बिजनेस स्टैंडर्ड - विनिवेश के जोखिम
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विनिवेश के जोखिम

संपादकीय /  September 03, 2019

सरकार अपने नियंत्रण वाली तेल कंपनी भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) में अपनी हिस्सेदारी एक अन्य तेल उपक्रम इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (आईओसी) को बेचने की कथित तौर पर तैयारी कर रही है। इस हिस्सेदारी बिक्री के बाद एक विशाल तेल विपणन कंपनी वजूद में आएगी जिसका भारत में पेट्रोल पंपों के दो-तिहाई और शोधन क्षमता के 40 फीसदी और विमानन ईंधन स्टेशनों के भी बड़े हिस्से पर नियंत्रण होगा। हालांकि सरकार की रुचि बड़े आकार में अधिक नहीं दिखती है। उसकी नजर उस पैसे पर है जो उसे बीपीसीएल में अपनी हिस्सेदारी बेचने पर आईओसी से मिलेगा। वर्तमान मूल्य पर यह हिस्सेदारी करीब 40,000 करोड़ रुपये की है। इतनी राशि मिलने पर सरकार को चालू वित्त वर्ष में विनिवेश से 1.05 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य हासिल करने में बड़ी मदद मिलेगी। पिछले कुछ वर्षों में इस तरह के सौदे हुए भी हैं। वर्ष 2017-18 में सार्वजनिक क्षेत्र के तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) ने एक अन्य तेल उपक्रम हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) का इतनी ही राशि में अधिग्रहण किया था। आज की तरह उस समय भी हिस्सेदारी बिक्री का मकसद पेट्रोलियम क्षेत्र में क्षमता बढ़ाने के बजाय विनिवेश लक्ष्य को हासिल करना ही था।

 
लेकिन यह एक विनिवेश कार्यक्रम या सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी चलाने का कोई तरीका नहीं है। दावा किया जाता है कि सरकार सार्वजनिक उपक्रमों को सक्षम ढंग से चलाने की इच्छुक है लेकिन ऐसा लगता है कि वह इन उपक्रमों को अपने खर्चे पूरा करने के लिए पैसे देने वाली बड़ी गायों से कुछ ज्यादा नहीं समझती है। आईओसी और बीपीसीएल दोनों ही उपक्रमों के शेयर इस संभावित बिक्री की खबर आते ही गिर पड़े। इससे पता चलता है कि निवेशकों की नजर में यह बिक्री इन दोनों कंपनियों के लिए कोई अच्छा विचार नहीं है। ऐसे फैसलों और समग्र तौर पर खराब प्रबंधन ने सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में खासा मूल्य विध्वंस कर दिया है। यह साफ होना चाहिए कि विलय के बारे में ऐसा कोई भी फैसला लेते समय कंपनियों के हितों को ध्यान में रखा जाना चाहिए था, खास तौर पर आईओसी के कोष और उसकी उधारी क्षमता के बारे में क्या किया जा सकता था?
 
इस समय आईओसी का शुद्ध ऋण 72,000 करोड़ रुपये से अधिक है और उसके पास नाममात्र नकदी ही है। उसने इस वित्त वर्ष के लिए पहले से ही 25,000 करोड़ रुपये के पूंजी व्यय की योजना बना रखी है जो वास्तव में जरूरत से कम ही लगती है। आईओसी के चेयरमैन ने इस साल की शुरुआत में कहा था कि उनकी कंपनी अगले पांच-सात वर्षों में दो लाख करोड़ रुपये का निवेश करना चाहती है। क्या बीपीसीएल में सरकारी हिस्सेदारी को खरीदकर अपना कर्ज और बढ़ाने की योजना आईओसी के पूंजी निवेश एजेंडे से मेल खाती है? अगर ऐसा नहीं है तो फिर सरकार पेट्रो-रसायन क्षेत्र को सक्षम बनाने के नाम पर इस खरीद को किस तरह सही ठहरा सकती है? इस कदम से इस क्षेत्र में पूंजीगत व्यय साफ तौर पर प्रभावित होगा।
 
सार रूप में कहें तो यह आईओसी की उधारी क्षमता और आंशिक सॉवरिन गारंटी का इस्तेमाल करने की एक कोशिश है ताकि सीधे उधार लेने के बजाय पैसे सरकारी खजाने में भेजे जा सकें। यह कुछ वैसा ही है जैसा इसने सरकारी नियंत्रण वाली अन्य कंपनियों में आकस्मिक देनदारियां बढ़ाने का काम किया है। भारतीय खाद्य निगम जैसी सार्वजनिक कंपनी में भी सरकारी व्यय को पूरा करने के लिए ऐसा हो चुका है। इससे न तो निजी निवेश बढ़ेगा और न ही सार्वजनिक क्षेत्र की क्षमता बढ़ेगी। यह दुर्भाग्य की बात है कि आज के दौर में यह एक बुरी आदत बनती जा रही है। 
Keyword: disinvest, BPCL, IOC, oil, gas,,
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