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अर्थव्यवस्था का प्रश्न

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  September 06, 2019

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली दूसरी सरकार पर कोई यह आरोप नहीं लगा सकता कि वह निष्क्रिय है। उसके शुरुआती 100 दिन तो सक्रियता से भरे रहे हैं। जम्मू कश्मीर में ऐतिहासिक कदम उठाया गया, संसद के जरिये कई कानून पारित किए गए और स्वयं प्रधानमंत्री भूटान, जी-7, संयुक्त अरब अमीरात, रूस आदि की यात्रा पर गए। संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित करने के बाद वह चीन जाएंगे। यह बात भी ध्यान देने वाली है कि स्वर्गीय अरुण जेटली के बाद अमित शाह के सरकार में नंबर दो की हैसियत में आते ही सरकार के सुर और रुख में भी उल्लेखनीय बदलाव आया है। 

 
इन सब के बीच अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के प्रचार अभियान का एक नारा याद आना स्वाभाविक है। नारा था, 'इट्स दी इकॉनमी, स्टुपिड!' ऐसा नहीं है कि बीते 100 दिनों में अर्थव्यवस्था की अनदेखी की गई है। सरकारी बैंकों का विलय किया गया, बजट में तमाम बातें कही गईं, विदेशी निवेश के लिए माहौल और सहज बनाया गया। कुछ नए कानून अपनी प्रकृति में आर्थिक हैं: दो नए श्रम कानून, दिवालिया कानून में संशोधन। भारतीय रिजर्व बैंक ने भी दो बार दरों में कटौती की घोषणा की। इसके बावजूद वित्त मंत्री के अलावा सरकार में शामिल तमाम अन्य लोग वृहद आर्थिक नीति के मुद्दों से अलग-थलग नजर आ रहे हैं। यह समझना मुश्किल है कि कब अर्थव्यवस्था के समक्ष बढ़ती बेरोजगारी की चुनौती, कृषि संकट, विनिर्माण में ठहराव और निर्यात में गिरावट की समस्या आती है।
 
बिल क्लिंटन के पुराने नारे ने हकीकत बयानी के अलावा कुछ नहीं किया। लेकिन वर्तमान की तरह कई बार सच को कहे जाने की जरूरत होती है। खासतौर पर जब मोदी की पिछली आर्थिक पहलों की तरह उनकी नई आर्थिक पहल में भी सरकारी धन को खर्च करने संबंधी कदम शामिल हैं। वह किसानों को धनराशि देने और सरकारी फंड की मदद से स्वास्थ्य बीमा योजना शुरू करने जैसे कदम उठा चुके हैं। अर्थव्यवस्था में धीमापन आने के साथ-साथ लगातार दूसरी बार कर राजस्व के अनुमान से कम रहने की आशंका जताई जा रही है। इन तथा अन्य योजनाओं के लिए आवश्यक धनराशि सरकार के पास नहीं है। 
 
आर्थिक मोर्चे पर कमजोर प्रदर्शन से कई बड़ी जटिलताएं जुड़ी हुई हैं। बदलती विश्व व्यवस्था में जहां राष्ट्र-राज्य खुली छूट चाहते हैं, वैसे में देश का अधिकांश बाहरी प्रवाह प्रत्यक्ष तौर पर उसकी सामरिक स्थिति और इसके बाजारों के भविष्य पर निर्भर करता है। अगर वृद्घि रुक जाती है, तो देश को चीन के स्वाभाविक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखे जाने की संभावना कम हो जाती है। आर्थिक शब्दावली में इसे अगला चीन नहीं माना जाता। यह बात ध्यान रहे कि ये अवधारणाएं ही अमेरिका के भारत केे साथ दोबारा रिश्तों को कायम करने के लिए जिम्मेदार रहीं। इसकी शुरुआत राष्ट्रपति बुश के दूसरे कार्यकाल में नाभिकीय पहल के आरंभ के साथ हुई थी। 
 
अगर अमेरिका अब यह तय कर लेता है कि भारत का भरपूर इस्तेमाल हो चुका है (अमेरिका में कई पर्यवेक्षक ऐसा कहने भी लगे हैं) तो इसकी एक कूटनयिक कीमत चुकानी होगी। संभव है कि कश्मीर मामले पर पाकिस्तान के विरोध के चलते अन्य देश भारत की बातों पर एकबारगी यकीन नहीं करेंगे। रक्षा बलों को भी कुछ कीमत चुकानी होगी क्योंकि नई पनडुब्बियों और विध्वंसक पोतों के लिए धन नहीं है जबकि चीन की नौसेना हिंद महासागर में बहुत तेजी से अपनी पहुंच बढ़ा रही है। ऐसे में सामरिक साझेदार की भारत की उपयोगिता सीमित हो रही है।
 
अगर हमारे कारोबारी संरक्षणवादी दरों की तलाश में स्वाभाविक रूप से राष्ट्रवादी सरकार पर एक बड़े कारोबारी समझौते, क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग साझेदारी (आरसीईपी) से बाहर रहने का दबाव बनाते हैं तो भारत विश्व अर्थव्यवस्था के सबसे जीवंत हिस्से की ओर अपनी पीठ मोड़ लेगा। सरकार की बात करें तो ऐसा लगता है कि उसने यह तय कर लिया है कि मेक इन इंडिया केवल आयात प्रतिस्थापन से ही सफल होगा। यह कदम उच्च शुल्क दर की वजह बनता है। अगर विश्व व्यापार और आर्थिक प्रदर्शन का इतिहास देखा जाए तो यह नीति लंबी अवधि में कारगर नहीं साबित होती। 
 
प्रधानमंत्री समेत सरकार के तमाम प्रमुख लोगों को प्रत्यक्ष सक्रियता दिखाते हुए मौजूदा मंदी को रोकने का प्रयास करना होगा। मोदी को वृहद आर्थिक नीतियों से अपनी दूरी कम कर सुधार की नीति के विभिन्न तत्त्वों की सही समझ विकसित करनी होगी। सरकार को यह देखना होगा कि क्या किया जाना है क्योंकि ढांचागत मुद्दे मौसम के साथ नहीं बदलते। 
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