बिजनेस स्टैंडर्ड - वेब के प्रतिगामी दौर में किताब की वापसी
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वेब के प्रतिगामी दौर में किताब की वापसी

अजित बालकृष्णन /  September 06, 2019

वल्र्ड वाइड वेब के प्रसार ने कभी ई-बुक को रफ्तार दी थी लेकिन इसकी जटिलताओं ने अब उलटी चाल चलने को मजबूर कर दिया है। इस नए रुझान पर रोशनी डाल रहे हैं अजित बालकृष्णन

 
जब मुझे यह अहसास हुआ कि मैं इलेक्ट्रॉनिक किताबों की तुलना में हाल-फिलहाल छपी हुई किताबें पढऩा काफी पसंद करने लगा हूं तो मैं आदत में आए इस बदलाव पर गौर करने से खुद को नहीं रोक पाया। पिछले दो दशकों से किंडल जैसे इलेक्ट्रॉनिक स्वरूप में उपलब्ध किताबें ही खरीदकर पढ़ता आया था। एक और अहम बात यह है कि हाल में खरीदी गई किताबों में 'डूइंग डेटा साइंस' और 'न्यूराल नेटवक्र्स विद आर' जैसी तकनीकी विषयों वाली किताबें शामिल हैं। पहले तो मैंने इस बदलाव को यह कहते हुए सही साबित करने की कोशिश की कि मैं तो बस व्यावहारिक होने की कोशिश कर रहा था। कंप्यूटर कोड इतने सघन होते हैं कि किंडल पर उन्हें पढ़ पाना आसान नहीं होता है। आखिरकार, अगर कोई एक कारोबार इंटरनेट के प्रसार को दर्शाता है तो वह जेफ बेजोस का एमेजॉन है जो वर्ष 1995 में इंटरनेट पर किताबें बेचने वाले स्टोर के तौर पर ही शुरू हुआ था।
 
दुनिया का पहला ऑनलाइन स्टोर किताबों की बिक्री के साथ क्यों शुरू हुआ था? एमेजॉन के बारे में विकीपीडिया का पेज इस बात को नहीं बताता है लेकिन उस दौर में मौजूद रहने के नाते मुझे ऐसा लगता है कि उन दिनों अमेरिका में किताब उद्योग को बुकस्टोर में 40 फीसदी से भी अधिक मार्जिन मिलता था। इस वजह से एमेजॉन के लिए संभावित खरीदारों को बड़ी छूट की पेशकश कर ऑनलाइन किताबें खरीदने के लिए लुभा पाना आसान लगा। हमें वर्ष 2004 में वायर्ड के संपादक क्रिस एंडरसन की किताब 'द लॉन्ग टेल: व्हाई द फ्यूचर ऑफ बिज़नेस इज सेलिंग लेस ऑफ मोर' आने पर ही इसके पीछे की एक और वजह पता चल पाई। एंडरसन ने हमें बताया था कि किताब उद्योग जैसे उद्योगों में किताबों की बड़ी संख्या को पढऩे वाले कम लोग ही होते हैं। ये समर्पित पाठक एक 'लॉन्ग टेल' बनाते हैं और वे बेस्ट सेलर किताबें पढऩे में रुचि रखने वाले पाठकों की तुलना में किसी किताब की बढिय़ा कीमत भी चुकाने को तैयार होते हैं। वहीं बेस्ट सेलर किताबों के शौकीनों को आकर्षित करने के लिए उन्हें भारी छूट की पेशकश करनी पड़ती है। इस 'लॉन्ग टेल' मॉडल को उसके बाद कई दूसरे उद्योगों ने भी अपनाया है और इस बात को कहा जा सकता है कि ऑनलाइन खरीदारी में इस मॉडल की केंद्रीय भूमिका होती है। इसकी शुरुआत छपी हुई किताबों के उद्योग से ही हुई थी।
 
वर्ष 1989 में इंटरनेट के आधार वल्र्ड वाइड वेब की सोच लेकर आने वाले टिम बन्र्स-ली चाहते थे कि ज्ञान का आदान-प्रदान सरल हो जाए। और उनकी संकल्पना शुरुआती 15 वर्षों तक इस लक्ष्य पर खरा उतरने में सफल रही। हम सभी वेब पर मौजूद बेशुमार जानकारियों को मुफ्त में पढ़कर खुश होते रहे। इसके अलावा मुफ्त में संगीत सुनने और वीडियो एवं फिल्में भी देखने की सुविधा थी। सवाल उठता है कि इतना सब होते हुए भी आखिर किस वजह से मैं दोबारा छपी हुई तकनीकी किताबें पढऩे लगा? इसकी पहली वजह यह है कि वेब पर किसी मुद्दे पर जानकारी के लिए सर्च करने के बाद जब मैं किसी वेबसाइट पर उपलब्ध सामग्री पढऩा शुरू करता था तो कुछ पंक्तियों के बाद ही 'अधिक जानकारी के लिए ग्राहक बनें' वाला बैनर नजर आने लगता था।
 
