बिजनेस स्टैंडर्ड - बैंकों का विलय 'बिग बैंग' सुधार नहीं
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बैंकों का विलय 'बिग बैंग' सुधार नहीं

देवाशिष बसु /  September 05, 2019

सरकार ने 10 सार्वजनिक बैंकों के विलय की घोषणा कर बैंकिंग क्षेत्र को सशक्त बनाने की कोशिश है। लेकिन व्यापक बैंकिंग सुधार के लिए यह काफी नहीं है। बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
वित्तीय बाजार अक्सर 'बिग बैंग' सुधारों का जिक्र करते हुए भारत सरकार से अपेक्षित कदम उठाने की मांग करते रहते हैं। इस शब्दावली की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है लेकिन अश्लीलता के मामले में अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पॉटर स्टीवर्ट के विचारों से इसे समझ सकते हैं। न्यायाधीश स्टीवर्ट ने कहा था, 'जब मैं इसे देखता हूं तभी मैं इसे जान पाता हूं।' हाल में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कुछ सार्वजनिक बैंकों के विलय की घोषणा की तो कई को लगा कि बिग बैंग सुधार कैसे होते हैं? कुछ लोगों ने तो उत्साह में 1991 के दौर को याद करना शुरू कर दिया। क्या वाकई में ऐसा है? बिग बैंग सुधारों को दोतरफा परखना होता है: तात्कालिक रूप से बेहद सकारात्मक असर डालने के साथ ही यह अचल भी हो। वर्ष 1991 में सरकार बनाने के कुछ महीने बाद ही पी वी नरसिंह राव ने एकाधिकार एवं प्रतिबंधात्मक व्यापार कार्य अधिनियम जैसे बेवकूफाना कानून को खत्म कर दिया था। लगभग हर चीज की किल्लत वाले दौर में वह कानून उत्पादन की राह में केवल अड़चनें पैदा करता था। इस लिहाज से उस कानून का खात्मा  एक बिग बैंग सुधार था क्योंकि उसने दशकों से बोतल में बंद उद्यमशीलता के जिन्न को आजाद कर दिया था। मैं आश्वस्त हूं कि इन बैंकों के विलय में भी कुछ फायदे निहित होंगे लेकिन कमजोर सार्वजनिक बैंकों के समूह का विलय कर उन्हें बड़ा बनाने का कदम बिग बैंग सुधारों की परीक्षा में नाकाम हो जाता है। बैंक ऑफ इंडिया के सेवानिवृत्त चेयरमैन एम जी भिड़े का कहना है कि इस विलय से बैंकों की लागत घटेगी और उनके पास तकनीक में निवेश के लिए पैसा मौजूद होगा। इसके अलावा कम बैंक होने से उनमें राजनीतिक नियुक्तियां होने की आशंका भी कम हो जाएगी। हालांकि एक अन्य सार्वजनिक बैंक के पूर्व चेयरमैन की राय इसके उलट है। वह कहते हैं, 'अगर आप छोटी गड़बडिय़ों को एक साथ ला देते हैं तो फिर आपको एक बड़ी गड़बड़ी ही मिलेगी।'
 
खराब ट्रैक रिकॉर्ड 
 
हमें इंतजार कर यह देखना होगा कि आगे क्या होता है? हालांकि इस सरकार के ट्रैक रिकॉर्ड से बचा नहीं जा सकता है। इसने हमें तमाम कारण दिए हैं कि सार्वजनिक बैंकों के विलय से जुड़े प्रयोग को लेकर भी हम आशंकित बने रहें। सरकार आरोही सुधारों के जरिये चार वर्षों से सार्वजनिक बैंकों की समस्या दूर करने की जद्दोजहद करती रही है। लेकिन जमीनी स्तर पर नाममात्र की प्रगति हुई और इसके तमाम सबूत हैं कि नेता हकीकत को समझते नहीं हैं। वे अपनी ही दुनिया में मगन रहते हैं। ज्ञान संगम: जनवरी 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैंकिंग सुधारों की एक कार्य योजना बनाने के लिए सार्वजनिक बैंकों के प्रमुखों के साथ बैठक की थी। इस उच्चस्तरीय बैठक को ज्ञान संगम का नाम दिया गया था जिसमें वित्त मंत्री, आरबीआई गवर्नर, वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा और वित्त मंत्रालय के सचिवों ने भी शिरकत की थी। प्रधानमंत्री बैंकिंग क्षेत्र में हुई गलतियों पर एक व्यापक सहमति बनाकर इस बात की रूपरेखा बनाना चाहते थे कि सार्वजनिक बैंकों की स्थिति सुधारने और उसे सशक्त करने के लिए बैंकों के साथ सरकार को भी क्या कदम उठाने चाहिए? आधिकारिक विज्ञप्ति के मुताबिक प्रधानमंत्री एक सुधारात्मक कार्य योजना की रूपरेखा तय किए जाने के पक्ष में था। मैंने उस बैठक के ठीक पहले दिसंबर 2014 में लिखा था कि सार्वजनिक बैंकों को बेसल-3 मानकों पर खरा उतरने के लिए वर्ष 2018 तक 2.4 लाख करोड़ रुपये की इक्विटी पूंजी की जरूरत पड़ेगी। अगर इस बैठक में मुश्किल सवाल नहीं उठाए जाते हैं तो ज्ञान संगम केवल किनारे पर ही रह जाएगा और सार्वजनिक बैंकों की हालत पहले जैसी ही बनी रहेगी। लेकिन कुछ नहीं हुआ। उसके एक साल बाद भी ज्ञान संगम की एक और बैठक हुई और उसे भी भुला दिया गया। हालत यह है कि पांच साल बाद सार्वजनिक बैंकों की हालत और खराब हो चुकी है।
 
