकता है कि ये आपको पसंद नहीं हैं, जबकि वे तथ्यात्मक हों। जब ट्रंप संवाददाता सम्मेलन में इमरान के साथ आए तो उनके दिमाग में भारत सामरिक साझेदार के रूप में नहीं बल्कि एक खिझाने वाले व्यापारिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में था। सामरिक मोर्चे पर देखें तो वह चीन को नाराज नहीं करना चाहते थे क्योंकि अफगानिस्तान में उसके हित अमेरिका से जुड़े हैं। गत माह फ्रांस के ब्यारिट्ज में कुछ प्रगति हुई और एक नया व्यापार समझौता चीजें बेहतर कर सकता है। मोदी और ट्रंप से अधिक निगाहें वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और अमेरिकी वाणिज्य मंत्री रॉबर्ट लाइट हाइजर  की मुलाकात पर होंगी। अगर इससे कुछ शांति बहाल हुई और समाधान निकाला तो अर्थव्यवस्था को नया नीतिगत हथियार बताने की हमारी बात सही साबित होगी। कश्मीर में आज हालात खराब दिख रहे हैं लेकिन ये सबसे खराब नहीं है। हम अपना हालिया अतीत भूल गए हैं, खासकर गूगल के पहले का समय। सन 1991-94 में घाटी के हालात सबसे अधिक खराब थे। प्रताडऩा केंद्र उभर आए थे, विदेशी पत्रकारों के जाने पर रोक थी, मुठभेड़ में मौतें सामान्य थीं। पंजाब में भी आग लगी हुई थी और रोज कई हत्याएं होती थीं। उस वक्त अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया भी नाराजगी भरी थी और भारत का कोई मित्र नहीं था। इकलौता साझेदार सोवियत संघ बिखर चुका था। बिल क्लिंटन के नेतृत्व वाला अमेरिकी प्रशासन परमाणु अप्रसार लॉबी के दबाव में लगातार भारत पर हमलावर था। अमेरिका में ऐसा कोई आयोजन नहीं होता था जहां भारतीय कूटनयिकों को कश्मीर में हत्याओं, बलात्कार और सैन्य घटनाक्रम के आरोप न झेलने पड़ते हों। विश्व स्तर पर अकेले पड़ चुके पीवी नरसिंह राव देश में पूरी निर्ममता से इन सबसे जूझ रहे थे। भाजपा समय आने पर उन्हें भारत रत्न देगी, उस वक्त कृपया मुझे याद दिलाएं कि मैंने यह बात कही थी। वह शायद उनको इस सबसे बड़ी उपलब्धि के लिए नहीं दिया जाएगा जिसने दिखाया कि शीतयुद्ध के बाद के दौर में अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी संपत्ति है। उन्होंने आर्थिक सुधार लागू किए और बाजार, जीडीपी और व्यापार में प्रगति के साथ ही हमारे कई मित्र उभर आए। क्लिंटन के पहले और दूसरे कार्यकाल में फर्क पर गौर कीजिए। पहले कार्यकाल में सहायक विदेश मंत्री रॉबिन राफेल ने कश्मीर के भारत में विलय पर ही सवाल उठा दिया था जबकि दूसरे कार्यकाल में क्लिंटन ने कहा था कि उपमहाद्वीप में देशों की सीमाएं रक्त से नहीं बदली जा सकतीं। अगर एक तेज विकसित होती अर्थव्यवस्था सन 1990 के दशक में सामरिक संपत्ति थी तो 2019 में धीमी अर्थव्यवस्था अवश्य बोझ मानी जाएगी।
Keyword: india, economy, GDP,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या राजकोषीय घाटे का लक्ष्य चूक जाएगी सरकार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.