बिजनेस स्टैंडर्ड - घर खरीदने की आए बारी तो बने बनाए मकान में समझदारी
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Tuesday, September 17, 2019 12:40 PM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम अर्थव्यवस्था खबर

घर खरीदने की आए बारी तो बने बनाए मकान में समझदारी

संजय कुमार सिंह /  September 01, 2019

पटना के 50 साल के कारोबारी रोहित कर्ण और उनकी पत्नी गरिमा पिछले छह महीने से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में एक अपार्टमेंट तलाश रहे हैं। 46 साल की गरिमा पेशे से स्कूल शिक्षिका हैं। मकान तलाशने में दोनों को जगह-जगह की खाक छाननी पड़ी है, मगर अभी तक काम नहीं बन पाया है। इसके पीछे रियल्टी की खस्ता हालत बड़ी जिम्मेदार है। हालांकि सरकार ने पिछले महीने ही अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए राहत का ऐलान किया है मगर उसका असर बाद में दिखेगा। फिलहाल गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की हालत कमजोर है, जिसकी सीधी चोट रियल एस्टेट उद्योग पर पड़ रही है। नकदी नहीं होने के कारण एनबीएफसी ज्यादा कर्ज नहीं दे पा रही हैं, जिस कारण रियल एस्टेट क्षेत्र भी  नकदी की किल्लत से जूझ रहा है।

यह देखकर रोहित और गरिमा फिक्र में पड़ गए हैं। रोहित कहते हैं, 'जब आप घर की खोज में निकलते हैं तो कई ऐसी परियोजनाएं मिलती हैं, जिनका निर्माण पिछले कुछ समय से बंद रहा है। अगर रियल एस्टेट क्षेत्र नकदी की किल्तत से इसी तरह जूझता रहा तो ठप होने वाली परियोजनाओं की फेहरिस्त और लंबी हो सकती है।' रोहित और उनकी पत्नी ने सभी विकल्पों पर विचार करने के बाद ही कोई फैसला लेने की सोची है।

नकदी की कमी ने दिया दुख

विशेषज्ञों का कहना है कि रियल्टी बिक्री में जो थोडी तेजी आई थी, उस पर सितंबर, 2018 में शुरू हुए संकट ने एकदम विराम लगा दिया है। इस समय रियल एस्टेट क्षेत्र ठप हुई परियोजनाओं से अटा पड़ा है। कई परियोजनाएं तो ऐसी हैं, जिनमें लंबे अरसे से कोई हलचल ही नहीं हुई है। एनारॉक प्रॉपर्टी कंसल्टेंट्स के चेयरमैन अनुज पुरी कहते हैं, 'देश के शीर्ष सात शहरों में 220 परियोजनाओं में करीब 1.74 लाख फ्लैट फंसे हैं। इनकी कुल कीमत 1,774 करोड़ रुपये के आसपास होगी। इन अटके फ्लैट में 66 प्रतिशत  (1.15 लाख यूनिट) पहले ही बिक चुके हैं।' पुरी के अनुसार डेवलपरों के पास नकदी की कमी की वजह से परियोजनाएं अटकी हुई हैं। 

इस संकट की वजह भी अनूठी है। सरकारी और निजी बैंक जब फंसी हुई या गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) के बोझ से कराह रहे थे और कर्ज देने से परहेज करते हुए मु_ïी बांधकर बैठे थे तब एनबीएफसी ने मौके का फायदा उठाने के लिए रियल एस्टेट परियोजनाओं को ताबड़तोड़ कर्ज बांटे। कर्ज देने की रफ्तार कितनी ज्यादा थी, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वर्ष 2011-12 में एनबीएफसी और आवास वित्त कंपनियों (एचएफसी) ने डेवलपरों को 64,000 करोड़ रुपये का कुल कर्ज दिया था। 2017-18 आने पर यह आंकड़ा 3.5 गुना से भी अधिक हो गया तथा 2.33 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। अक्टूबर-मार्च 2018 तक एनबीएफसी और एचएफसी की उधारी देने की रफ्तार थम गई।

