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ट्रस्टों पर कराधान के क्या हैं प्रावधान

ज्योति मुकुल /  September 01, 2019

भारत में पारिवारिक नेतृत्व वाले कारोबार की लंबी परंपरा रही है और उनके द्वारा स्थापित तमाम ट्रस्ट बहुत सारी गतिविधियां करती हैं जिनमें धर्मादा एवं कंपनियों में निवेश संबंधी गतिविधियां शामिल हैं। उदाहरण के लिए, टाटा समूह से संबंधित कुछ ट्रस्ट 100 साल से भी अधिक पुराने हैं जबकि जेएन टाटा एनडाउमेंट की स्थापना 1892 में की गई थी।

ठीक उसी दौरान ट्रस्टों के लिए मूल कानून इंडियन ट्रस्ट्स ऐक्ट (1883 में) बनाया गया था। पिछले कुछ वर्षों में इस कानून को काफी सख्त किया गया है ताकि इसके दुरुपयोग को रोका जा सके। हालांकि इस कानून के दायरे में केवल पहचान किए गए लोगों के समूह के लिए गठित निजी ट्रस्ट आते हैं।

धर्मादा, शैक्षणिक, धार्मिक एवं वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए स्थापित सार्वजनिक ट्रस्टों के लिए बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट ऐक्ट 1950, रिलीजियस एनडाउमेंट्ïस ऐक्ट 1963 और चेरिटेबल ऐंड रिलीजियस ट्रस्ट्स ऐक्ट 1920 जैसे कानूनों से निकला एक अलग ढांचा है। ट्रस्टों का इस्तेमाल नाबालिगों को संपत्ति की प्राप्ति के लिए अथवा कराधान से बचने के लिए भी किया जाता है। कर में छूट हासिल करने के लिए सार्वजनिक ट्रस्टों को आयकर की धारा 12एए के तहत पंजीकृत होना अनिवार्य है।

लक्ष्मीकुमारन ऐंड श्रीधरन के पार्टनर एस वासुदेवन के अनुसार, ऐसे मामलों में कर छूट की मंजूरी देने वाले अधिकारी आमतौर पर प्रधान आयुक्त अथवा आयकर आयुक्त हो सकते हैं जो ट्रस्ट की गतिविधियों की असलियत के बारे में संतुष्ट होने के बाद छूट आवंटित करते हैं। साथ ही वे यह भी देखते हैं कि क्या वह ट्रस्ट अपने उद्देश्यों को हासिल करने के लिए अन्य प्रासंगिक कानूनों का अनुपालन करता है अथवा नहीं। उन्होंने कहा, 'आवेदन किए गए महीने के खत्म होने से छह महीने के भीतर पंजीकरण आवंटन के लिए एक लिखित आदेश की जरूरत होती है। इस प्रकार के पंजीकरण से ट्रस्ट उस वर्ष के लिए कर छूट का दावा करने के लिए पात्र हो जाता है जिसके लिए आवेदन किया गया है।'

यदि ट्रस्ट अपने उद्देश्यों में कोई संशोधन करता है जो पंजीकरण की शर्तों के अनुरूप न हो अथवा ट्रस्ट अपने ढांचे में इस प्रकार बदलाव करता है जो धारा 12एए के तहत पंजीकरण के लिए पात्र न हो तो उसका पंजीकरण स्वत: निष्प्रभावी हो जाता है। यदि ट्रस्ट की गतिविधियां वास्तविक न हों अथवा वे ट्रस्ट के उद्देश्यों के अनुरूप न हों अथवा उसकी गतिविधियां अन्य संबंधित कानूनों का अनुपालन न करती हों अथवा धारा 13 (1) की कुछ विशेष शर्तों का उल्लंघन करती हों तो कर अधिकारी 12एए के तहत पंजीकरण को निरस्त भी कर सकते हैं।

