बिजनेस स्टैंडर्ड - बाढ़ नियंत्रण के नजरिये में बदलाव जरूरी
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, October 20, 2019 07:51 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

बाढ़ नियंत्रण के नजरिये में बदलाव जरूरी

मिहिर शाह /  September 04, 2019

भारत को पारिस्थितिकी सामंजस्य के अग्रदूतों से सीखने और हमारे अपने हालात के हिसाब से उन्हें ढालने की जरूरत है। बता रहे हैं मिहिर शाह

 
भारत में बाढ़ की आवृत्ति एवं तीव्रता बढऩे के साथ ही इसका सारा दोष जलवायु परिवर्तन पर मढऩे की कवायद शुरू हो चुकी है। लेकिन गत तीन दशकों में बारिश का वितरण एवं सघनता में बदलाव होने से नीति-निर्माताओं पर कहीं बड़ी जिम्मेदारी आन पड़ी है कि वे लंबे समय से लंबित सुधारों को लागू करें। केवल सुधारों के ही रास्ते हम अतिवृष्टि की घटनाओं के बुरे प्रभावों को कम कर सकते हैं और उससे बच सकते हैं। भारत में बाढ़ नीति का केंद्रबिंदु इंजीनियरिंग समाधानों पर रहा है। विशालकाय बांधों के अलावा भारत ने अपनी नदियों के डूब-क्षेत्र में 35,000 किलोमीटर लंबे तटबंध भी बनाए हैं। लेकिन गुजरते वक्त के साथ यह समस्या और भी गंभीर होती गई है। वर्ष 2008 में बिहार की कोसी नदी के एक ऊपरी इलाके में तटबंध टूटने से हजारों लोगों की मौत और 33 लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा था। 
 
हालत यह है कि उत्तर बिहार में बांध एवं तटबंध बनाए जाने के बावजूद आजादी के बाद से अब तक बाढ़-प्रभावित इलाका करीब 200 फीसदी बढ़ चुका है। इसका कारण शायद यह है कि तटीय इलाकों में बंधे बनाने से पानी की प्राकृतिक निकासी बाधित हो जाती है और नदी डेल्टा एवं डूब-क्षेत्र भी नहीं बन पाता है। कोसी नदी में तटबंधों के चलते तलछट नाटकीय रूप से बढ़ गई है। कोसी में तलछट बढऩे की एक वजह यह भी है कि बहाव के ऊपरी इलाकों में मिट्टी का भारी कटाव हुआ है। नतीजतन, कोसी का तल काफी ऊंचा हो गया है जिससे बरसात के समय पानी बहुत जल्द तटीय इलाकों में फैलने लगता है और बाढ़ विकराल रूप ले लेती है। पिछले वर्षों में नदी तट के आसपास रिहायशी बस्तियां बसने से भी लोग बाढ़ की चपेट में जल्द आने लगे हैं।
 
बाढ़ प्रबंधन के बारे में हमारे नजरिये का मूल औपनिवेशिक काल से जोड़ा जा सकता है। पूर्वी भारत के डेल्टाई इलाकों में 1803 से लेकर 1956 के दौरान बाढ़ नियंत्रण को लेकर किए गए प्रयोगों का अध्ययन दर्शाता है कि यह इलाका बाढ़ पर आश्रित कृषि व्यवस्था से बाढ़-प्रभावित भूभाग में तब्दील हो गया। औपनिवेशिक शासक बाढ़ नियंत्रण का विचार अपनी संपत्तियों को बचाने और राजस्व संग्रह रणनीतियों को ध्यान में रखते हुए लेकर आए थे। सबसे पहले ओडिशा डेल्टा क्षेत्र में जमीन को डूबने से बचाने के लिए नदी के तटीय इलाकों में छोटे बंधे बनाए गए थे। मशहूर इंजीनियर सर आर्थर कॉटन को 1858 में डेल्टाई इलाकों के सर्वे के लिए बुलाया गया था। उन्होंने यह क्लासिक संकल्पना पेश की थी कि 'सभी डेल्टाई इलाकों को बुनियादी तौर पर एक ही समाधान की जरूरत होती है।' इस सोच का मतलब है कि नदियों में पानी की अपरिवर्तनीय एवं सतत आपूर्ति बनाए रखने के लिए उन्हें नियंत्रित एवं विनियमित किए जाने की जरूरत है। यह धारणा दोषपूर्ण होते हुए भी भारत में आज भी जल नीति को रास्ता दिखाती है।
 
ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि हम उपनिवेश काल की इस विरासत को किस तरह तिलांजलि देकर नए रास्ते तलाश सकते हैं? पहला, विज्ञान के बुनियादी उसूलों की तरफ लौटकर और जल चक्र में विभिन्न अवयवों की अंतर-संबद्धता को मान्यता देकर। इसी महीने केरल में आई भीषण बाढ़ के उदाहरण से हम इसे बखूबी समझ सकते हैं। लगातार तीसरे साल केरल में भीषण बाढ़ आई है। उत्तराखंड में 2013 में आई विनाशकारी बाढ़ की तरह केरल की बाढ़ भी जल-ग्रहण क्षेत्रों के अच्छी स्थिति में होने की अहमियत पर बल देती है। हमें पानी इन जल-ग्रहण क्षेत्रों से ही मिलता है। हिमालय एवं पश्चिमी घाट के नाजुक परिवेश में अंधाधुंध एवं काफी हद तक गैरकानूनी निर्माण कार्य चलने से भूस्खलन का खतरा काफी बढ़ गया है। माधव गाडगिल और कस्तूरीरंगन समितियां पहले ही पश्चिमी घाटों की अनमोल पारिस्थितिकी को अहमियत देने और उनके संरक्षण के अनुकूल विकास प्रतिमान तैयार करने की वकालत कर चुकी हैं। लेकिन इस सलाह को लगातार नजरअंदाज किए जाने से इन इलाकों में रहने वाले लोगों की मुसीबतें बदस्तूर जारी हैं। 
 
