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वृहद आर्थिक प्रबंधन का समुचित आकलन

अजय शाह /  September 03, 2019

वृहद आर्थिक नीति के बेहतर आकलन के साथ आमतौर पर कुछ दिक्कतें जुड़ी रहती हैं। ऐसी ही तीन समस्याएं और उनके निराकरण के बारे में विस्तार से चर्चा कर रहे हैं अजय शाह 

 
कठिन वक्त में समय पर विश्वसनीय आंकड़ों का न हासिल हो पाना भी एक बड़ी समस्या है। देश की अर्थव्यवस्था के बारे में जानकारी देने वाली कई व्यवस्थाओं में गड़बड़ी है। आंकड़े भी देरी से प्राप्त होते हैं। सालाना आधार पर होने वाली वृद्घि दर भी तात्कालिक जानकारी नहीं देती। इन समस्याओं के तीन हल हैं। हमें ऐसे आंकड़ों पर जोर देना चाहिए जिनके आकलन के तरीके मजबूत हों। समय-समय पर होने वाला समायोजन, ताजा हालात के आकलन को आसान बनाता है। भारत में हमें प्राय: वृहद आर्थिक दिक्कतों और वित्तीय तनाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे वक्त में एक अहम बाधा है सूचना की कमी। चीजें कहां गलत हो रही हैं इसे समझने के लिए और समय पर हल तलाश करने के लिए जरूरत यह है कि हमारे पास ताजातरीन सूचना उपलब्ध रहे। मोटे तौर पर तीन समस्याएं हैं। पहली कमजोर कड़ी है सूचना के स्रोतों की विश्वसनीयता। आर्थिक जगत के आंकड़ों को देखें तो उसके कई तत्त्व अवधारणात्मक अथवा क्रियान्वयन संबंधी दिक्कतों भरे होते हैं। सीमित राज्य क्षमता के कारण इसका अनुमान तो होना ही चाहिए। अगर स्कूली शिक्षक पढ़ाने के लिए स्कूलों में नहीं आते हैं तो हमें उस समय आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए जब डेटा संग्रह के लिए जवाबदेह अधिकारी आंकड़े एकत्रित करने के लिए बाहर न निकलें। यह देखकर भी कतई चौंकने की आवश्यकता नहीं है कि देश की राज्य व्यवस्था द्वारा जुटाए गए आंकड़े खासे कमजोर होते हैं। 
 
अगर वे भरोसेमंद हों भी तो भी वे खासी देरी से प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिए अगस्त महीना समाप्त होने वाला है लेकिन बैंक ऋण संबंधी ताजा आंकड़े जून महीने के हैं जबकि सीमेंट उत्पादन के आंकड़े मई के हैं। चालू खाता घाटा और सूचीबद्घ कंपनियों के बारे में मार्च की जानकारी ही उपलब्ध है। आंकड़ों की जानकारी रहस्यमय ढंग से शुरू और बंद होती रहती है। देश के आर्थिक समुदाय द्वारा साल दर साल आधार पर एकत्रित आंकड़े प्रयोग में लाए जाते हैं। इससे उनकी गुणवत्ता और खराब होती जाती है क्योंकि ये काफी पुराने हो जाते हैं। साल दर साल आधारित आंकड़े चार तिमाहियों के औसत पर आधारित होते हैं। 2019 की चौथी तिमाही में दिखने वाली साल दर साल वृद्घि दर असल वर्ष की चारों तिमाहियों का औसत होती है।
 
इन समस्याओं से निपटने के अर्थशास्त्रियों के तीन तरीके हैं। पहला है मजबूत आकलन। हमारे देश में हम आंकड़ों का इस्तेमाल बिना आलोचना के आशावादी ढंग से नहीं कर सकते। डेटा के हर प्रयोगकर्ता को तमाम आंकड़ों को हासिल करने के तरीकों और उनके स्रोत पर पूर्ण आधिपत्य करना होता है। इसके बाद ही इनके भरोसेमंद होने के बारे में कोई निर्णय लिया जा सकता है। किस डेटा का भरोसा किया जा सकता है यह तय करना आसान नहीं है। दूसरा हल सालाना वृद्घि से तिमाही वृद्घि के समय-समय पर समायोजित आंकड़ों पर स्थानांतरित होने में है। तिमाही दर तिमाही और बिंदु दर बिंदु शब्दों का इस्तेमाल एक दूसरे के स्थान पर होता है। अगर हम पारंपरिक सालाना वृद्घि पर नजर डालें तो वर्ष 2019 की पहली तिमाही काफी हद तक 2018 की पहली तिमाही की तरह नजर आती है। इनमें एक वर्ष पहले की तुलना में 9.04 फीसदी और 8.81 फीसदी वृद्घि नजर आती है। ये काफी हद तक उचित नजर आते हैं। यदि मुद्रास्फीति की दर को 4 फीसदी मान लिया जाए तो वास्तविक वृद्घि दर 5 फीसदी के करीब ठहरती है। 
 
