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सियासी मोर्चे पर वाचाल मगर आर्थिक मोर्चे पर ठीक नहीं हाल

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  September 03, 2019

इस लेख का जन्म उस सवाल से हुआ है जिसे इस समाचारपत्र के संपादकीय निदेशक ए के भट्टïाचार्य ने कुछ दिनों पहले अर्थव्यवस्था पर दिए अपने व्याख्यान में उठाया था। उन्होंने पूछा था कि सरकार भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से 1.76 लाख करोड़ रुपये के हस्तांतरण के मसले पर अपना पक्ष ठीक से क्यों नहीं पेश कर पाई है? आखिर क्या वजह है कि इस मुद्दे पर जारी विमर्श में विपक्षी नजरिया हावी हो रहा है? यह सवाल एक बड़े विरोधाभास की तरफ ले जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने व्यक्तिगत संदेशों और सरकार के राजनीतिक संदेशों को इतना प्रभावी ढंग से कैसे अंजाम दे लेते हैं? एक उद्धारक के तौर पर मोदी, अनुच्छेद 370 और तीन तलाक जैसे मुद्दों पर तो उनके संदेश असरदार होते हैं लेकिन आर्थिक मामलों में संदेश इतने खराब क्यों हो जाते हैं? 

 
अगर आप पीछे देखें तो 2002 से लेकर 2014 के दौरान मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते समय हालात इसके उलट थे। उस समय मोदी के आर्थिक संदेश देने की प्रक्रिया एकदम कारगर थी। आपको गुजरात मॉडल की चर्चा तो याद ही होगी? हालांकि उस समय वह व्यक्तिगत संदेश देने के मामले में उतने ही गलत थे। विमल जालान और राकेश मोहन जैसे जाने-माने एवं निष्पक्ष अर्थशास्त्रियों पर सरकार के मत के हिसाब से चलने का आरोप कैसे लग रहा है? इनमें से कोई भी 'भाजपा हमेशा सही होती है' किस्म का भक्त नहीं है। कई दूसरे मामलों में भी यही कहा जा सकता है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का ही मामला लीजिए। सांख्यिकीय मंत्रालय के प्रमुख एवं अपनी निगरानी में जीडीपी मापन की नई शृंखला बनवाने वाले प्रणव सेन मेरे भाई जैसे हैं। सेन के बाद उनकी जगह लेने वाले टीसीए अनंत तो वास्तव में मेरे बहुत करीब के चचेरे भाई हैं। वे लोग किसी भी मायने में भक्त नहीं हैं। असलियत तो ये है कि वे इसके ठीक उलट हैं।
 
नोटबंदी, बैंकिंग, एनपीए, रोजगार, निर्यात, विनिमय दर प्रबंधन और राजकोषीय घाटे के मामलों में सरकार सही संदेश देने में बुरी तरह नाकाम रही है। इसकी व्यापक असफलता काफी असामान्य है। इसकी तुलना में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) के दौर की चिंताएं भी कमतर लगती हैं। हालांकि इससे भाजपा को चुनावी नुकसान होने की आशंका कम दिख रही है। लेकिन गाय की पूजा ही देशभक्ति का इकलौता पैमाना नहीं हो सकती है। देशभक्ति का एक अहम पैमाना यह भी है कि अपने ही लोगों की नजर में अपना देश बुरा न लगने लगे।
 
खुद अपनी दुश्मन
 
ऐसा नहीं है कि सरकारी नजरिया सौ फीसदी सही ही होगा और विपक्ष का नजरिया सौ फीसदी गलत ही है। लेकिन जहां तक आर्थिक मोर्चे पर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के प्रदर्शन का सवाल है तो सच्चाई सरकारी नजरिये से बहुत दूर नहीं है। फर्क बस इतना है कि वह इसे प्रभावी ढंग से पेश नहीं कर पा रही है। ऐसे में प्रभावी राय एकदम उलट यह बन चुकी है कि आर्थिक मोर्चे पर सबकुछ चौपट हो चुका है। मोदी मार्क-2 को इस विषय पर सोचने की जरूरत है और इस सोच से दूर ही रहना होगा कि संदेश देना महज एक चक्रीय समस्या है, संरचनात्मक नहीं। सच कहें तो यह विशुद्ध रूप से संरचनात्मक समस्या है। इसकी शुरुआत खुद प्रधानमंत्री से होती है और इसकी जड़ें 2002 के दंगों के बाद उन पर लगातार हुए निजी हमलों से जुड़ी हैं। 
 
मोदी विपक्ष और मीडिया को पूरी तरह नजरअंदाज करते रहे हैं। आपको 24 मई, 2013 को हिंदू बिज़नेसलाइन के अहमदाबाद संस्करण की शुरुआत के मौके पर दिया गया उनका भाषण सुनना चाहिए। उस समय मैं उसी समाचारपत्र से जुड़ा था। मोदी का संदेश साफ था, 'मुझे आपमें से किसी की भी जरूरत नहीं है'। आप इसे यूट्यूब पर आसानी से देख सकते हैं। अहम पदों पर बैठे या पहले आसीन रह चुके कई लोगों ने भी माहौल खराब करने में योगदान दिया है। इसने हालात को बदतर बनाने का काम किया है। इन लोगों में प्रमुख रूप से प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के कुछ अंशकालिक सदस्य और सांख्यिकी आयोग के कुछ पुराने सदस्य, आरबीआई के एक पूर्व गवर्नर और एक पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार शामिल हैं। इन सबका मिलाजुला असर काफी विध्वंसकारी है।
 
यह महज संयोग नहीं है कि ये सभी लोग शिक्षक हैं जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वाले प्रावधान में तो यकीन रखते हैं लेकिन तर्कसंगत निषेध लगाने वाले अन्य संवैधानिक प्रावधानों में उनका यकीन नहीं होता है। अगर और कुछ नहीं तो शिष्टाचार ही आपसे संयमित आचरण की अपेक्षा रखता है। इतना सब होने के बावजूद यह अपने आप में एक बुरी खबर है। उत्पादन वृद्धि की दर सुस्त होने का ताल्लुक रोजगार वृद्धि दर से जोड़ ही दिया जाता है। इनमें से किसी की भी व्याख्या बुरी खबरों के प्रबंधन से नहीं की जा सकती है। ऐसे में सरकार को क्या करना चाहिए?
 
असली समस्या
 
मेरी नजर में समस्या कुछ ऐसी है: मुख्यमंत्री रहते समय मोदी मीडिया का ध्यान अपने से हटाकर अपने आर्थिक कदमों की तरफ ले जाने की कोशिश करते थे लेकिन प्रधानमंत्री बनने के बाद वह इसका ठीक उलटा काम करते रहे हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) के किसी अधिकारी को मोदी से यह कहने की जरूरत है कि समस्या वह खुद हैं। पिछले प्रधानमंत्रियों के पास हमेशा कोई ऐसा व्यक्ति होता था जो उनसे यह बात बोल सकता था। पी एन हक्सर से शुरू होकर यह सिलसिला पुलक चटर्जी पर आकर खत्म हो जाता है। यह तरीका हमेशा कारगर नहीं रहा है लेकिन यह हमेशा नाकाम भी नहीं हुआ। 
Keyword: nirmala sitaraman, bank, merge,,
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