मैं ग्राहकी लेने में हिचकता था क्योंकि कई बार भुगतान करने के बाद जब मैं उस पेज को विस्तार से पढऩा शुरू करता था तो कुछ समय बाद 'हमारी ई-बुक डाउनलोड करें' वाला एक और बैनर नमूंदार हो जाता था। यहां पर मैं फिर से हिचकता था क्योंकि मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ था कि डाउनलोड किए गए संस्करण में भी वे सारी जानकारियां नहीं होती थीं जो मुझे उस किताब के प्रकाशित संस्करण में मिलती थीं। मेरे दिमाग में यही सवाल उपजता था कि क्या पिछले दो दशकों में वल्र्ड वाइड वेब महज प्रचार का जरिया बनकर रह गया है? यह एक ऐसा उपकरण हो गया है जिसका इस्तेमाल आपको लुभाने और एक छपी पुस्तक खरीदने के लिए प्रेरित करने में होता है। 
 
विद्वान एवं प्रबंधन सिद्धांतकार कहते हैं कि वल्र्ड वाइड वेब ने तीन बुनियादी तरीके से हमारी जिंदगियों पर असर डाला है। पहला तरीका, यह मध्यवर्तियों की भूमिका खत्म कर देता है। इसका मतलब है कि चीन के शेन्जेन में स्थित एक मोबाइल फोन निर्माता कंपनी वेब के जरिये मुंबई में स्थित मेरे जैसे उपभोक्ता तक सीधे अपना उत्पाद बेच सकती है जिससे वह वितरकों को कमीशन देने से बच जाती है। इस तरह यह संकल्पना रखी गई कि वेब के आगमन ने 'मध्यवर्ती-उन्मूलन' कर अर्थव्यवस्था को उसी तरह कारगर बनाया है जिस तरह औद्योगिक क्रांति के समय व्यापक उत्पादन ने किया था। दूसरा तरीका है 'अभौतिकीकरण' जिसका सबसे अच्छा उदाहरण उस तरह का संगीत है जो अब भौतिक रूप में उपलब्ध नहीं रह गया है, मसलन ग्रामोफोन रिकॉर्ड और कैसेट टेप। लेकिन अभौतिक रूप में स्ट्रीमिंग के तौर पर ऐसे संगीत अब भी मौजूद हैं। 
 
हमारी जिंदगी पर असर डालने का तीसरा तरीका 'विसमूहन' का है। मसलन, हम जिसे बैंक के रूप में जानते रहे हैं अब वह वेब प्रसार के दौर में भुगतान कंपनी और कर्जदाता कंपनी के रूप में विखंडित हो चुका है।  वेब के काम करने के इन तरीकों का इस्तेमाल कर लाभ कमाने के लिए बड़ी मात्रा में निजी निवेश एवं वेंचर गतिविधियां संचालित हो रही हैं। समकालीन दौर में उद्यमशीलता का आशय ऐसा कारोबार शुरू करने से रह गया है जो इन तीनों में से किसी एक तरीके पर निर्भर हो। इस परिदृश्य में मुझे ई-बुक के बजाय छपी किताबों की तरफ लौटने की घटना को किस तरह लेना चाहिए? क्या ऐसा कोई भी मामला सामने आया है कि औद्योगिक क्रांति के पलटने की स्थिति पैदा हो रही हो? मेरे दिमाग में तात्कालिक तौर पर यही बात आती है कि रासायनिक औद्योगिक क्रांति के उप-उत्पादों के बारे में विश्वव्यापी धारणा अब पलटने लगी है। नील के संश्लेषण से रासायनिक औद्योगिक क्रांति की शुरुआत हुई थी और किफायती सिंथेटिक दवाएं, सिंथेटिक कपड़ों एवं पेट्रोरसायन जैसे उत्पादों के बल पर यह सिलसिला आगे बढ़ता गया। लेकिन आज के दौर में प्लास्टिक, पेट्रोल एवं सिंथेटिक रसायनों के खिलाफ आवाज बुलंद होने के साथ ही यह क्रांति भी अब प्रतिगामी हो चली है। क्या छपी हुई किताबों के प्रति भी इसी तरह का रुझान दस्तक दे रहा है?
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