बिजनेस स्टैंडर्ड - सुसंगत तात्कालिक कदम पर तय हो जल्द अमल
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Thursday, November 21, 2019 06:34 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

सुसंगत तात्कालिक कदम पर तय हो जल्द अमल

रथिन रॉय /  September 02, 2019

पिछले दिनों जिन आर्थिक उपायों की घोषणा की गई है, उनके क्रियान्वयन के लिए सरकार को एक तय कार्यक्रम घोषित करना चाहिए। इस विषय में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं रथिन रॉय 

 
मंदी की स्थिति से निपटने के लिए सुझाए गए कुछ वृहद आर्थिक उपायों ने मुझे चिंतित किया है। राजकोषीय प्रोत्साहन की मांग के लिए यह समय उपयुक्त नहीं है। इससे कुछ खास लाभ तो होगा नहीं बल्कि वर्ष 2014 के बाद से कड़ी मेहनत से हासिल की गई वृहद आर्थिक स्थिरता अलग जोखिम में पड़ जाएगी। दरों में आगे और कटौती के बजाय मौद्रिक और ऋण नीति पारेषण में सुधार की आवश्यकता है। विदेशी पूंजी के माध्यम से सॉवरिन व्यय करने से ऋण की स्थिति में तो कोई सुधार नहीं होगा, उलटे नकदी की स्थिति में गिरावट आएगी। 
 
फिलहाल सरकार के लिए जरूरी यह है कि वह तात्कालिक परिस्थितियों से जूझे।  इन परिस्थितियों में रुझानों की समस्या है और बैंकों तथा एनबीएफसी यानी गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियां ऋण देने की स्थिति में नहीं नजर आ रही हैं। सीमित राजस्व वृद्धि करने वाले कुछ कर उपाय जनता के रुझान को नकारात्मक ढंग से प्रभावित कर रहे हैं। वाहन उद्योग देश के आर्थिक प्रदर्शन का प्रमुख संकेतक बना हुआ है और इस क्षेत्र को पर्यावरण के अनुकूल बनाने संबंधी घोषणाओं के गलत स्पष्टीकरण के कारण यह क्षेत्र परेशानी से जूझ रहा है और सबसे बढ़कर मांग में कमी की ढांचागत समस्या को भी दूर करना होगा।
 
वित्त मंत्री ने गत शुक्रवार को इन चिंताओं को दूर करने के लिए कई उपायों की घोषणा की। ये उपाय व्यावहारिक हैं और ढांचागत मंदी को लेकर सुसंगत तात्कालिक कदमों को दर्शाते हैं। अच्छी बात यह है कि ऐसा करते हुए वित्तीय समझदारी का परिचय दिया गया है और किसी खास हित समूह के लिए प्रोत्साहन की व्यवस्था नहीं की गई है। कराधान के ठोस उपाय किए गए हैं और ये तत्काल या 1 अक्टूबर, 2019 से प्रभावी हो जाएंगे। इस दौरान विवादित लेकिन कम राजस्व सृजित करने वाले करों को समाप्त किया गया है और कारोबारी सामाजिक उत्तरदायित्व के उल्लंघन से जुड़े प्रावधान समाप्त किए गए हैं। बैंकों के पुनर्पूंजीकरण के लिए 70,000 करोड़ रुपये का आवंटन भी बजट प्रतिबद्धताओं के अनुरूप ही है। एक आवश्यक संस्थागत संकेत यह दिया गया है कि दरों में कटौती का पूरा लाभ ग्राहकों को मिलेगा। यह भी स्वागतयोग्य है। परंतु कई नीतिगत और परिचालन संबंधी मसले हैं जिन्हें हल करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए भारतीय स्टेट बैंक का मौजूदा रीपो संबद्घ पोर्टफोलियो उसके जमा का 22 फीसदी और ऋण का 30 फीसदी कवर करता है। बैंकों की ऋण वृद्घि फिलहाल उनकी जमा दर से तेज है। ऐसे में जमा दर में कटौती पारेषण में सुधार का विकल्प नहीं है लेकिन फंसे हुए कर्ज की समस्या अभी भी विकराल है। बैंकों को लगातार मार्जिन बरकरार रखने का प्रयास करना होगा। 
 
बहरहाल, प्रभावी क्रियान्वयन तब तक नहीं होगा जब तक कि सरकार के कदमों और आरबीआई के बीच सुसंगतता नहीं बन जाती। एक साझा खाका तैयार करने की आवश्यकता है जहां दरों को संबंधित उत्पादों से जोड़ा जाए और समग्र उत्पाद पोर्टफोलियो को दरों में बदलाव के साथ संबद्घ किया जाए। यह सब बिना बैंकिंग व्यवस्था के स्थायित्व के साथ कोई समझौता किए होना चाहिए। अगर विभिन्न प्राधिकार इस साझा उद्देश्य के साथ मिलकर काम करें तो इसे स्पष्ट होने में तीन महीने से अधिक वक्त नहीं लगना चाहिए। इस क्षेत्र में पर्याप्त विश्लेषण विशेषज्ञता मौजूद है जिसका किफायती अंदाज में इस्तेमाल किया जा सकता है। 
 
