बिजनेस स्टैंडर्ड - आयुध कारखाने मजबूत बनाने की कवायद
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आयुध कारखाने मजबूत बनाने की कवायद

लक्ष्मण कुमार बेहड़ा /  August 30, 2019

देश भर में आयुध कारखानों का संचालन करने वाले ओएफबी को कंपनी बनाने के बाद ही यह रक्षा उत्पादन में अपनी असरदार भूमिका निभा सकता है। बता रहे हैं लक्ष्मण कुमार बेहड़ा

 
सरकार ने साहसिक कदम उठाते हुए देशभर में 41 आयुध कारखानों का संचालन करने वाले आयुध कारखाना बोर्ड (ओएफबी) को कंपनी में तब्दील करने का प्रस्ताव रखा है। इन कारखानों में 82,000 से भी अधिक कर्मचारी काम करते हैं। इनके श्रम संगठनों को सरकार का यह फैसला रास नहीं आया जिसके बाद वे 20 अगस्त से एक महीने की हड़ताल पर चले गए। हालांकि रक्षा मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों से कई दौर की बातचीत के बाद यह हड़ताल वापस ले ली गई है लेकिन भïिवष्य में फिर हड़ताल होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। दरअसल समझौते के लिए रखे गए प्रस्ताव से इस संगठन के बुनियादी सरकारी ढांचे को ही खतरा पैदा हो सकता है।
 
ऐसे में क्या सरकार को अपने कदम पीछे खींच लेने चाहिए या अपने फैसले पर डटे रहना चाहिए? साक्ष्यों के अवलोकन से यही लगता है कि रक्षा मंत्रालय को अपने फैसले पर कायम रहना चाहिए क्योंकि ओएफबी को कंपनी बनाना न केवल इसे दीर्घजीवी बनाने के हित में है बल्कि देश की रक्षा तैयारी और आत्म-निर्भरता के लिए भी ऐसा करना जरूरी है। ब्रिटिशकालीन ओएफबी का गठन वर्ष 1802 में हुआ था और यह भारत सरकार का सबसे पुराना एवं वाणिज्यिक गतिविधि वाला सबसे बड़ा विभागीय संगठन है। करीब 12,800 करोड़ रुपये के कारोबार वाले ओएफबी का टैंक एवं हथियारबंद वाहन से लेकर छोटे हथियारों, गोला-बारूद एवं सैन्य साजोसामान जैसे तमाम उत्पादों में ऐतिहासिक रूप से एकाधिकार रहा है। लेकिन कई वजहों से यह संगठन अपने अपेक्षित स्तर से नीचे ही रहा है। 
 
एक सरकारी विभाग होने से ओएफबी पर सशस्त्र बलों को बेचे जाने वाले अपने उत्पादों से लाभ कमाने से प्रतिबंध है। ऐसा होने से ओएफबी अपने सांगठनिक एवं उत्पादन क्षमता में सुधार के लिए अधिक प्रोत्साहित नहीं हो पाता है। इसके अलावा उसे उत्पादन में आई समूची लागत उपभोक्ताओं से ही वसूलने की मंजूरी होती है। उत्पादन में लागत प्लस का यह नजरिया बेअसर माना जाता है और इससे रक्षा मंत्रालय पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। हालांकि ओएफबी के लिए सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि इसे निर्णय-निर्माण के स्तर पर बहुत सीमित अधिकार होते हैं। रक्षा मंत्रालय का छोटा विभाग होने के नाते वित्त, मानव संसाधन, शोध ïएवं विकास, कारखानों के आधुनिकीकरण और संयुक्त उद्यम एवं अनुषंगी इकाइयां बनाने जैसे मामलों में फैसले ओएफबी के स्तर पर नहीं लिए जाते हैं। बाहरी एजेंसियों के निर्णय-निर्माण का अफसरशाही वाला रवैया और नतीजों के बजाय कायदे-कानून पर अधिक जोर देने से ओएफबी के पास अपने दम पर खड़े होने और जवाबदेह होने की बहुत कम गुंजाइश ही रह जाती है। दिल्ली के सत्ता गलियारे से काफी दूर होने और शीर्ष अधिकारियों के जल्द बदले जाने से ओएफबी की चिंता और बढ़ जाती है। गत 10 वर्षों में ही ओएफबी के 15 चेयरमैन रह चुके हैं। शीर्ष नेतृत्व में ऐसे त्वरित बदलाव से ओएफबी को रणनीतिक दृष्टि एवं दिशा नहीं मिल पाती है। 
 
