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खनन पट्टा क्षेत्र की सीमा में छूट का विरोध

जयजित दास / भुवनेश्वर September 02, 2019

अपनी इकाइयां कम क्षमता पर चलाने वाले अधिकांश द्वितीयक इस्पात भागीदारों और पेलेट विनिर्माताओं ने ओडिशा सरकार द्वारा केंद्र को दिए गए खनन पट्टा क्षेत्र की सीमा में छूट के प्रस्ताव का कड़ा विरोध किया है। खदान एवं खनिज - विकास और विनियमन (एमएमडीआर) अधिनियम की धारा-6 (1) (बी) के तहत 10 वर्ग किलोमीटर या अधिक क्षेत्र वाले किसी भी पट्टाधारक को राज्य में और अधिक खनन पट्टा प्राप्त करने से रोकता है। रोक लगाने वाले इस नियम से बचने के लिए राज्य सरकार ने लौह अयस्क और संबंधित खनिजों के लिए यह सीमा संशोधित करके 58 वर्ग किलोमीटर करने के लिए केंद्रीय खान मंत्रालय को पत्र भेजा है। राज्य सरकार का यह तर्क इस तथ्य पर आधारित है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) के पास ओडिशा में तकरीबन 55.01 वर्ग किलोमीटर खदान पट्टा क्षेत्र है। इसके अलावा केंद्र सरकार द्वारा सेल के माध्यम से अंवेषण और दोहन केलिए 2.77 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र सुरक्षित रख लिया गया है। ध्यान देने वाली बात यह है कि झारखंड में खनन पट्टा क्षेत्र की सीमा को बढ़ाकर 75 वर्ग किलोमीटर और छत्तीसगढ़ में 50 वर्ग किलोमीटर किया जा चुका है।

 
केंद्रीय खान मंत्रालय, जिसने पहले राज्य का अनुरोध खारिज कर दिया था, अब नए सिरे प्रस्ताव की जांच कर रहा है। साथ ही मंत्रालय ने राज्य सरकार को कोई फैसला लिए जाने तक नीलामी प्रक्रिया रोकने का निर्देश दिया है। केंद्रीय खान मंत्रालय और राज्य सरकार के बीच झगड़े से ओडिशा के खनिज ब्लॉक की नीलामी को नुकसान पहुंचा है। वित्त वर्ष 19 में किसी भी ब्लॉक को ऑनलाइन नीलामी में नहीं लाया जा सका क्योंकि खदान पट्टा क्षेत्र की सीमा से संबंधित मामला मुकदमेबाजी में फंस गया था। इस वित्त वर्ष में भी राज्य सरकार कई ब्लॉकों की तैयारी के बावजूद केंद्र की ओर से लंबित निर्णय की वजह से उनकी नीलामी करने में असमर्थ रही है।
 
खनन पट्टा क्षेत्र की सीमा में छूट की योजना से नाराज द्वितीयक इस्पात और पेलेट विनिर्माताओं ने प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) और खान तथा इस्पात मंत्रालयों का दरवाजा खटखटाया है। छत्तीसगढ़ में स्पंज आयरन विनिर्माताओं को लगता है कि क्षेत्र की सीमा में छूट का विचार देश के लिए विनाशकारी है क्योंकि इससे संसाधन पर बड़ा एकाधिकार हो जाएगा। छत्तीसगढ़ स्पंज आयरन मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष विजय झांवर ने प्रधानमंत्री कार्यालय को लिखे पत्र में कहा है कि अगर नियम 6 (1) (बी) के तहत छूट दी जाती है तो दो या तीन बहुत बड़े एकाधिकार बन जाएंगे और छोटे तथा मध्य आकार के इस्पात संयंत्रों के साथ-साथ मझोले आकार की कंपनियों के पास खदान प्राप्त करने का कोई उपयुक्त अवसर नहीं रहेगा। यहां तक ​​कि छोटे इस्पात उत्पादकों के समूह भी प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम नहीं रहेंगे।
 
समान विचार प्रकट करते हुए अथा ग्रुप के कार्यकारी निदेशक अमित गुप्ता ने कहा कि सरकार को खनन पट्टा क्षेत्र की सीमाओं में राहत नहीं देनी चाहिए क्योंकि इस कदम से दो या तीन बड़े भागीदारों को प्रोत्साहन मिलेगा, जबकि ओडिशा के उत्पादन में 50 प्रतिशत का योगदान करने वाले द्वितीयक इस्पात विनिर्माताओं को दिक्कत होगी। कोलकाता के अथा गु्रप की खनन और इस्पात बिलेट एवं स्पंज आयरन उत्पादन में दिलचस्पी है।  अपने दावों के समर्थन में पेलेट विनिर्माताओं का कहना है कि खदान पट्टा क्षेत्र की सीमा में किसी भी छूट से लौह अयस्क का अन्यायपूर्ण केंद्रीकरण होगा जिससे चुनिंदा लाइसेंसधारियों की ओर से एकाधिकार सृजित होगा। पेलेट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (पीएमएआई) के अध्यक्ष मनीष खरबंदा ने कहा कि जहां एक ओर सेल के पास झारखंड और छत्तीसगढ़ में अपने पट्टों के अलावा ओडिशा में 55.01 वर्ग किलोमीटर लौह अयस्क का पट्टा है, वहीं दूसरी ओर झारखंड में टाटा स्टील के पास अपने पट्टों के अलावा ओडिशा में लौह अयस्क और संबंधित खनिजों के लिए 49.61 वर्ग किलोमीटर का पट्टा है। उन्हें बिना किसी प्रीमियम भुगतान के इन पट्टों का आवंटन किया गया है।
Keyword: iron ore, export, import, steel, lease,,
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