बिजनेस स्टैंडर्ड - ऊंचे जोखिम वाले प्रावधान कर सकता था आरबीआई: राकेश मोहन
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ऊंचे जोखिम वाले प्रावधान कर सकता था आरबीआई: राकेश मोहन

सोमेश झा /  09 02, 2019

बीएस बातचीत

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर और विमल जालान समिति के उपाध्यक्ष रहे राकेश मोहन का कहना है कि केंद्रीय बैंक का पुराना आर्थिक पूंजी ढांचा कुछ अधिक सख्त था। मोहन ने सोमेश झा को टेलीफोन पर दिए साक्षात्कार में जालान समिति के सामने नया ढांचा पेश करने से जुड़ी चुनौतियों के बारे में भी बताया है। पेश हैं संपादित अंश:

विमल जालान समिति की अनुशंसाओं को आरबीआई के बोर्ड में दी गई स्वीकृति को आप किस तरह देखते हैं?

बिजनेस स्टैंडर्ड ऊंचे जोखिम वाले प्रावधान कर सकता था आरबीआई: राकेश मोहनआरबीआई बोर्ड ने इस सुझाव को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है कि पुनर्मूल्यांकन आरक्षित कोष नहीं बांटा जा सकता है। पिछले साल यह मुद्दा विवाद का प्रमुख विषय रहा था। ऐसे में बोर्ड का यह कदम सराहनीय है। दूसरा, हमने मौद्रिक एवं वित्तीय स्थायित्व के लिए एक  दूरदर्शी आकस्मिक जोखिम बफर के तौर पर बहीखाते का 6.5-5.5 फीसदी दायरा रखने का सुझाव दिया है। हालांकि आरबीआई एवं सरकार दोनों के नजरिये से मुझे लगता है कि इसके निचले स्तर तक जाना अधिक दूरदर्शी नहीं होगा। इस साल का अधिशेष सामान्य से अधिक था लिहाजा किसी भी हाल में बड़ी राशि का हस्तांतरण होना ही था। अगर बहीखाता 10 फीसदी की दर से बढ़ता है तो इसे बहीखाते के 5.5 फीसदी स्तर पर बनाए रखने के लिए जरूरी है कि आकस्मिक रिजर्व बफर भी 10 फीसदी की दर से बढ़े। इसका मतलब होगा कि अगले साल अधिशेष का कुछ हिस्सा अपने पास बनाए रखना होगा ताकि आकस्मिक रिजर्व बफर को निचले दायरे में बनाए रखा जाए। इसका मतलब है कि अधिशेष से 20,000 करोड़ रुपये अगले साल बनाए रखने होंगे।

आपका मतलब है कि आरबीआई का अधिशेष वितरण अगले साल कम हो जाएगा?

यह अधिशेष की मात्रा पर निर्भर करता है। इस साल अधिशेष के सामान्य से अधिक होने से अगले साल भी इसी तरह का अधिशेष होने की संभावना कम ही है। अगले साल आरबीआई अपना समूचा अधिशेष हस्तांतरित नहीं कर पाएगा क्योंकि इसका एक हिस्सा आकस्मिक जोखिम बफर के मद में भी जाएगा।

समिति ने आरबीआई के विभिन्न जोखिम प्रावधानों के लिए एक स्पष्ट संख्या देने के बजाय दायरा क्यों रखने को कहा है?

अगर एक स्पष्ट संख्या दी जाती तो वह एक गलती होती। अगर आप मौद्रिक नीति समिति के मुद्रास्फीति लक्ष्यों को देखें तो वह चार फीसदी से दो फीसदी कम-ज्यादा है। यह नीति निर्माण का एक अहम पहलू है। ऐसे में अगर समिति कोई दायरा नहीं रखती तो वह बड़ी गलती होती। उसके बाद यह निर्णयकर्ताओं पर है कि वे सभी हालात पर गौर कर दायरे के बारे में फैसला करें।

क्या आरबीआई का आर्थिक पूंजी ढांचा काफी रुढि़वादी था?

