बिजनेस स्टैंडर्ड - उधारी की चाल में उलझा कपड़ा उद्योग
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उधारी की चाल में उलझा कपड़ा उद्योग

सुशील मिश्र / मुंबई September 08, 2019

त्योहारी सीजन में गुलजार रहने वाले कपड़ा बाजार पर भी आर्थिक तंगी हावी है। नोटबंदी और जीएसटी की चोट से कपड़ा कारोबार अभी तक उभर नहीं पाया है। बाजार में नकदी की कमी से उपजी मंदी के मकडज़ाल ने कारोबारियों को उधारी के खेल में उलझा दिया है। कारोबार में गिरावट और उधारी की अटपटी चाल में उलझे व्यापारी एक दूसरे को संदेह भरी नजरों से देख रहे हैं। कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला कपड़ा उद्योग बेरोजगारी और दिवालियेपन की राह पर अग्रसर है। कारोबारियोंं के सामने सबसे बड़ी मुश्किल उधारी की है। उधारी बंद करते हैं तो ग्राहक टूट रहे हैं और देते हैं तो रकम डूब रही है। 

 
गल्र्स गारमेंट ग्रुप के अध्यक्ष संदीप दोशी कहते हैं कि कपड़ा कारोबार की सबसे बड़ी समस्या उधारी है। कपड़ा कारोबार उधारी के चंगुल में इस कदर फंस चुका है कि उससे निकलना बहुत मुश्किल हो गया। विनिर्माता के पास से कारोबारी माल उठाते हैं और चेक बांउस कर देते हैं। देश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिसके तहत हमें पैसा मिल सके, सालों साल मुकदमा चलता है। कारोबारी अदालत के चक्कर लगाए कि अपना कारोबार बचाए। मुंबई के दादर इलाके में 10 हजार से ज्यादा छोटे कपड़ा कारोबारियों के कारखाने हैं, इन कारखानों में हर किस्म के रेडीमेड कपड़े तैयार किये जाते हैं। सबकी एक ही कहानी है कि उनसे माल ले जाने वाला कारोबारी उनका पैसा नहीं दे रहा है। यंग इंडियन फर्म के मालिक पारस मोरबिया कहते हैं कि मंदी खत्म होने का नाम नहीं ले रही है, कॉर्पोरेट लेबल की कंपनियों ने छंटनी की जिसका असर छोटे कारोबारियोंं पर भी पड़ा है। हम सब उधारी में फंसे हुए है लेकिन माल ले जाने वाला भी व्यापारी है और वह भी फंसा हुआ है। जब तक आर्थिक मंदी में सुधार नहीं होगा तब तक स्थिति सुधरने वाली नहीं है। बाजार में किसी को किसी पर भरोसा नहीं बचा, जबकि कारोबार भरोसे पर चलता है। 
 
उधारी की मार से सिर्फ छोटे कारोबारी परेशान हैं, ऐसा नहीं है, बड़े कारोबारियों की भी दिक्कतें बढ़ी हैं। राज फैब्रिक्स के राजीव सिंघल कहते हैं कि पिछले 10 सालों से हम जिससे कारोबार कर रहे हैं वह इस समय उधारी नहीं दे पा रहा है, हालात ऐसे हैं कि उधारी मांग लो तो वह अपने साथ कारोबार करना ही बंद कर दे रहा है। सिंघल कहते हैं कि उधारी न चुकता करना वाला हर व्यापारी धोखेबाज नहीं है लेकिन हालात ऐसे हैं कि वह भी कहीं फंसा हुआ है जिसके कारण वह बिल का निपटारा नहीं कर पा रहा है। कारोबार को बढ़ाने के लिए सरकार को अपने नियमों में थोड़ी ढील देनी होगी और सरलीकरण करना होगा। छोटे कारोबारी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर सके इसके लिए प्रधानमंत्री कौशल योजना में अलग से प्रावधान लाया जा सकता है, बैंकों से सस्ते और समय पर कर्ज मिले ताकि बाजार में तरलता वापस आ सके। 
 
खुदरा कारोबारियों का कहना है कि बाजार में ग्राहक ही नहीं हैं। त्योहारों में लोग खुशी से कपड़े खरीदते थे लेकिन इस समय लोग वही खरीदारी कर रहे हैं जो बहुत जरूरी है क्योंकि लोगों के पास पैसा ही नहीं है। पिछले दो सालों में कारोबार में करीब 50-60 फीसदी की कमी आई है। नोटबंदी और जीएसटी के बाद कारोबार प्रभावित हुआ है। सरकार को जीएसटी को इस तरह सरल बनाना होगा ताकि छोटे छोटे कारोबारी भी बिना सीए के मदद के जीएसटी भर सकें। 
 
Keyword: textiles, cotton, cloths, branded,,
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