सालाना आधार पर होने वाली बढ़ोतरी का हर पाठ कुछ और नहीं बल्कि तिमाही आधार पर हुए चार ताजातरीन अध्ययनों का औसत भर होता है। हमें बिंदु दर बिंदु सामयिक समायोजन पर अधिक ध्यान देना चाहिए। हमें यह देखना होगा कि दी गई अवधि में अर्थव्यवस्था किस प्रकार विकसित हुई। हमें इसे सालाना आधारित वृद्घि दर की धीमी सूचना के बरअक्स रखकर देखना होगा। उदाहरण के लिए हमने देखा कि 2017 की चौथी तिमाही से 2018 की तीसरी तिमाही तक वृद्घि में इजाफा हुआ और उसके बाद इसमें गिरावट आने लगी। 2018 की तीसरी तिमाही में साल दर साल आधार पर वृद्घि में 17.38 फीसदी का सुधार दिखा लेकिन बिंदु दर बिंदु आधार पर इसमें 11.71 फीसदी की वार्षिक गिरावट नजर आ रही थी। 
 
यहां दो दिक्कतें एक साथ नजर आती हैं। सूचीबद्घ कंपनियों के प्रदर्शन के जो ताजातरीन आंकड़े हमें अगस्त 2019 में देखने को मिल रहे हैं वे जनवरी-मार्च 2019 तिमाही के हैं। वहीं पारंपरिक साल दर साल आंकड़ों की बात करें तो मार्च 2019 तिमाही के आंकड़े अपै्रैल 2018 से मार्च 2019 तिमाही के औसत आंकड़े प्रस्तुत करते हैं। जाहिर है यह जानकारी पुरानी है और ऐसे में वृहद अर्थव्यवस्था पर ताजा विचार प्रक्रिया को बाधित करती है। कायदा तो यह है कि जब सालाना आधार पर वृद्घि बढ़े तो इसका अर्थ यह है कि बिंदु दर बिंदु भी काफी अच्छी और मजबूत वृद्घि देखने को मिली है। उदाहरण के लिए 2017 की तीसरी तिमाही के 5.91 फीसदी से बढ़कर चौथी तिमाही में साल दर साल वृद्घि 10.12 फीसदी हो गई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि चौथी तिमाही में बिंदु दर बिंदु वृद्घि बढ़कर 20.7 फीसदी हो गई थी। 
 
भले ही हम सामयिक समायोजन की प्रक्रिया को अपना लें तो भी सितंबर 2019 में ही हम यह जान पाएंगे कि जून 2019 तिमाही में क्या हुआ था। हम बेहतर प्रदर्शन कैसे कर सकते हैं? ऐसे में प्रमुख संकेतकों का निर्माण हमारी मदद कर सकता है। तमाम वृहद आर्थिक और वित्तीय शृंखलाएं प्रमुख कारोबारी चक्र से संचालित नहीं होतीं। उदाहरण के लिए दुनिया भर में एक नियमन पर काफी जोर रहता है कि रोजगार थोड़ा ठहरकर प्रतिक्रिया देता है। अच्छा वक्त पूरी तरह स्थापित हो जाने के बाद ही नियोक्ता अपने यहां कर्मचारियों की नियुक्ति बढ़ाते हैं। वहीं बहुत गहरी कठिनाई आने के बाद ही कर्मचारियों को निकाला जाता है। ऐसे में कहा जा सकता है कि कारोबारी चक्र के साथ रोजगार शृंखला की प्रतिक्रिया थोड़ी थमकर आती है। 
 
इसके उलट कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं जो प्रमुख संकेतक होते हैं। उनमें बदलाव कारोबारी चक्र में बदलाव आने से एक-दो तिमाही पहले ही नजर आने लगता है। भारतीय तिमाही समय शृंखला के हिसाब से देखें तो छह ऐसे संकेत हैं जो मुख्य कारोबारी चक्र को प्रभावित करते हैं: भारी वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री, तिपहिया वाहनों का उत्पादन, कार उत्पादन, इक्विटी जारी होना, सीएमआईई कैपेक्स डेटाबेस में नई परियोजनाओं का शामिल होना और सीएमआईई कैपेक्स सूचकांक में मूल्य और इक्विटी अनुपात का स्तर। इनका औसत एक ऐसा सूचकांक प्रदान कर सकता है जो एक अहम संकेतक साबित हो सकता है। इसकी सहायता से हम कारोबारी चक्र के आरंभ में ही जरूरी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। 
Keyword: economic policy, GDP, data,
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