यह विचार का विषय है। निश्चित रूप से हम जोखिम मानकों के संदर्भ में कुछ हद तक अलग राय रखते हैं और हम अपने निर्णय पर कायम हैं। अगर एक केंद्रीय बैंक को कोई गलती करनी है तो मैं यही चाहूंगा कि वह रुढि़वादी मत की ही गलती करे। यह दलील भी दी जा सकती है कि पुराना ढांचा काफी कड़ा था।

समिति ने पुनर्मूल्यांकन अधिशेष के इस्तेमाल के खिलाफ सलाह दी है लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि इसका इस्तेमाल सार्वजनिक बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए हो सकता है। आपकी क्या राय है?

रिपोर्ट में इसकी ठीक से व्याख्या की गई है। पुनर्मूल्यांकन रिजर्व विदेशी मुद्रा रिजर्व के पुनर्मूल्यांकन से आता है और यह एक लेखा  इकाई है। अगर रुपये का मूल्य गिरता है तो बहीखाते में देनदारी का वैसा ही आंकड़ा दर्ज होता है। यह लेखांकन की मानक परंपरा है। पुनर्मूल्यांकन खाता कभी भी किसी कंपनी में वितरित नहीं होता है। पिछले 10 वर्षों के भीतर आरबीआई का विदेशी मुद्रा भंडार बहीखाते का 60-90 फीसदी रहा है और यह अभी करीब 70 फीसदी के स्तर पर है। रुपये के सांकेतिक मूल्यह्रïास से पुनर्मूल्यांकन रिजर्व बढ़ रहा है। दूसरी तरफ अगर रुपया सांकेतिक संदर्भों में गिरता है तो पुनर्मूल्यांकन रिजर्व नीचे आ जाता है। इस तरह यह बाजार जोखिम का असरदार ढंग से ध्यान रखता है। इस तरह इसके वितरण को कोई भी तरीका नहीं है। अगर आप फिर भी ऐसा करते हैं तो आपको उसी समय विदेशी मुद्रा भंडार भी बेचना होता है।

अभिषेक आनंद, जोश फेल्मन, नवनीरज शर्मा और अरविंद सुब्रमण्यन के एक शोधपत्र के मुताबिक आरबीआई के पास 2018-19 में करीब पांच लाख करोड़ रुपये का अधिशेष था। लेकिन जालान समिति इस आंकड़े पर नहीं पहुंची। आपकी नजर में आरबीआई का अधिशेष रिजर्व कैसा दिखता है?

आपको मूल बिंदुओं पर देखने की जरूरत है। पुनर्मूल्यांकन रिजर्व वितरित नहीं किए जा सकते हैं और वह आंकड़ा फौरन गिर जाता है। हमने बफर का दायरा भी दिया है। उस शोधपत्र को एकदम गलत समझा गया है और दुनिया में कहीं भी ऐसा नजरिया नहीं अपनाया जाता है।

यही तर्क सरकार ने पिछले साल भी दिया था जब उसने आरबीआई के पास तीन लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त रिजर्व होने की बात कही थी...

यह स्पष्ट तौर पर एक दोषपूर्ण रवैया था। उसमें न तो परिसंपत्तियों के आकार और संयोजन पर ध्यान दिया गया और न ही आरबीआई बहीखाते की देनदारी के चरित्र एवं संरचना का ख्याल रखा गया था। मुझे उम्मीद है कि जालान समिति की रिपोर्ट ने इन सभी बिंदुओं को सही परिप्रेक्ष्य में पेश किया है।

समिति को सात महीनों के भीतर अपने सुझाव तैयार करने में किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ा?

पहली चुनौती तो जालान समिति की नियुक्ति से संबंधित संदर्भ ही था। वर्ष 2016-17 की आर्थिक समीक्षा का जिक्र करते हुए कहा गया था कि आरबीआई के पास 4.5-7 लाख करोड़ रुपये का अतिरिक्त भंडार है। पिछले साल इस मुद्दे पर पैदा हुए हालात को देखते हुए यह मुद्दा बेहद संवेदनशील था। तत्कालीन गवर्नर ऊर्जित पटेल के इस्तीफे के पीछे इसे भी एक वजह माना जाता है। ऐसे में जालान समिति के सामने सबसे पहली चुनौती यही थी कि ऐसी रिपोर्ट तैयार की जाए जो राजनीतिक मंशा वाली न हो और निष्पक्ष विश्लेषण किया जाए। आरबीआई के बहीखाते का गुण-दोष के आधार पर परीक्षण कर समुचित सुझावों तक पहुंचना काफी चुनौतीपूर्ण काम था
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