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कृत्रिम मेधा की मदद से कानून की राह आसान

आशिष आर्यन /  September 02, 2019

कानूनी फर्म सिरिल अमरचंद मंगलदास (सीएएम) में कृत्रिम मेधा (एआई) और नवोन्मेष प्रमुख के पद पर रहते हुए कोमल गुप्ता के लिए पहले छह महीने मुश्किलों भरे थे। उनकी नौकरी का एक काम वकीलों की एक टीम तैयार करना था जो कंपनी द्वारा अधिग्रहीत किए गए एआई टूल 'कीरा' के साथ काम कर सकें। उनका दूसरा और इससे भी जटिल काम फर्म के पार्टनर्स को इस टूल का उपयोग करने के लिए राजी करना और उन्हें भरोसा दिलाना कि इससे सहयोगियों को सहायता मिलेगी। गुप्ता कहती हैं, 'एक फर्म के लिए किसी तकनीक को अपनाना आसान काम होता है। हालांकि इसका सफल क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण होता है और तकनीक को समझने एवं इस्तेमाल करने के लिए विशिष्ट कौशल, इच्छा तथा क्षेत्र संबंधी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है। हमें तकनीक को कामकाज में लाने से पहले इसकी सटीकता के परीक्षण भी करने होते हैं। अच्छे परिणामों के लिए इस प्रक्रिया को लगातार बनाए रखना होता है।' 

 
वर्ष 2017 में सीएएम भारत में एआई तकनीक का उपयोग करने वाली पहली लॉ फर्म बनी। इसके बाद कंपनी ने 6 सदस्यों की एक टीम बनाई जो दस्तावेजों से आवश्यक जानकारी जुटाते थे जिससे तथ्यों को दोबारा जांचा जा सके। कंपनी एआई टूल का उपयोग सफलतापूर्वक कर रही है। उदाहरण के लिए, एक सफेदपोश अपराध की जांच के लिए दस्तावेजों की समीक्षा कर रहे वकीलों ने कीरा टूल का उपयोग किया जिससे दोहरे कागजात को हटा दिया गया और जांच के लिए उपलब्ध 60,000 कागजात की संख्या घटकर 45,000 रह गई। कंपनी बताती है, 'एक अन्य मामले में किसी विशिष्ट मापदंड की खोज करने के लिए हमें एक सप्ताह में लगभग 1,200 कागजातों को पढऩा था। एआई टूल के उपयोग से दक्षता में 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और समय की भी बचत हुई।' 
 
सीएएम भारत की उन चुनिंदा कानूनी फर्म में से एक है जो एआई और मशीन लर्निंग तकनीक का उपयोग कर रही हैं। अधिकांश दूसरी कानूनी फर्म के लिए तकनीक का उपयोग अभी भी पहेली बना हुआ है। हालांकि उन्हें तकनीक के लाभ के बारे में जानकारी है लेकिन उन्हें फिलाहल इसके उपयोग के तरीके की सही जानकारी नहीं है। हालांकि विभिन्न कानूनी फर्म के एआई विशेषज्ञ कहते हैं कि वर्तमान स्थिति में किसी भी समय बड़ा बदलाव आ सकता है। सीएएम के मैनेजिंग पार्टनर सिरिल श्रॉफ कहते हैं, 'कानूनी प्रैक्टिस के लिए समस्या समाधान क्षमता और भावनात्मक बुद्धि की आवश्यकता होती है। इस कौशल को प्रत्यक्ष तौर पर तकनीक से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, हम जटिल और हमेशा बदलते रहने वाले वैश्विक माहौल में काम कर रहे हैं। तकनीक क्षेत्र का कोई भी नया अविष्कार कानूनी क्षेत्र को पूरी तरह से बदल सकता है। एआई तकनीक मानव बुद्धिमत्ता पर आधारित होती है और हम उसे जितना स्मार्ट बनाएंगे, वह उतनी ही स्मार्ट होगी।'
 
निशीथ देसाई एसोसिएट्स में प्रमुख (कानून और वैश्विक कर सलाहकार) केतन पारिख इससे सहमत हैं। वह कहते हैं, 'एआई नवजात बच्चे की तरह है। आप बच्चे को एक निश्चित तरीके से बात करना सिखाते हैं। जब बच्चा गलतियां करता है तो वह इससे सीखता है। एआई के साथ भी ऐसा ही है।' उन्होंने कहा कि कानूनी क्षेत्र में आंकड़ों के बेहतर समुच्चय नहीं होने से इस क्षेत्र में एआई का उपयोग जटिल काम है। कानूनी मामलों की विशिष्ट संदर्भ में जानकारी काफी महत्त्वपूर्ण होती है क्योंकि इससे किसी निष्कर्ष तक पहुंचने में एआई को आसानी होगी। यह भी फिलहाल उपलब्ध नहीं है। हालांकि पारिख कहते हैं कि अगर संदर्भ विशेष की जानकारी उपलब्ध हो, तब भी एआई का उपयोग तत्काल राहत देने के उपाय के तौर पर नहीं किया जा सकता। 
 
वर्तमान में आधिकांश कानूनी फर्म साधारण और दैनिक काम के लिए एआई का उपयोग कर रही हैं। कुछ इस तरह का काम जो इंटर्न या जूनियर वकीलों द्वारा किया जाता है। एल ऐंड एल पार्टनर्स के संस्थापक और प्रबंध निदेशक राजीव लूथरा बताते हैं कि एनालिटिकल विशेषज्ञता या जटिल रीजनिंग वाले काम फिलहाल एआई द्वारा नहीं किए जा रहे। हालांकि निकट भविष्य में एआई के कारण वकीलों की नौकरी जाने का संकट नहीं है। लूथरा कहते हैं, 'वकीलों को पूरी तरह से हटाने या उनकी जगह अधिकांश काम स्वयं करने के लिए एआई को काफी समय लगेगा। फिलहाल एआई तकनीक को लागत कम करने और दक्षता बढ़ाने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है।' वह कहते हैं कि एआई को वकीलों के सहायक के तौर पर काम करने के लिए रखा जा सकता है। 
 
विशेषज्ञ कहते हैं कि फिलहाल न्यायपालिका में तकनीक का इस्तेमाल सीमित तौर पर ही किया जा सकता है। जे सागर एसोसिएट्स में संयुक्त प्रबंधन साझेदार शिवप्रिया नंदा कहती हैं, 'फिलहाल ऐसा होने नहीं जा रहा। हो सकता है कि लंबी अवधि में यह हो। विभिन्न न्यायालयों द्वारा एआई को अपनाना देश में डिजिटलीकरण की गति और विस्तार पर भी निर्भर करेगा।'
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