जेएलएल इंडिया में मुख्य अर्थशास्त्री एवं शोध प्रमुख स्यमंतक दास कहते हैं, 'डेवलपरों को एनबीएफसी और एचएफसी द्वारा शुद्ध कर्ज आवंटन वर्ष 2017-18 के 52,000 करोड़ रुपये से कम होकर 2018-19 में 27,000 करोड़ रुपये हो गया।' एनबीएफसी और एचएफसी ने अब कर्ज आवंटन के लिए नियम-कायदे कड़े बना दिए हैं। कोलियर्स इंटरनैशनल इंडिया में राष्ट्रीय निदेशक (पूंजी बाजार एवं निवेश सेवाएं) गगन रणदेव कहते हैं, 'डेवलपरों को अब अधिक ब्याज चुकाना पड़ रहा है।'

कुल मिलाकर इतना तय है कि इस क्षेत्र को कर्ज अब भी मिल रहा है, यह बात अलग है कि इसकी मात्रा बहुत कम हो गई है। मैजिकब्रिक्स में प्रमुख (कन्टेंट ऐंड एडवाइजरी) जयश्री कुरुप कहती हैं, 'हाल में एक कार्यक्रम के दौरान बड़े संस्थागत निवेशकों ने कहा कि जिन डेवलपरों ने अपना बहीखाता दुरुस्त रखा है, उन्हें कर्ज देने में आपत्ति नहीं है।'दास ने कहा कि छोटे एवं मझोली एनबीएफसी/एचएफसी अब भी कर्ज दे रही हैं, लेकिन कर्ज का आकार बहुत छोटा कर दिया गया है यानी कम राशि दी जा रही है। 

सबवेंशन स्कीम से रहें दूर

राष्ट्रीय आवास बैंक (एनएचबी) ने हाल में ही एचएफसी को ऐसे ऋण देने से दूर हरने का निर्देश दिया है, जिनमें डेवपलर ग्राहकों के बदले किस्त चुकाते हैं। इलारा टेक्नोलॉजिज के समूह मुख्य परिचालन अधिकारी मणि रंगराजन कहते हैं, 'नई परियोजनाओं में करीब 30-35 प्रतिशत बिक्री सबवेंशन स्कीम के जरिये ही हुई थी।'

इस तरह डेवलपरों के लिए कम लागत वाले कर्ज का एक बड़ा स्रोत बंद हो गया है। रंगराजन बताते हैं, 'इस रास्ते डेवलपरों को 9 से 10 प्रतिशत की ब्याज दर पर रकम मिल जाया करती थी। इसके मुकाबले अब बॉन्ड बाजार से कर्ज लेने पर उन्हें 13-20 प्रतिशत तक ब्याज चुकाना पड़ रहा है।' पुरी के अनुसार एनबीएफसी संकट के बाद रियल एस्टेट डेवलपरों को प्राइवेट-इक्विटी कंपनियों से भी रकम मिलनी बंद हो गई है। रणदेव कहते हैं कि सबवेंशन स्कीम पर निर्भर रहने वाले मझोले डेवलपरों के लिए कारोबार करना मुश्किल साबित होने जा रहा है।

खरीदारों को भी इस योजना से लाभ हुआ था, क्योंकि शुरुआती रकम (डाउन पेमेंट) का भुगतान करने के बाद उन्हें फ्लैट का कब्जा मिलने तक कोई चिंता नहीं होती थी। जो खरीदार एक साथ किराया और ईएमआई पूर्व भुगतान नहीं कर सकते हैं, वे खरीदारी टाल सकते हैं। रंगराजन का कहना है कि डेवलपर नए सिरे से तैयारी में जुट गए हैं और कुछ ही हफ्तों में नया विकल्प लेकर आ सकते हैं।

