बिजनेस स्टैंडर्ड - रिजर्व बैंक से धन लेना सरकार के लिए बहुत फायदेमंद नहीं
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रिजर्व बैंक से धन लेना सरकार के लिए बहुत फायदेमंद नहीं

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  September 02, 2019

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने विमल जालान समिति की सिफारिशों के आधार पर पिछले सप्प्ताह सोमवार को जो फैसला किया, वह वित्त मंत्रालय में बैठे उन लोगों के लिए निराशाजनक था जो केंद्रीय बैंक के भंडार में से और अधिक राशि मिलने की उम्मीद लगाए बैठे थे। लेकिन इससे भी बड़ी निराशा सरकार का इंतजार कर रही है। पांच महीने बाद जब फरवरी में वह देश का अगला बजट पेश करेगी, तब उसके हाथ यह निराशा हाथ लगेगी। मोदी सरकार को अपनी कार्यशैली के बारे में भी राजनीतिक सवालों का सामना करना पड़ेगा। कई महीनों की माथापच्ची के बाद भी अगर सरकार को आरबीआई से इतनी ही राशि हासिल हो पाई, तो इससे सवाल पैदा होता है कि क्या यह पूरी कवायद सरकार के लिए उल्टी पड़ी?

 
जालान समिति का गठन दिसंबर 2018 में किया गया था। समिति को आरबीआई के लिए भंडार का विवेकपूर्ण स्तर तय करना था। यह वह पूंजी है जिसे केंद्रीय बैंक को आर्थिक पूंजी ढांचे के रूप में अपने पास रखना है। सरकार को उम्मीद थी कि नए फॉर्मूले से आरबीआई बोर्ड सरकारी खजाने में ज्यादा पूंजी हस्तांतरित करेगा जिससे सरकार को अपने खर्चों के वित्तपोषण में मदद मिलेगी जो पर्याप्त संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे। लेकिन जालान समिति की सिफारिशों ने सरकार को आरबीआई के भंडार का फायदा उठाने की ज्यादा छूट नहीं दी। यह सही है कि केंद्रीय बैंक इस साल सरकार को करीब 1.76 लाख करोड़ रुपये हस्तांतरित करेगा। इसमें से 1.23 लाख करोड़ रुपये की पूंजी आरबीआई की शुद्घ आय से आई है। 2018-19 जुलाई-जून अवधि के दौरान खुले बाजार गतिविधियों से केंद्रीय बैंक को 3 लाख करोड़ रुपये मिले। 
 
शेष 53,000 करोड़ रुपये नए फॉर्मूले के तहत सरकार को हस्तांतरित किए गए ताकि आरबीआई का आपात भंडार उसके बहीखाते का 5.5 फीसदी रखा जा सके। यह समिति द्वारा सुझाए गए फॉर्मूले का न्यूनतम स्तर है। समिति ने आपात भंडार का स्तर 5.5 से 6.5 फीसदी रखने का सुझाव दिया था। 5.5 फीसदी फॉर्मूला लागू करने से पहले आरबीआई का आपात भंडार उसके बहीखाते का 6.8 फीसदी था।  इस तरह सरकार को केवल 58,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि हासिल हुई। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सरकार 2018-19 के बजट में पहले ही अंतरिम लाभांश के रूप में आरबीआई से पहले ही 28,000 करोड़ रुपये ले चुकी थी। 2019-20 के बजट में भी पहले ही केंद्रीय बैंक लाभांश के रूप में 90,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया जा चुका था।
 
यानी इतनी माथापच्ची और विवाद के बाद सरकार को जो पूंजी मिली वह देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का महज 0.3 फीसदी है। यह न केवल बढ़ते खर्च को पूरा करने के लिए नाकाफी है बल्कि इससे राजस्व की कमी को भी पूरा नहीं किया जा सकेगा।  आगे स्थिति के और खराब रहने की आशंका है। 2020-21 के दौरान आरबीआई की आय उस पूंजी से बहुत कम रहने का खटका है जो उसने 2019-20 में हस्तांतरित की। ऐसे में केंद्रीय बैंक के आपात भंडार में से अतिरिक्त लाभ मिलने की गुंजाइश नहीं होगी क्योंकि सुझाए गए फॉर्मूले के न्यूनतम स्तर पर पहले ही पहुंचा जा चुका है। आरबीआई बहीखाते के अगले वर्ष 7 से 10 फीसदी तक बढऩे की उम्मीद है, जिससे उसे अपनी आय में से ज्यादा पूंजी आपात भंडार में हस्तांतरित करने पड़ेंगे ताकि इसे बहीखाते के 5.5 फीसदी के स्तर पर रखा जा सके। करीब 6.6 लाख करोड़ रुपये के मुद्रा और स्वर्ण भंडार पर हाथ नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि जालान समिति के मुताबिक इस पूंजी का अन्यत्र इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। अगले साल सरकार को आरबीआई से मिलने वाली पूंजी में भारी गिरावट आएगी जिससे उसकी वित्तीय स्थिति पर बुरा बसर पड़ेगा।
 
इससे यह सवाल पैदा हो सकता है कि सरकार ने केंद्रीय बैंक के भंडार से ज्यादा पैसा लेने के लिए अपनी प्रतिष्ठा और राजनीतिक पूंजी को गंवा दिया। सबसे पहले फरवरी 2016 में पेश आर्थिक समीक्षा में आरबीआई से ज्यादा पूंजी हस्तांतरण की मांग की गई थी। एक साल बाद 2017 की आर्थिक समीक्षा में एक बार फिर यह मांग दोहराई गई। इसके पीछे यह तर्क दिया गया था कि इससे सरकार को बैंकों के पुनर्पूंजीकरण में मदद मिलेगी और सरकार का कर्ज कम होगा। अगले साल फिर वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने यह मुद्दा उठाया जबकि आरबीआई गवर्नर ऊर्जित पटेल ने इस बारे में अपनी आपत्तियों के बारे में सरकार को बता दिया था। 
 
आखिरकार, सरकार ने आरबीआई कानून की धारा 7 के तहत सरकार ने अक्टूबर 2018 में आरबीआई को एक सलाह जारी करके उसके आर्थिक पूंजी ढांचे पर विचार-विमर्श की मांग की जिससे जालान समिति का गठन हुआ। आरबीआई बोर्ड ने 19 नवंबर, 2018 की बैठक में इस समिति के गठन का फैसला किया। ऊर्जित पटेल ने 11 दिसंबर को अपने पद से इस्तीफा दिया। जालान समिति की कई बैठकें हंगामेदार रहीं। सरकार के प्रतिनिधि ने समिति की सिफारिशों पर असहमति जताते हुए हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। इस सरकारी प्रतिनिधि का किसी अन्य मंत्रालय में तबादला होने के बाद समिति ने आनन फानन में अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप दिया और इसे आरबीआई को सौंप दिया। आरबीआई बोर्ड ने 26 अगस्त को इसे मंजूरी दे दी। 
 
लेकिन इसका अंतिम परिणाम सरकार के लिए बहुत संतोषजनक नहीं हो सकता। आरबीआई के आर्थिक पूंजी ढांचे को नए सिरे से परिभाषित करने की कवायद और पटेल के इस्तीफे से सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच रिश्तों में पहले ही खटास आ गई थी। अब आगे सरकार की हताशा और बढ़ेगी क्योंकि इतनी माथापच्ची के बावजूद उसे आरबीआई से अपने खजाने में आने वाली पूंजी में उल्लेखनीय बढ़ोतरी करने के अपने लक्ष्य को हासिल करने में कोई मदद नहीं मिली।
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