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तिकड़ी ने बढ़ाई कांग्रेस की कठिनाई

अर्चिस मोहन /  September 04, 2019

जयराम रमेश, शशि थरूर और अभिषेक मनु सिंघवी के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दिए गए बयानों से कांग्रेस में उनके आलोचकों को मोर्चा खोलने का मौका मिल गया है। लेकिन आला कमान की चाटुकारिता से ज्यादा यह पेशेवर ईष्र्या, स्वाभाविक व्यवहार और तथाकथित हवा-हवाई नेताओं के खिलाफ बदला लेने का मामला है। कुछ नेताओं की राय है कि ये तीन नेता भाजपा के साथ पींगे बढ़ा रहे हैं लेकिन अभी तो यह चर्चा गरम है कि राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले उत्तर भारत के कुछ नेता भाजपा में जा सकते हैं। पार्टी रणनीतिकारों को आशंका है कि अगर हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में होने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन खराब रहा है, तो फिर पार्टी को एकजुट रखना मुश्किल हो सकता है।

 
जयराम रमेश का कहना था कि मोदी सरकार की लगातार आलोचना के कारण कांग्रेस को ही नुकसान हुआ है। थरूर और सिंघवी ने भी इस राय का समर्थन किया था। कांग्रेस के कई नेताओं ने इन तीनों की पार्टी की विचारधारा के प्रति प्रतिबद्घता पर सवाल उठाए हैं क्योंकि वे अन्य नेताओं की तरह युवा कांग्रेस या एनएसयूआई से नहीं आए हैं। इन तीन नेताओं की सबसे ज्यादा आलोचना कांग्रेस की तमिलनाडु और केरल इकाई ने की। जयराम और सिंघवी के खिलाफ कोई अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई लेकिन केरल कांग्रेस के अध्यक्ष मुल्लापल्ली रामचंद्रन ने थरूर को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया। 
 
कांग्रेस में अधिकांश लोग यह मानने को तैयार नहीं थे कि यह जयराम की कोई चतुर चाल है। उन्होंने 2004 में पार्टी के प्रचार अभियान की सफल अगुआई की थी। इसमें भाजपा के भारत उदय अभियान पर हमले किए गए थे लेकिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पर व्यक्तिगत हमले नहीं किए गए थे। इसकी वजह यह थी कि लोगों के बीच वाजपेयी का बहुत सम्मान था। जयराम का बयान और थरूर तथा सिंघवी द्वारा इसके समर्थन को पार्टी ने राहुल गांधी की आलोचना माना। राहुल ने आम चुनावों में मोदी पर व्यक्तिगत हमला किया था और उनका प्रचार अभियान 'चौकीदार चोर है' पर केंद्रित था। उनकी यह रणनीति पार्टी को ही भारी पड़ी। निजी तौर पर कांग्रेस के नेता जयराम को हवा-हवाई नेता मानते हैं। यानी एक ऐसा नेता जो युवा कांग्रेस और पार्टी की छात्र शाखा एनएसयूआई से उभरकर नहीं आया है। उनका कहना है कि जयराम का पार्टी की विचारधारा से वास्ता नहीं है। संयोग से जयराम ही नहीं थरूर और सिंघवी भी युवा कांग्रेस और एनएसयूआई से नहीं आए हैं। थरूर एक जाने माने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिज्ञ रहे हैं और सिंघवी की गिनती देश के अच्छे वकीलों में होती है। 
 
जयराम, थरूर और सिंघवी से हमदर्दी रखने वाले नेताओं का कहना है कि वे पार्टी में भले ही बाहरी हैं लेकिन उनकी अपनी स्वतंत्र पहचान है और वे ज्यादा व्यावहारिक तरीके से सोच सकते हैं। आश्चर्यजनक रूप से स्वराज अभियान के नेता योगेंद्र यादव ने इन तीनों नेताओं का समर्थन किया। यादव ने जयराम की इस बात पर सहमति जताई कि हर बात पर मोदी की आलोचना का उल्टा असर हो रहा है। जयराम ने इस टिप्पणी के बाद दिल्ली में एक पुस्तक विमोचन कार्यक्रम में हिस्सा लिया लेकिन इस मुद्दे पर चुप्पी साधे रखी। शनिवार को जयराम ने इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वृद्घि दर में गिरावट के बारे में ट्वीट किया। उन्होंने कहा, 'क्या आपको फिल्म क्यूएसक्यूटी (कयामत से कयामत तक) याद है? अब क्यूएसक्यूटी क्वार्टर से क्वार्टर तक का पर्याय बन चुका है। 
 
लगातार दो तिमाहियों में जीडीपी कम रही लेकिन किसी तरह इन्हें सुर्खी बनने से रोक दिया गया।' सिंघवी ने बिना लागलपेट के टिप्पणी की लेकिन वह अपने शब्दों के चयन को लेकर सतर्क थे। उन्होंने शुक्रवार को ट्वीट किया, 'देश की जीडीपी वृद्घि दर 5 फीसदी है लेकिन यह भी नई पद्घति के मुताबिक है जो मोदी बूस्टर के साथ आई है। मोदी बूस्टर के बिना जीडीपी की वास्तविक वृद्घि करीब 3 फीसदी है। मोदीनोमिक्स।' थरूर ने केरल इकाई के नोटिस का कड़ा जवाब दिया। केरल की राजनीति के जानकारों का कहना है कि कांग्रेस के एक गुट को आशंका है कि थरूर 2021 विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बनाए जा सकते हैं। 
 
नोटिस का जवाब देते हुए थरूर ने कहा कि वह सरकार और उसकी नीतियों की लगातार संसद में आलोचना करते रहे हैं। उन्होंने केरल इकाई का चुनौती दी कि वह कांग्रेस के एक ऐसे नेता का नाम बताएं जिसने मोदी सरकार की आलोचना करने में उनसे ज्यादा मेहनत की है। थरूर का रुख प्रधानमंत्री के प्रति भले ही नरम है लेकिन वह संघ परिवार की राजनीति के धुर विरोधी हैं। पिछले शुक्रवार को थरूर ने मोदी के इस सुझाव का स्वागत किया कि लोगों को हर दिन अपनी मातृभाषा से इतर किसी अन्य भारतीय भाषा का एक शब्द सीखना चाहिए। थरूर ने कहा, 'मैं हिंदी के दबदबे से बाहर निकलने की इस सोच का स्वागत करता हूं।' उन्होंने इसमें हिस्सा लेते हुए बहुलवाद के हिंदी और मलयालम में समानार्थक शब्द बताए। एक अन्य ट्वीट में उन्होंने राष्ट्रीय नागरिक पंजिका और संघ परिवार के राष्ट्रवाद का विरोध किया।
 
राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष का पद छोडऩे और सोनिया गांधी के फिर से पार्टी की बागडोर संभालने के बाद कांग्रेस के कई नेता सक्रिय हो गए हैं। कांग्रेस के कुछ युवा नेताओं का कहना है कि उनकी अगली लड़ाई पार्टी को वामपंथी प्रभाव से बाहर निकालने की है। पार्टी की मौजूदा स्थिति के लिए काफी हद तक इसे भी जिम्मेदार माना जा रहा है। हाल तक पार्टी में मीडिया संयोजक रहे रचित सेठ ने कहा, 'राष्ट्रवाद की चर्चा में कांग्रेस का पिछडऩा देश के लिए नुकसानदायक है। हमें इसमें अपनी जगह फिर से पानी होगी, अन्यथा बहुत देर हो जाएगी।'
 
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