आवास वित्त कंपनियों को अतिरिक्त नकदी उपलब्ध कराना भी स्वागतयोग्य कदम है। अगर कहीं सार्वजनिक व्यय का मामला है तो बिना सब्सिडी सस्ते आवास के मामले में यह बेहतर है। भविष्य में नैशनल हाउसिंग बैंक के पूंजीकरण में इजाफा किया जा सकता है। इसकी परिचालन क्षमता जो इस समय एकदम उच्च स्तर पर है, उसे मजबूत किया जा सकता है। मेरा मानना है कि भविष्य में वित्त मंत्री को इनके अलावा ग्रामीण आय को स्थिर बनाने वाले सुधारों को अंजाम देने से जुड़ी घोषणाएं करनी चाहिए। इसके अलावा आवास वित्त कंपनियों से मिलने वाली जमीनी रिपोर्ट कहती है कि आंशिक ऋण गारंटी योजना प्रसंस्करण में देरी की शिकार है। इस मोर्चे पर तत्काल ऐसे कदम उठाने होंगे जो मंदी के इस दौर में प्रभावी साबित हों। 
 
बॉन्ड बाजार के विस्तार की बात भी स्वागतयोग्य है। जैसा कि वित्त मंत्री ने कहा बैंकिंग व्यवस्था के विकास के अभाव में यह जरूरी है कि तयशुदा और दीर्घावधि की पूंजी स्रोत और इक्विटी फाइनैंस के जरिये जुटाई जाए।  भारतीय कंपनियों को वैश्विक वित्तीय बाजारों तक पहुंच बनाने की सुविधा देने वाले उपाय भी काफी मजबूत हैं और अगर इनका उचित क्रियान्वयन किया गया तो इसका तत्काल असर देखने को मिलेगा। परंतु इसके साथ-साथ हमें यह भी समझना होगा कि विदेशी बाजारों में सीधे सॉवरिन बॉन्ड जारी करना प्रत्यक्ष तौर पर नीतिगत कदमों के साथ विरोधाभासी है। 
 
वाहन उद्योग की दिक्कतों से भी कुशलतापूर्वक निपटने का प्रयास किया गया है। इस आशंका को खत्म किया गया है कि बीएस-6 मानक के चलते वाहनों का मौजूदा तैयार जखीरा बेकार हो जाएगा। साथ ही इलेक्ट्रिक वाहनों को प्राथमिकता देने पर भी फिलहाल रोक लगाई गई है। वैसे भी वर्तमान में इन वाहनों का मतलब चीन से उन्हें आयात करना ही है।  कई प्रस्तावित उपायों को लागू करने के लिए कोई समय-सीमा तय नहीं की गई है। प्रशासनिक देरी और क्रियान्वयन की अड़चनें भी देश में अच्छे नीतिगत प्रस्तावों की राह की बाधा रहे हैं। यह अहम है कि सरकार इन उपायों के क्रियान्वयन के लिए तय समय सीमा घोषित करे। ऐसा इसलिए क्योंकि मौजूदा मंदी पर इनका सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। यह काफी हद तक क्रियान्वयन की गति और प्रभाव पर निर्भर करेगा। खासतौर पर बुनियादी परियोजनाओं पर अंतर मंत्रालयीन कार्यबल को कहीं अधिक तेजी से काम करना होगा। व्यय विभाग को भुगतान में देरी कम करने के लिए ठोस समय सीमा तैयार करनी होगी। उसे अधिकार संपन्न बनाने के साथ-साथ कैबिनेट सचिव के स्थान पर वित्त मंत्री के समक्ष जवाबदेह बनाना होगा। विभिन्न विभागों को स्पष्ट राजनीतिक संदेश मिलना चाहिए कि भुगतान में देरी को लेकर भविष्य में बहाने नहीं चलने वाले। 
 
मेरा मानना है कि यह पैकेज अर्थव्यवस्था की ढांचागत दिक्कतों को दूर करने में कामयाब नहीं होगा लेकिन ये कदम ढांचागत सुधारों की दिशा में बढऩे की पूर्व शर्त हैं। अब यह निजी क्षेत्र पर निर्भर करता है कि वह सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए मध्यम अवधि के ढांचागत सुधारों पर काम करता है अथवा नहीं।
 
(लेखक नैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनैंस ऐंड पॉलिसी के निदेशक हैं)
Keyword: nirmala sitaraman, economy, budget,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या सेबी के नए नियम से निवेशकों के हितों की होगी रक्षा?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.