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ट्राई के एक और परामर्श पत्र से टेलीविजन उद्योग में खीझ

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  August 30, 2019

तकरीबन 74,000 करोड़ रुपये का भारतीय प्रसारण उद्योग राहत की सांस ले ही रहा था कि नियामक की ओर से एक और बाधा सामने आ गई। गत 16 अगस्त को ट्राई ने 'प्रसारण एवं केबल सेवाओं के शुल्क संबंधी मुद्दों पर मशविरा पत्र' जारी किया। अभी कुछ ही महीने पहले फरवरी में एनटीओ (नया शुल्क आदेश ) लागू किया गया था। उससे भी अहम बात यह है कि उपभोक्ताओं ने नई नियामकीय व्यवस्था को पूरी तरह अपना लिया है। इसी बीच ट्राई ने एक नया मशविरा पत्र प्रस्तावित किया है जिसमें चैनलों के मूल्य और उनका समूह तैयार करने को लेकर आमूलचूल बदलाव की बात कही गई है। गत 23 अगस्त को जारी इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि यह किसी भी उद्योग के आर्थिक विकास के लिए आवश्यक स्थिर नियामकीय व्यवस्था के तमाम मानकों के एकदम विपरीत है। अगर प्रसारकों के विरोध की अनदेखी भी कर दी जाए तो भी ट्राई की जल्दबाजी और यह मशविरा पत्र समझ से परे है।

 
बीते 15 वर्ष के दौरान ट्राई ही प्रसारण नियामक रहा है। इस दौरान इसके अधिकांश पत्र सुस्पष्टï और अच्छी तरह विश्लेषित रहे हैं। परंतु यह पत्र बंडलिंग के खिलाफ है। अपने मूल आदेश में यह एक बड़ी बात थी। जनवरी में जब मैंने ट्राई के चेयरमैन आर एस शर्मा से इस बारे में पूछा था तब उन्होंने कहा था कि ट्राई बंडलिंग के खिलाफ नहीं है। परंतु अब यह नया मशविरा पत्र सामने है और यह बंडलिंग पर सवाल उठा रहा है, इसमें कहा गया है कि कैसे छूट दी जानी चाहिए और कीमतों की सीमा कैसे तय होनी चाहिए? इसके लिए चुना गया समय पूरी तरह गलत है।  बाजार में नई शुल्क व्यवस्था लागू हुए केवल पांच महीने का समय बीता है। इसके प्रभाव का अभी आकलन होना है। 
 
इसका पहला सकारात्मक प्रभाव, जिसके लिए ट्राई को श्रेय भी लेना चाहिए, वह यह है कि इससे पारदर्शिता आई है। इसके परिणामस्वरूप प्रसारकों का सबस्क्रिप्शन राजस्व और मल्टी सिस्टम ऑपरेटर्स यानी एमएसओ राजस्व में भी इजाफा हुआ है क्योंकि अधिक घर जुड़े हैं और राजस्व लीकेज पर रोक लगी है। बहरहाल, चूंकि लोग अपनी पसंद के चैनल खुद चुनते हैं इसलिए कई चैनलों की पहुंच खत्म हो गई है और तमाम प्रसारकों के विज्ञापन राजस्व में कमी आई है। 
 
दूसरा, कीमतों में इसलिए इजाफा हुआ है क्योंकि अब हर घर को हर माह 154 रुपये का नेटवर्क शुल्क अदा करना है जिसमें 100 चैनल आते हैं। इनमें से दूरदर्शन के 25 चैनल अनिवार्य इसलिए कि आप 75 चैनलों के लिए यह भुगतान करते हैं। अन्य चैनलों का मूल्य इससे अलग होता है। ध्यान रहे कि निजी टेलीविजन चैनलों के 28 वर्ष के इतिहास में औसत केबल टीवी मूल्य कई अन्य जिंसों की तुलना में औसत मुद्रास्फीति दर से कम रहा है। यह भी कि केबल टीवी कोई अनिवार्य जिंस नहीं है।
 
