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कंपनी निदेशक की जवाबदेही पर एक और अदालती व्यवस्था

सोमशेखर सुंदरेशन /  September 01, 2019

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक और निर्णय में नई दिल्ली में होटल चलाने वाली एक कंपनी के प्रबंध निदेशक के खिलाफ फौजदारी प्रक्रिया चलाने की बात को खारिज कर दिया है। उसने कहा है कि केवल प्रबंध निदेशक होने भर से उसकी इतनी जवाबदेही नहीं बनती कि उसके खिलाफ फौजदारी प्रक्रिया शुरू की जाए। इसके बावजूद अभी यह कहना मुश्किल है कि इससे प्रवर्तन एजेंसियों के व्यवहार में कुछ सुधार आएगा अथवा नहीं।

इससे अक्टूबर फिल्म का एक दृश्य याद आता है। एक आगंतुक होटल की छठी मंजिल से चौथी मंजिल पर गिर जाता है। पाया जाता है कि छठे माले पर स्थित क्लब लाउंज के पास वाले टैरेस का उपयोग अक्सर लोग धूम्रपान के लिए करते थे। होटल पर आरोप लगता है कि उसने सुरक्षा व्यवस्था कायम करने के लिए पर्याप्त उपाय नहीं अपनाए।

प्रबंध निदेशक पर आरोप इस आधार पर लगाया गया था कि वह कंपनी का इकलौता कार्यकारी निदेशक था। वह सभी बोर्ड बैठकों की अध्यक्षता करता था और इसलिए अधिकारियों द्वारा किए गए तमाम सही-गलत कामों की जवाबदेही उसकी बनती थी। 

होटल में काम करने वाले कर्मचारियों को भी आरोपित किया गया लेकिन प्रबंध निदेशक पर केवल इसलिए अभियोग लगा क्योंकि वह वहां का शीर्ष कार्यकारी था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी प्रबंध निदेशक के इस अभियोजन को खारिज करने के अनुरोध को ठुकरा दिया लेकिन सर्वोच्च न्यायालय इससे सहमत नहीं हुआ।

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित विधि के अनुसार किसी व्यक्ति को आरोपित कर समन करने के पहले आपराधिक न्यायालय को प्रस्तुत प्रमाणों से इस बात के लिए संतुष्ट होना चाहिए कि व्यक्ति के खिलाफ मामला बनता है। अगर न्यायालय को किसी व्यक्ति को अभियुक्त बनाने के पर्याप्त प्रमाण या साक्ष्य नहीं मिलते हैं लेकिन बाद में परीक्षण के दौरान किसी नए व्यक्ति के बारे में ऐसे प्रमाण प्राप्त होते हैं तो उस स्थिति में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 319 के तहत उसके खिलाफ भी मामला चलाया जा सकता है। परंतु इसके बावजूद अक्सर ऐसे मामले सामने आते हैं जहां प्रथम दृष्टïया ही समन जारी कर दिया जाता है।

समन उस वक्त भी जारी किया जा सकता है जब न्यायाधीश यह निर्णय कर ले कि आरोपित व्यक्ति पर आपराधिक मामला चलना चाहिए। हम जिस मामले की बात कर रहे हैं उसमें दिल्ली उच्च न्यायालय इस बात पर सहमत था कि उक्त व्यक्ति पर सही आरोप लगे हैं। आरोप पत्र में प्रबंध निदेशक के खिलाफ केवल यही कहा गया था कि वह कंपनी के समस्त परिचालन के लिए उत्तरदायी था और इकलौता कार्यकारी निदेशक होने के नाते वही आरोपित होगा। यह भी कहा गया कि यदि कंपनी में अन्य कार्यकारी निदेशक होते तो उन्हें भी मामले में आरोपित किया जाता।

अद्र्घ दीवानी प्रक्रियाओं के चलते मामला और जटिल हो जाता है। इन्हें वे नियामक अंजाम देते हैं जिनके पास विधायी, कार्यकारी और न्यायिक तमाम भूमिकाएं एक साथ समाहित होती हैं। हाल ही में प्रतिभूति अपील पंचाट के सामने एक ऐसी अपील आई जहां पूंजी बाजार नियामक नियमित रूप से सभी निदेशकों को कहता था कि वे बिना प्रारूप के जुटाई धनराशि निजी तौर पर वापस करें। पंचाट ने कानून को स्पष्टï करते हुए कहा कि कानून के तहत जवाबदेही केवल पद से उत्पन्न नहीं होती बल्कि उसका संबंध दिए गए समय में किसी व्यक्ति द्वारा निभाई जा रही भूमिका और जवाबदेहियों से भी है। जाहिर है यह बात सर्वोच्च न्यायालय की राय पर ही आधारित थी जिसमें उसने कहा था कि जब तक कि किसी व्यक्ति के जिम्मेदार होने के प्रमाण सामने न हों, जवाबदेही स्वत: लागू नहीं होती। 

कंपनी अधिनियम, 2013 में भी सत्यम मामले के बाद कानून के अधीन धोखाधड़ी के मामलों में जमानत के लिए आपराधिकता का स्तर माद्रक द्रव्य तस्करी कानून के स्तर तक उठा दिया गया। इस दौरान भी इस बात का ध्यान रखा गया कि किसी निदेशक को आरोपित करते वक्त बोर्ड प्रक्रिया में सहभागिता और संबंधित जानकारी का इस्तेमाल किया जाए। पूंजी बाजार नियामक द्वारा सूचीबद्घ कंपनियों के दायित्वों के मामले में भी ऐसे मानक तय किए गए जिनमें बोर्ड प्रक्रिया की जानकारी की बात शामिल थी। 

जब कोई निदेशक कंपनी के बोर्ड में शामिल होता है तो उसे उन प्रक्रियाओं पर भरोसा करना होता है जो प्रबंधन द्वारा निदेशकों को बताई जाती हैं। अगर तमाम जानकारियां प्राप्त करने की तमाम कोशिशों के बावजूद निदेशक अनभिज्ञ रहता है तो कानून उसके खिलाफ प्रक्रिया चलाने की इजाजत नहीं देगा। इसके बावजूद इसका व्यवहार में अमल नहीं हो पाता और मानक शिथिल हो जाते हैं। 

प्रवर्तन एजेंसियां इस बात को प्राथमिकता देती हैं कि वे जिस पर भी हाथ डाल सकें, उन सभी लोगों को आरोपित कर दिया जाए। इसके बाद गलती सुधारने का काम न्याय व्यवस्था के हवाले रह जाता है। इस विषय पर और निर्णय आ सकते हैं लेकिन जब तक अनुपालन की संस्कृति प्रवर्तन विभागों में नहीं आएगी तब तक ये फैसले केवल निबंध बनकर रह जाएंगे और अमल में नहीं आएंगे। न्याय व्यवस्था पर पहले ही प्रवर्तन की गलतियों को सुधारने का बोझ है।

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