वैसे ओएफबी ने 200 साल से पुराने इतिहास और विशाल परिसंपत्ति आधार के मद्देनजर अपना प्रदर्शन सुधारने के लिए खुद भी बहुत कम प्रयास किए हैं। हाल यह है कि आज भी यह संगठन अपने किसी उत्पाद के लाभप्रद होने का दावा नहीं कर सकता है क्योंकि इसके टर्नओवर का 75-80 फीसदी आयातित तकनीक से ही आता है। नवाचार को अहमियत नहीं देने के अलावा ठेके समय पर पूरा करने में देरी, निम्न श्रम उत्पाद का और नाममात्र का निर्यात होने से इसके मुख्य हितधारक यानी भारतीय सेना परेशान हो गई है। सेना की कुल आपूर्ति में करीब 80 फीसदी हिस्सा ओएफबी का ही है। इसके अलावा सेना इन उत्पादों की खराब गुणवत्ता से भी परेशान है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने एक बार कहा था कि आयुध कारखानों में बने कुछ उत्पाद ऐसी खामियों के बावजूद ग्राहकों को दे दिए गए जिन्हें आसानी से देखा जा सकता था। प्रदर्शन के मोर्चे पर लगातार नाकाम रहने से परेशान रक्षा मंत्रालय ने पिछले वर्षों में खुद को इन उत्पादों से दूर करने की कोशिश की है। सेना पहले ही करीब 275 उत्पादों को कम अहमियत वाला घोषित कर चुकी है जिससे इन उत्पादों पर ओएफबी का एकाधिकार कम हो चला है। 
 
उम्मीद से कमतर प्रदर्शन होने से भारतीय रक्षा उत्पादन में ओएफबी की केंद्रीय भूमिका भी कमजोर होने लगी है। इसकी हैसियत इतनी गिर चुकी है कि रक्षा उत्पादन का लाइसेंस रखने वाली भारतीय निजी कंपनियां भी आज ओएफबी से अधिक उत्पादन कर रही हैं। 'मेक इन इंडिया' अभियान के तहत रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र की वृद्धि बढऩे की संभावना है। ऐसा होने पर ओएफबी और भी किनारे की ओर धकेल दिया जाएगा, अगर जल्द ही व्यापक सुधार नहीं किया जाता है।  ओएफबी को कंपनी के रूप में तब्दील करने का विचार लंबे समय से चर्चा में रहा है। सबसे पहले वर्ष 2000 में गठित नायर समिति ने इसका सुझाव दिया था। उसके बाद केलकर समिति ने भी 2005 की अपनी रिपोर्ट में ओएफबी को कंपनी बनाने की जोरदार वकालत की थी। हालांकि सरकारों ने इस सुझाव को अनदेखा ही किए रखा था। लेकिन मोदी सरकार ने रक्षा उत्पादन में सुधार के एक अहम अंग के तौर पर इस सुझाव को लागू करने का साहस आखिरकार कर दिखाया है।
 
ओएफबी को कंपनी के रूप में तब्दील करने से यह रक्षा क्षेत्र का एक सार्वजनिक उपक्रम (डीपीएसयू) बन जाएगा और उसका प्रशासनिक नियंत्रण रक्षा मंत्रालय के पास ही रहेगा। इस तरह वस्तुस्थिति ओएफबी का निजीकरण करने की अफवाहों से काफी अलग है। एक रक्षा उपक्रम होने और उसमें केंद्र सरकार की 100 फीसदी हिस्सेदारी होने पर ओएफबी के पास निर्णय-निर्माण में काफी अधिक स्वायत्तता मिल जाएगी। इसका प्रबंधन इसके अपने निदेशक मंडल ही रहेगा। सरकार के व्यापक दिशानिर्देशों के मद्देनजर यह अपनी वित्तीय एवं निवेश योजनाओं के बारे में खुद ही फैसला कर सकता है, खुद ही संयुक्त उद्यम लगाने एवं अनुषंगी इकाइयां बनाने और शोध एवं विकास को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास कर सकता है और इनमें बाहरी एजेंसियों के दखल की गुंजाइश भी नहीं रह जाएगी। इससे भी अहम बात यह है कि एक स्थिर नेतृत्व वाली कॉर्पोरेट इकाई होने से ओएफबी बाजार की परिस्थितियों के हिसाब से कदम उठाने में सक्षम हो जाएगा। निजी क्षेत्र से मिलने वाली चुनौतियों का सामना कर पाना भी आसान हो जाएगा।
 
 
आखिर में, अपने मौजूदा टर्नओवर के साथ ओएफबी कंपनी बन जाने के बाद आसानी से नवरत्न का दर्जा हासिल करने के लायक बन जाएगा। नवरत्न उपक्रम बनने से ओएफबी को वित्तीय फैसले करने में भी काफी लचीलापन मिल सकेगा। कुल मिलाकर ओएफबी के लिए अपना पुराना वैभव हासिल करने के लिए कंपनी बनने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है। इस तरह ओएफबी भारत के रक्षा उत्पादन क्षेत्र में अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज करा सकता है।
 
(लेखक एक रक्षा अर्थशास्त्री हैं और इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज ऐंड एनालिसिस के शोध अध्येता हैं) 
Keyword: ordnance factory, india,,
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