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धड़ाम हुई तेजी

संपादकीय /  September 01, 2019

दिशा को लेकर लगभग सहमति थी लेकिन वृद्धि में गिरावट की मात्रा ने अधिकतर विश्लेषकों को अचंभित कर दिया है। चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर पांच फीसदी ही रह गई जबकि पिछली तिमाही में यह 5.8 फीसदी और पिछले साल की पहली तिमाही में आठ फीसदी रही थी। विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि 0.6 फीसदी के निराशाजनक स्तर पर रही, वहीं कृषि क्षेत्र दो फीसदी की ही दर से बढ़ा जबकि पिछले साल यह दर 5.1 फीसदी रही थी।

आर्थिक वृद्धि के नवीनतम आंकड़ों से नीति-निर्माताओं को चिंतित हो जाना चाहिए क्योंकि अब यह पूरी तरह साफ है कि अर्थव्यवस्था में समस्याएं उससे काफी गहरी हैं जिसे वे मानना चाहते थे। इस तिमाही में नॉमिनल वृद्धि भी लुढ़कते हुए 17 वर्षों के निचले स्तर आठ पर आ चुकी है। इससे न केवल कंपनी क्षेत्र का राजस्व और कर्ज भुगतान की उसकी क्षमता प्रभावित होगी बल्कि सरकार की वित्तीय स्थिति भी गंभीर परेशानी में पड़ जाएगी। केंद्रीय बजट में नॉमिनल वृद्धि के 11 फीसदी और राजस्व वृद्धि के 15 फीसदी से अधिक रहने का अनुमान लगाया गया है। 

वृद्धि में यह सुस्ती तमाम कारणों से आई है। सरकार की दलील है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था सुस्त पड़ती जा रही है और अमेरिका-चीन व्यापार चिंताओं के चलते अनिश्चितता का भी माहौल है। हालांकि यह दलील दिखावटी है क्योंकि वैश्विक कारण सुस्ती के प्रसार को पूरी तरह स्पष्ट नहीं करते हैं और भारत की आंतरिक कमजोरियों को छुपाने के लिए उनका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। मसलन, व्यापार युद्ध में उलझे चीन की जून तिमाही में वृद्धि दर 6.2 फीसदी रही है। यह कहना मुश्किल है कि चीन की तुलना में भारत पर व्यापार युद्ध का ज्यादा असर पड़ रहा है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के मुताबिक वर्ष 2018 में ही वियतनाम ने 10 वर्षों की उच्च वृद्धि दर 7.1 फीसदी हासिल की। अब वहां श्रमिकों की कमी भी होने लगी है। दरअसल चीन से बाहर निकलने वाली कंपनियां वियतनाम में संयंत्र लगाने की संभावनाएं तलाश रही हैं। बांग्लादेश भी गत वित्त वर्ष में आठ फीसदी की दर से आगे बढऩे के बाद इस समय सात फीसदी वृद्धि की उम्मीद कर रहा है। वैश्विक वित्तीय परिदृश्य अनुकूल हैं और कच्चा तेल भी भारत के सुविधाजनक दायरे में ही है।

आंकड़े बताते हैं कि आर्थिक वृद्धि जल्द  दुरुस्त नहीं होने वाली है। सरकार ने इस समस्या को स्वीकार करने में हिचकिचाहट दिखाकर हालात को बिगाड़ दिया है। कारोबारी सुगमता बढ़ाने के बजाय जुलाई में पेश बजट ने कारोबारी एवं निवेशकों के भरोसे पर चोट पहुंचाने का काम किया। हालांकि सरकार ने पिछले हफ्तों में कुछ सकारात्मक कदम उठाए हैं लेकिन ये आर्थिक गतिविधियों को वांछनीय स्तर तक बहाल करने के लिए काफी नहीं होंगे।

ऐसे में अब राजकोषीय राहत का शोर बढ़ेगा। साफ है कि सरकार के पास व्यय बढ़ाने की गुंजाइश नहीं बची है। इसके उलट आर्थिक सुस्ती के कारण सरकारी वित्त पर ही असर पड़ेगा। वैसे मुद्रास्फीति के नीचे ही बने रहने की संभावनाओं को देखते हुए मौद्रिक समायोजन की गुंजाइश है। लेकिन यह स्थानांतरण एक मुद्दा रहा है और भारत में मौद्रिक कदम उठाने में दो-तीन तिमाहियां लग जाती हैं।

नीति-निर्माताओं को हालात सुधारने के लिए अकेले मौद्रिक नीति पर ही निर्भर नहीं रहना चाहिए। इस सुस्ती की प्रकृति बताती है कि समस्याएं महज चक्रीय नहीं हैं। वित्तीय क्षेत्र की समस्याएं दूर होने पर आर्थिक वृद्धि स्थिर होने की संभावना है लेकिन इतना काफी नहीं होगा। भारत को तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में प्रतिस्पद्र्धा करने के लिए कारोबार करने के हरेक पहलू में व्यापक संरचनात्मक सुधार करने की जरूरत है। इतिहास भी बताता है कि संरचनात्मक सुधारों के बगैर भारत अपेक्षाकृत उच्च वृद्धि के कुछ झोंके ही देख पाएगा, उसे कायम नहीं रख पाएगा।
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