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आशावाद नहीं हकीकत समझने से ही सशक्त होगी अर्थव्यवस्था

नीति नियम
मिहिर शर्मा /  September 04, 2019

आशावाद कोई पाप नहीं है लेकिन यह किसी देश की समूची आर्थिक नीति की बुनियाद नहीं हो सकता। दुख की बात है कि हमारे देश में कुछ ऐसा ही होता नजर आ रहा है। जब तक देश की निर्णय प्रक्रिया में शामिल लोग अपने भविष्य के अनुमान में संशोधन नहीं करेंगे तब तक किसी भी प्रकार का आशावाद झूठा ही साबित होता रहेगा। दिक्कत यह है कि हम काफी समय से यह मानते रहे हैं कि दीर्घावधि में देश की अर्थव्यवस्था में सुधार आएगा। कई ऐसी बातें हैं जो इस सोच को बढ़ावा देती हैं: युवा आबादी, मजबूत खपत मांग, बड़ा बाजार, श्रम की लागत से जुड़ा लाभ आदि। परंतु इन तमाम लाभों की बदौलत एक किस्म की आश्वस्ति भी आई है, बल्कि इससे एक किस्म का दंभ उत्पन्न हुआ है। अर्थव्यवस्था में उच्च मध्य आय वर्ग के उदय के साथ अपनी किस्मत में ऐसा भरोसा पैदा हुआ है जो किसी भी तरह के अपरिहार्य ढांचागत सुधारों की जरूरत पर पर्याप्त बल नहीं पडऩे देता।

 
धीरे-धीरे हमारी उपरोक्त बढ़त बाधाओं में तब्दील होती जा रही है। देश की आबादी अगर युवा हो और उसके पास रोजगार नहीं हो तो अर्थव्यवस्था को इसका कोई लाभ नहीं होता बल्कि वृद्घि के बजाय लोक कल्याण पर अधिक ध्यान देना पड़ता है। अगर सस्ता श्रम कौशल युक्त न हो तो वह वैश्विक बाजारों में प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता। मजबूत खपत मांग स्वीकार्य जीडीपी वृद्घि के वर्षों को रेखांकित करती है। परंतु निरंतर और स्थायी वृद्घि के लिए हमें निवेश और उत्पादकता बढ़ाने की जरूरत होगी। खपत हमेशा वृद्घि को आगे नहीं ले जा सकती। हम यह मानते हैं कि हमारा घरेलू बाजार इतना बड़ा है कि हमें निर्यात की आवश्यकता ही नहीं। हम मानते हैं कि हमारा बाजार इतना आकर्षक है कि शेष विश्व से निवेश यहां आएगा ही आएगा, भले ही हमारे यहां माहौल निवेश के अनुकूल न हो। शायद हम यह भुला बैठे हैं कि चीन जैसा देश, जिसकी आबादी हमसे कहीं ज्यादा है, वह भी केवल विश्व बाजार में पहुंच बनाकर ही विकसित हो पा रहा है। हम केवल दुनिया के पांचवें हिस्से के बराबर आबादी के लिए उत्पादन कर पा रहे हैं जबकि चीन बाकी पूरी दुनिया के लिए उत्पादन कर रहा है। 
 