इससे भी खराब बात यह है कि केरल के अधिकांश बांध पश्चिमी घाट में ही मौजूद हैं। बिजली उत्पादन की मांग और बाढ़ नियंत्रण की अनिवार्यता के बीच अनवरत संघर्ष होता है। दरअसल बिजली उत्पादन के लिए बांधों के जलाशयों में भरपूर पानी की जरूरत होती है जबकि बारिश का मौसम शुरू होने के पहले इन बांधों के काफी हद तक खाली होने से बाढ़ काबू में रहेगी। किसी भी सूरत में हमारे अधिकांश बांध या तो सिंचाई या फिर बिजली उत्पादन के मकसद से बनाए गए हैं और बाढ़ नियंत्रण इसका दोयम लक्ष्य होता है। इसके बजाय पृथ्वी विज्ञान विभाग के केंद्रीय सचिव ने हाल ही में यह कहा है कि बांधों के जलाशयों के खराब प्रबंधन ने बाढ़ को और भी भयावह बनाने का काम किया है। मसलन, 2006 में सूरत, 2015 में चेन्नई और 2016 में बिहार में आई बाढ़ में इन जलाशयों की भूमिका रही थी। जलाशय प्रबंधन की वैकल्पिक रणनीति बनाई जा सकती है। केरल की 144 किलोमीटर लंबी चलकुडी नदी पर ही बने छह बड़े बांधों ने इस नदी की नैसर्गिक जलीय प्रणाली को पूरी तरह बदल दिया है। लेकिन इंजीनियरों एवं समाज वैज्ञानिकों के एक समूह ने इस नदी पर बने बांधों के जलाशयों की वैकल्पिक प्रबंधन रणनीति का खाका तैयार किया है और सघन सामाजिक लामबंदी के बाद नदी तट इलाके के सभी छह विधायकों ने भी उसे स्वीकृति दे दी है। ऐसी योजनाओं के सावधानीपूर्ण अध्ययन एवं देश भर में अनुसरण की जरूरत है।
 
खासकर शहरी इलाकों में नदी या समुद्र की तरफ जाने वाले पानी के प्राकृतिक मार्ग तबाह होने से भी बाढ़ की विभीषिका बढ़ी है। इन जलमार्गों को एक बार अवरूद्ध कर देने पर वह पानी हमारे घरों और दफ्तरों के सिवाय किधर जाएगा? वर्ष 2000 में हैदराबाद, 2001 में अहमदाबाद, 2003, 2009 एवं 2010 में दिल्ली, 2004, 2015 एवं 2017 में चेन्नई, 2007 में कोलकाता, 2014 में गुवाहाटी, कोच्चि एवं श्रीनगर और 2017 में तिरुवनंतपुरम की बाढ़ इसके उदाहरण हैं। शहरी क्षेत्रों में बाढ़ का यह सिलसिला अंतहीन है। हम यह भूल जाते हैं कि 1980 के दशक में चेन्नई में 600 से भी अधिक छोटे-बड़े जलस्रोत थे लेकिन आज यह संख्या एक-तिहाई भी नहीं रह गई है। हैदराबाद में भी गत 15 वर्षों में नमी से भरपूर 3,245 हेक्टेयर जमीन गुम हो चुकी है। बेंगलूरु में 1960 के दौर में 262 झीलें हुआ करती थीं लेकिन आज 10 झीलों में भी पानी नहीं रह गया है। पूर्व का वेनिस कहा जाने वाला अलप्पी भी अपनी खूबसूरत झीलों से गाद हटाने और उनकी सफाई की समस्या से जूझ रहा है। हम इन झीलों और तालाबों पर अतिक्रमण और उन्हें नजरअंदाज करने का अपराध कर चुके हैं जबकि इन जल निकायों का बाढ़ नियंत्रण में काफी योगदान होता है।
 
कोपनहेगन, लंदन, न्यू ऑर्लियंस, शिकागो, रॉटरडम, मेलबर्न और न्यूयॉर्क सभी शहरों में यह माना जा रहा है कि 21वीं सदी में बादल फटने की घटनाएं बढऩे के बाद अर्थव्यव्यवस्था को एक व्यापक पारिस्थितिकी का छोटा हिस्सा भर ही मानना चाहिए। ये शहर प्रकृति के साथ मिलकर निर्माण और नदी के लिए भी जगह वाला नजरिया लेकर चल रहे हैं। भारत भी पारिस्थितिकी के इन अग्रदूतों से सीख कर उनकी खासियत को अपने हालात के हिसाब से ढाल सकता है।
 
(लेखक शिव नाडर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं और योजना आयोग के सदस्य रह चुके हैं)
Keyword: flood, relief, river, dam,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या ऑनलाइन फर्मों के लिए नीति बनाने की पहल है जरूरी?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.