तैयार फ्लैट में जोखिम नहीं

कम अनुभवी और जोखिम से दूर रहने वाले निवेशकों को इस वक्त रेडी-टु-मूव जायदाद चुननी चाहिए। रणदेव कहते हैं, 'रेडी-टु-मूव जायदाद खरीदने पर आप फ्लैट तैयार होने की राह में आने वाली बाधाओं से बच जाते हैं और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का भुगतान भी नहीं करना पड़ता है।' ऐसी संपत्ति महंगी जरूर होती है, लेकिन अंतर अधिक नहीं रहता है। कुरुप कहती हैं, 'इन दिनों बाजार में रेडी-टु-मूव और निर्माणधीन जायदाद की कीमत में ज्यादा से ज्यादा 5 से 8 फीसदी फर्क होता है।' वह कहती हैं कि थोड़े मोल-भाव और कुछ मुफ्त सुविधाओं की मांग कर आप यह अंतर दूर सकते हैं। दास का कहना है कि तैयार जायदाद मिलते ही आप उसमें रहना शुरू कर सकते हैं। इस तरह आप किराया देना फौरन बंद कर देते हैं और इस अंतर की भरपाई हो जाती है।

रेडी-टु-मूव फ्लैट ही बेहतर

निर्माणाधीन परियोजनाओं पर हाथ डालने से पहले गहन विचार करने की जरूरत होती है। रियल एस्टेट क्षेत्र के संकट से सभी डेवलपर एक समान रूप से प्रभावित नहीं हुए हैं। पुरी कहते हैं, 'मजबूत, वित्तीय तौर पर सक्षम कंपनियां समय पर परियोजनाएं पूरी करने के साथ ही नई योजनाएं भी लाएंगी। ऐसी कंपनियों को प्राइवेट इक्विटी कंपनियों का भी समर्थन हासिल होगा। उनकी निर्माणाधीन परियोजनाओं पर विचार किया जा सकता है।' 

पुरी के अनुसार निर्माण प्रगति की स्थिति साफ नहीं रखने वाले छोटे डेवलपरों की निर्माणाधीन परियोजनाओं से दूरी बरतनी चाहिए। जहां तक मझोले डेवलपरों की बात है तो इनकी परियोजनाओं में उतरने से पहले वित्तीय हालत जरूर खंगाल लें। सूचीबद्ध कंपनियों की वित्तीय खाताबही की जानकारी खंगालना आसान है। अधिक कर्ज से दबी डेवलपरों से परहेज करें। गैर-सूचीबद्ध कंपनियों की पड़ताल के लिए रियल एस्टेट नियामकीय प्राधिकरण (रेरा) की वेबसाइट पर जाएं। यहां पर आपको ऐसे डेवलपरों की परियोजना का लेखा-जोखा मिल जाएगा। कुरुप कहती हैं, 'जिस डेवलपर को अगले साल तीन या अधिक परियोजनाएं तैयार करनी हैं, उसे आगे चलकर अधिक रकम की जरूरत होगी। ऐसी कंपनी के साथ जाना जोखिम भरा हो सकती है।'

जब भी मकान खरीदने जाएं तो यह जरूर देख लें कि परियोजनाएं पूरी करने के मामले में डेवलपरों का अब तक का रिकॉर्ड कैसा रहा है। यह पूछने से भी पीछे नहीं हटें कि परियोजनाओं के लिए रकम कहां से आई है। रणदेव कहते हैं कि कंपनी पंजीयक (रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज) की वेबसाइट पर डेवलपरों को विभिन्न इकाइयों से मिले कर्ज की जानकारी मौजूद होती है। निर्माण की गति देखने के लिए परियोजना स्थल का जायजा भी लेते रहें।
Keyword: Patna, Delhi, NCR, Hosing, Flat, NBFC, Bank, Debt, House Loan,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 सऊदी अरब में उत्पादन बाधित होने से घरेलू बाजार में बढ़ेंगे तेल के दाम?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.