कर अधिकारियों के साथ टाटा ट्रस्ट्स का विवाद 2015 में उस समय शुरू हुआ था जब उसने अपने कुछ ट्रस्टों का पंजीकरण खत्म करने के लिए कहा था। वासुदेवन ने कहा कि आयकर अधिनियम में ऐसा कोई खास प्रावधान नहीं है जिसके तहत खुद अथवा स्वैच्छिक तरीके से ट्रस्टों का पंजीकरण खत्म करने के लिए आवेदन किया जा सके। पीडब्ल्यूसी इंडिया के पार्टनर (कर एवं नियामकीय) विशाल जे शाह ने कहा कि ठीक उसी समय नामित ट्रस्टियों द्वारा परिचालित ट्रस्ट डीड के तहत ट्रस्ट के लिए कोई अंतिम तिथि दी जा सकती है अथवा उसे हमेशा के लिए छोड़ा जा सकता है।

पंजीकरण रद्द करने के लिए नियमों के निर्धारण के लिहाज से 1 जून 2016 की तिथि काफी महत्त्वपूर्ण हो सकती है। इसी तिथि से आयकर अधिनियम की धारा 115टीडी को प्रभावी बनाया गया था। उसमें कहा गया है कि यदि किसी ट्रस्ट में बदलाव किया गया है अथवा किसी गैर-धर्मादा ट्रस्ट के साथ उसका विलय किया गया है अथवा किसी धर्मादा संगठन की परिसंपत्तियों का हस्तांतरण किसी गैर-धार्मादा संस्था को की गई है तो वह अतिरिक्त आयकर के दायरे में होगा।

ऐसे मामलों में कर आयकर की दरों के स्लैब के आधार पर लगाया जाता है। कर की गणना कुल देनदारी के लिए समायोजन के बाद एक निर्धारित तिथि को कुल परिसंपत्तियों के उचित बाजार मूल्य के आधार पर निर्धारित परिसंपत्तियों के मान्य मूल्य के हिसाब से की जाती है। ये परिसंपत्तियां रियल एस्टेट के रूप में अथवा कंपनियों में इक्विटी शेयर के रूप में हो सकती हैं। टाटा ट्रस्ट्ïस के मामले में समूह की प्रमुख होल्डिंग कंपनी टाटा संस में उसकी दो तिहाई शेयर हिस्सेदारी है।

हालांकि टाटा ट्रस्ट्स को पंजीकरण खत्म करने की मंजूरी मिल गई थी और उस आदेश को आदेश को आयकर अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा बरकरार रखा गया था कि कर लगाया जाना चाहिए अथवा नहीं जो विवाद का मुख्य मुद्दा था। वर्ष 2013 में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने जमशेदजी टाटा ट्रस्ट और नवाजभाई रतन टाटा ट्रस्ट द्वारा किए गए 33,139 करोड़ रुपये के निवेश का मामला उठाया था जिनके लिए कथित तौर पर अनुमति नहीं दी गई थी। वैधानिक अंकेक्षक ने कहा कि आयकर विभाग ने अनियमित छूट प्रदान की थी।

टाटा ट्रस्ट्स की परिसंपत्तियों का मूल्य कई गुना बढ़ चुका है क्योंकि उसके निवेश कई दशक पहले किए गए थे। वासुदेवन के अनुसार, कर देय तभी होगा जब ट्रस्ट को एक ऐसी संस्था में तब्दील किया जाए जो धारा 12एए के तहत पंजीकरण के लिए पात्र न हो अथवा ट्रस्ट का विलय किसी अन्य संस्था के साथ किया जाए जो समान उद्देश्यों वाला कोई ट्रस्ट अथवा संस्थान न हो अथवा ट्रस्ट को भंग कर दिया जाए और वह अपनी परिसंपत्तियों के हस्तांतरण में विफल हो। 

आयकर विभाग ने कथित तौर पर टाटा ट्रस्ट्ïस पर 1,800 करोड़ रुपये के कर का दावा किया है जिससे विवाद काफी बढ़ सकता है। हालांकि इस कानून के तहत यह स्पष्टï करना जरूरी है कि क्या पंजीकरण खत्म करने की मंजूरी दिए जाने के बाद उसे रद्द किया जा सकता है और यदि ऐसा है तो कर अधिकारी किस अवधि के दौरान कर का दावा कर सकते हैं।

Keyword: Trust, Tata Endowment, Tax, Regulation, Registration,
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