इंद्रधनुष: इस सात सूत्री योजना की घोषणा अगस्त 2015 में की गई थी। इसने वरिष्ठ पदों पर बेहतर नियुक्तियां करने, बैंक बोर्ड ब्यूरो (बीबीबी) के गठन, अधिक पूंजी डालने, फंसे कर्जों की मात्रा कम करने, बैंक प्रबंधन को मजबूत बनाने, जवाबदेही और प्रशासन को बेहतर बनाने का वादा किया था। लेकिन यह योजना भी फ्लॉप शो ही साबित हुई। पहले तीन कामों को करना आसान था, लिहाजा बीबीबी का गठन कर दिया गया लेकिन उसे भी काफी हद तक नजरअंदाज ही किया जाता रहा। बैंकों के पुनर्पूंजीकरण का ऐलान 2018 के आखिर में किया गया और अब भी यह टुकड़ों-टुकड़ों में अंजाम दिया जा रहा है।
 
बैंकिंग की राजनीति
 
क्या सार्वजनिक बैंकों का सुधार वास्तव में एक आर्थिक उद्देश्य है? मेरा मत है कि हमें इस सरकार के लक्ष्यों एवं योजनाओं के बारे में बहुत कम जानकारी होती है। हमें कहे गए शब्दों के मायने समझने के साथ ही गतिविधियों पर नजर रखनी होती है। ज्ञान संगम बैठक में मोदी ने बैंकों से जनधन योजना का दूसरा दौर चलाने के बारे में कहा था। इसमें स्कूलों में छात्र संसद की तरह प्रतिस्पद्र्धाओं के जरिये वित्तीय साक्षरता बढ़ाने की पहल करनी थी। उन्होंने बैंकों को सॉफ्टवेयर एवं विज्ञापन में साझा ताकत विकसित करने, प्रति बैंक 20,000-25,000 स्वच्छता उद्यमी तैयार करने, छात्रों को कर्ज बांटने और सुस्त बैंकिंग से परहेज करने का भी निर्देश दिया था। प्रधानमंत्री ने बैंकरों से कहा था कि कॉर्पोरेट सामाजिक दायित्व (सीएसआर) के हिस्से के तौर पर उन्हें हर साल एक क्षेत्र को चुनकर उसमें सकारात्मक भूमिका निभानी चाहिए। भयानक संकट से गुजर रहे सार्वजनिक बैंकों के लिए इस तरह का एजेंडा तय करना काफी विचलित करने वाला है।
 
तत्कालीन वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा ने 2015 की शुरुआत में कहा था, 'अगर हम सार्वजनिक बैंकों में अपनी हिस्सेदारी कम करते हैं तो हम संकटग्रस्त मूल्यांकन पर ऐसा करेंगे। हमें इन बैंकों का प्राइस-टु-बुक दायरा बढ़ाने की जरूरत है और उन्हें निजी क्षेत्र के बैंकों की बराबरी पर लाने की जरूरत है। यह सुनिश्चित करना हमारी जिम्मेदारी है कि अगर हम अपनी हिस्सेदारी बेचने जा रहे हैं तो हमें यह काम समुचित मूल्यांकन पर अंजाम देना होगा क्योंकि यह हिस्सेदारी भारत के लोगों की है।' उसके बाद से धांधली एवं बट्टे खाते में डाले जाने से बैंकों का मूल्यांकन लगातार कम होता गया है। मैं पहले भी कह चुका हूं कि नेता अपनी अलग दुनिया में ही रहते हैं। 
 
दिवंगत अरुण जेटली ने बिग बैंग सुधारों को लेकर दीवानगी होने पर सवाल उठाते हुए कहा था, 'हम छोटे-छोटे क्रमिक सुधारों से भी बहुत कुछ हासिल कर सकते हैं।' यह बात तभी सही है जब छोटे बदलावों को अहम सुधारों से बचने का बहाना न बनाया जाए।  क्या सार्वजनिक बैंकों का क्रमिक विलय इन बैंकों के कामकाज पर असर डालने वाले मूल मुद्दों- भ्रष्टाचार और प्रोत्साहन की कमी का हल निकालेगा? क्या वे इस बात का ध्यान रखेंगे कि पूंजी एवं प्रबंधन की हालत सुधरने पर भी कर्जदार सार्वजनिक बैंकों पर अब अधिक निर्भर नहीं रह गए हैं? कमजोर बैंक विलय से आने वाले समय में पूंजी, प्रतिस्पद्र्धा और तकनीक की चुनौतियां दूर नहीं होंगी। लेकिन वह एक अलग कहानी है। 
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