बिजनेस स्टैंडर्ड - मानक की समस्या
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मानक की समस्या

संपादकीय /  September 05, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बुधवार को सभी बैंकों के लिए यह अनिवार्य कर दिया कि वे खुदरा ग्राहकों और सूक्ष्म, लघु एवं मझोले उपक्रमों (एमएसएमई) के लिए फ्लोटिंग दर वाले ऋण को 1 अक्टूबर से बाहरी मानक से जोड़ें। यह मानक नीतिगत रीपो दर, तीन और छह महीने के ट्रेजरी बिल का प्रतिफल अथवा फाइनैंशियल बेंचमार्क इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (एफबीआईएल) द्वारा जारी कोई भी अन्य मानक दर हो सकती है। फ्लोटिंग दर वाले कर्जदार जो बिना पुनर्भुगतान शुल्क के पहले भुगतान करने के योग्य हैं वे भी चाहें तो बाहरी मानक का रुख कर सकते हैं। स्पष्ट है कि यह कदम मौद्रिक नीति का बेहतर पारेषण सुनिश्चित करने से संबंधित है। सैद्घांतिक तौर पर देखा जाए तो आरबीआई के निर्देश के बाद पारेषण बेहतर होना चाहिए क्योंकि बैंकों को कम से कम तीन महीने में एक बार दरों को नए सिरे से तय करना होगा। 

 
बहरहाल, इस कदम के कुछ अनचाहे परिणाम भी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए संभव है यह तात्कालिक तौर पर कर्जदारों के लिए बड़ी राहत लेकर न आए। ऐसा इसलिए क्योंकि बैंकों को मानक दर के ऊपर शुल्क लेने की इजाजत है तो वे चाहेंगे कि वे अपने तमाम जोखिम तथा उधारी से जुड़ी समस्त लागत बचा लें। अगर उक्त शुल्क ज्यादा है तो मानक दर में बदलाव परिलक्षित होगा लेकिन ऋण दरें काफी ऊंचे स्तर पर बनी रह सकती हैं। निश्चित तौर पर धीमे पारेषण का मुद्दा नया नहीं है। सन 2003 में व्यवस्था को प्राथमिक ऋण दर (सन 1994 में लागू) से हटाया गया और इसे मानक प्राथमिक ऋण दर पर स्थानांतरित किया गया। सन 2010 में आधार दर व्यवस्था लाई गई और सन 2016 में मार्जिनल कॉस्ट ऑफ फंड्स आधारित ऋण दर तय की गई। चूंकि आंतरिक मानकों ने पारेषण सुधार में वांछित मदद नहीं की इसलिए अब आरबीआई ने बाहरी मानकों का रुख किया है। 
 
बहरहाल, मौजूदा संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि पारेषण कमजोर क्यों है। भारतीय बैंकिंग तंत्र फंसे हुए कर्ज के बढ़े स्तर से त्रस्त है और वह मार्जिन बचाए रखने का जतन कर रहा है। एक प्रतिस्पर्धी माहौल में फंड की लागत कम होने पर बैंकों को दरें कम करनी चाहिए ताकि और कर्जदार आकर्षित हों और उनकी बैलेंस शीट का विस्तार हो। ऐसा नहीं है कि बैंक उच्च ब्याज दर लेकर कोई बहुत अधिक मुनाफा कमा रहे हैं। खराब पारेषण हमारे तंत्र की अक्षमता को उजागर करता है। उच्च राजकोषीय घाटा और सरकार की बड़ी उधारी भी नीतिगत दरों के पारेषण को प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए केंद्रीय बैंक ने गत वित्त वर्ष में करीब 3 लाख करोड़ रुपये की नकदी डाली ताकि तंत्र में पैसा बना रहे। 
 
अब जबकि नियामक ने बाहरी मानक लागू किया है तो बैंकिंग क्षेत्र पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। संभव है कि बैंकों को भी अपनी जमा दर को बाहरी मानक दर से जोडऩा पड़े ताकि उनका ब्याज मार्जिन बच सके। यह स्पष्ट नहीं है कि भारतीय जमाकर्ता हर तीन महीने पर जमा दर तय करने पर कैसी प्रतिक्रिया देंगे? बाहरी मानक दर के कारण उपभोक्ताओं और बैंक दोनों का ब्याज जोखिम बढ़ेगा। बैंक हेजिंग की दृष्टि से बेहतर स्थिति में होंगे, वहीं जोखिम से बचने वाले खुदरा जमाकर्ता अन्य रास्ते तलाश सकते हैं। ऐसे में अल्प बचत योजनाएं शायद बैंकों को जमा दर तय करने के मामले में राहत न दें। परिणामस्वरूप मार्जिन पर दबाव बन सकता है और चूंकि बैंकिंग क्षेत्र का बड़ा हिस्सा सरकारी है इसलिए इसके राजकोषीय प्रभाव भी होंगे। इन अनचाहे प्रभावों के बारे में विचार किया गया होगा। बेहतर विकल्प यही होता कि बैंकों की बाहरी मानक दर तक मुक्त पहुंच होती। इससे उन्हें बेहतर समायोजन करने को मिलता। 
Keyword: RBI, SBI, repo rate, loan, interest,,
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