इस समय चक्रीय मंदी और ढांचागत बाधाएं, दोनों अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं। सरकार की बात करें तो अल्पावधि और दीर्घावधि के नीतिगत प्रभावों को लेकर प्राय: एक संतुलन की आवश्यकता रहती है। उदाहरण के लिए उच्च सरकारी व्यय अल्पावधि में मांग में सुधार कर सकता है लेकिन दीर्घावधि में इसका खराब असर भी देखने को मिल सकता है क्योंकि अधिक उत्पादक निजी क्षेत्र के बजाय सरकारी क्षेत्र बचत पर अपना दबदबा कायम रखता है। देश के बाहरी खाते को दीर्घावधि के दौरान सुरक्षित रखने के लिए हमें आयातित ईंधन पर निर्भरता को कम करना होगा। परंतु अल्पावधि में विद्युतीकरण और ईंधन किफायत के लिए उठाए जाने वाले कदम वाहन क्षेत्र को प्रभावित कर रहे हैं। ढांचागत तौर पर देखें तो कम किफायती सरकारी बैंकों को खत्म करना देश के हित में हो सकता है, लेकिन अगर असल चिंता अल्पावधि में ऋण सुधार करना है तो सरकार को किसी तरह उन्हें गति देनी होगी। लंबी अवधि की वृद्घि के लिए एक प्राथमिकता यह भी होनी चाहिए कि सरकार के वेतन भत्तों में इस प्रकार कमी की जाए कि कर राजस्व का अधिक किफायती इस्तेमाल सुनिश्चित हो सके। परंतु यदि हमें अल्पावधि में खपत में सुधार सुनिश्चित करना हो तो इस मोर्चे पर कोई कदम नहीं उठाया जा सकता है। अगर आशावादी यकीन यह मानता है कि अल्पावधि की चीजों पर ध्यान देने की जरूरत है क्योंकि दीर्घावधि में हालात खुदबखुद सुधर जाएंगे तो जाहिर सी बात है कि ऐसे ढांचागत सुधारों को प्राथमिकता नहीं दी जाएगी। हम कहते आए हैं कि देश में सुधार केवल आपातकालीन परिस्थितियों में किया जाता है। 
 
जाहिर है ढांचागत सुधार के लिए अभी आपात परिस्थितियां नहीं हैं। निवेश में कमी की समस्या पर भी यही बात लागू होती है। माना जाता है मांग में सुधार करने से अतिरिक्त क्षमता की समस्या भी हल होगी। ऐसे में निवेश खुदबखुद वापस आएगा। परंतु अतिरिक्त क्षमता की समस्या को हल करना अनिवार्य रूप से निवेश में सुधार लाए यह आवश्यक नहीं। निवेश से जुड़े राजनीतिक जोखिम को कम करना और आवश्यक है। सरकार ने उद्योग जगत की चिंताओं पर ध्यान देना शुरू किया है। वह कर आतंक की आशंकाओं को भी हल कर रही है। कर प्रशासन में कुछ सुधारों का वादा किया गया है। परंतु राजनीतिक बातों से इतर सांस्थानिक और वैधानिक ढांचे में बदलाव के साथ ही यह हो पाएगा। वैधानिक क्षेत्र में भी क्षमता निर्माण जरूरी है। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के मामलों से सही तरीके से निपटा जा सके। द्विपक्षीय निवेश नीतियां ऐसी होनी चाहिए जो विदेशी निवेशकों की रक्षा करें। देश की अर्थव्यवस्था के भविष्य को लेकर देश में बहुत उम्मीदें हैं लेकिन विदेशी निवेशकों को यहां काफी पूंजीगत नुकसान हो सकता है। उनकी चिंताओं को संस्थागत सुधारों के माध्यम से हल करने के बजाय उन्हें देश में निवेश के बारे में भाषण दिए जा रहे हैं। एक पर्यवेक्षक की मानें तो चीन में निवेशकों का स्वागत लाल कालीन बिछाकर किया जाता है जबकि हमारे यहां लालफीताशाही उनका स्वागत करती है। 
 
वृद्घि के कारक बदल चुके हैं। हमें प्रतिस्पर्धी रहने के साथ-साथ भारतीय बाजारों से परे जाकर भी उत्पादन करना होगा। तभी उत्पादकता में सुधार होगा। अगर हम केवल अपनी खपत के लिए उत्पादन करेंगे तो हम कम मूल्यवर्धन, कम वेतन के चक्र में उलझ जाएंगे। इस स्थिति में हम बाहरी जोखिम से भी लगातार प्रभावित होते रहेंगे क्योंकि निकट भविष्य में आयातित ईंधन पर हमारी निर्भरता कम नहीं होने वाली। हम इन सब बातों की अनदेखी नहीं कर सकते। स्थिति बेहतर हो सकती हैं लेकिन केवल तभी जब हम आश्वस्ति और आशावाद के बजाय हकीकत पर ध्यान दें। 
Keyword: india, economy, GDP,,
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