तीसरा, उपभोक्ताओं की चयन क्षमता कम हुई है। औसत भारतीय परिवार एक महीने में 40 से 60 चैनल देखता था। इनमें विभिन्न भाषाओं के खेल, संगीत, मनोरंजन, फिल्म आदि तमाम तरह के चैनल शामिल हैं। नई शुल्क व्यवस्था लागू होने के बाद यह घटकर 32 से 48 चैनल प्रति परिवार रह गई है। याद रहे कि देश के 19.7 करोड़ टेलीविजन वाले परिवारों में से 98 फीसदी के पास ऐसा टेलीविजन है जिसे लोग साथ बैठकर देखते हैं। इसलिए, पिताजी, मां, बच्चे, दादा-दादी सबकी अपनी-अपनी पसंद है। बंडलिंग की व्यवस्था के खिलाफ जाने के बाद लोगों ने चैनल देखना कम कर दिया। ग्राहक अब विविध चैनलों के बजाय मजबूर भाषाई या विषय के आधार पर चैनल चुनने को मजबूर हैं। 
 
यहां ट्राई की यह दलील सामने आती है कि बंडलिंग उपभोक्ताओं के हित में नहीं है। वैश्विक स्तर पर अधिकांश उद्योगों में बंडलिंग की जाती है। इसमें विमानन, होटल, मीडिया, उपभोक्ता वस्तु और दूरसंचार सभी शामिल हैं। ये अपेक्षाकृत सस्ते होते हैं इनके जरिये काफी विविधता भी हासिल होती है। 
 
चौथा प्रभाव उस बदलाव के रूप में सामने आया है जिसके तहत करीब 20 लाख परिवारों ने केबल के स्थान पर डीटीएच को अपना लिया। अब देश में डीटीएच उपभोक्ताओं की संख्या 7 करोड़ से अधिक है। अपने संसाधनों और कॉल सेंटर के कारण डीटीएच, केबल की तुलना में कहीं अधिक सुविधाजनक है। परंतु देश में करीब 10 करोड़ परिवारों के पास केबल टीवी है और उनके पास वह लचीलापन नहीं है जो डीटीएच में है। यह बात इन उपभोक्ताओं को हताश करती है। राजस्व में सुधार होने पर अधिकांश एमएसओ तकनीक में निवेश करेंगे और यह समस्या भी हल हो जाएगी। 
 
ऐसे में इस पर्चे को प्रस्तुत करने की क्या हड़बड़ी थी? एक कदम पीछे हटकर देखें तो 2019 में बंडल, चयन और लचीलेपन को लेकर बहस निरर्थक प्रतीत होती है। हॉटस्टार, जी 5, वूट आदि चैनल उन्हीं कार्यक्रमों को दिखाते हैं जो उनकी मूल कंपनियां स्टार, जी या वायकॉम 18 दिखाती हैं। परंतु इनकी कीमतों पर नियमन नहीं है, होना भी नहीं चाहिए। ऐसे में केबल या डीटीएच के लिए उन्हीं चैनलों या कार्यक्रमों की ऐसी कीमत क्यों होनी चाहिए? तीन अलग-अलग तकनीक हैं केबल, डीटीएच और ऑनलाइन। अनगिनत पैकेज और उपकरण हैं जिन पर उपभोक्ता टीवी या मनोरंजन देख सकता है। ऐसे में इस उद्योग के इतने सूक्ष्म प्रबंधन से इसका दम घोंटना कहां तक उचित है? अधिकांश मीडिया नियामक मसलन ऑफकॉम आमतौर पर बिना नियमन और उसके बाद नियमन की लागत का आकलन करते हैं। किसी भी नई अनुशंसा के लिए वे प्रभाव के विश्लेषण से काम लेते हैं। उद्योग जगत और उपभोक्ता संगठनों की मांग है कि ट्राई को भी ऐसा ही करना चाहिए। ऐसा करने से शायद उसकी मनोदशा बदले और हर कुछ महीनों में मशविरा पत्रों से निजात मिल सके। 
Keyword: TRAI, DTH, DPO, cable,,
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