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बहस में बदलाव?

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  August 30, 2019

बहुत लंबे समय से यह कहा जाता रहा है कि देश के राजनेता व्यवस्थित आर्थिक सुधार की तरफ तभी बढ़ते हैं जब कोई संकट आसन्न होता है। बीते सप्ताह एक बार फिर यह बात सही साबित होती दिखी। इसके अलावा संभवत: अरुण शौरी ने कहा था कि मोदी सरकार के लिए अर्थव्यवस्था से जुड़ी सुर्खियों का प्रबंधन भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना अर्थव्यवस्था का प्रबंधन। इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा शुक्रवार को आयोजित संवाददाता सम्मेलन का समय कितना महत्त्वपूर्ण था। बीते छह वर्षों में जीडीपी वृद्धि के लिहाज से सबसे धीमी तिमाही, विनिर्माण वृद्धि के 0.6 की निराशाजनक दर से बढऩे जैसी अहम बातें बैंकिंग क्षेत्र को लेकर उठाए गए कदमों की आड़ में दब गईं। यहां दो तरह की बातें हैं। एक ओर अर्थव्यवस्था की गति वर्ष 2013 (तब तेल कीमतें आज से दोगुने स्तर पर थीं) के बाद से न्यूनतम स्तर पर हैं। बीती चार तिमाहियों में वृद्धि दर का औसत बमुश्किल 6.1 फीसदी रहा है। पिछली तिमाही में वृद्धि दर केवल 5 फीसदी रही है और मौजूदा तिमाही में भी इसके कमजोर रहने की आशंका है। यानी हमें वर्ष 2012-13 के बाद से सबसे धीमी वार्षिक वृद्धि के लिए तैयार रहना चाहिए। 

 
सरकार ने हालात का अनुमान लगाया और एक दूसरी बहस को जन्म देकर इस बुरी खबर के प्रभाव को आंशिक रूप से निष्क्रिय कर दिया है। वित्तीय क्षेत्र में एक के बाद एक आ रहे संकटों ने व्यापक अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया है। ऋण का प्रवाह प्रभावित हुआ है और सरकार ने पहले अपना ध्यान बैंकों के पुनर्पूंजीकरण पर लगाया और अब उसने 10 बैंकों को विलय कर चार बैंकों में सीमित करने की घोषणा की है। दोनों ही घोषणाएं मजबूत बहीखातों वाले बैंक बनाने पर केंद्रित हैं। आरबीआई ने नीतिगत दरों को नौ वर्ष में न्यूनतम स्तर तक कर दिया है। अन्य घोषणाएं भी तेजी से आई हैं। बजट में की गई कर संबंधी घोषणाओं को वापस लिया गया है, खनन और खुदरा क्षेत्र को और अधिक विदेशी निवेश के लिए खोला जा रहा है और चीनी निर्यात पर व्यापक सब्सिडी दी जा रही है ताकि चीनी मिलें गन्ना किसानों का बकाया चुका सकें। वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री में आ रही गिरावट से निपटने के लिए अवमूल्यन दरों को उदारतापूर्वक तैयार किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त कहा जा रहा है कि सरकार बुनियादी ढांचे में निवेश करेगी, निर्यात बढ़ाने को प्रोत्साहन देगी और अचल संपत्ति क्षेत्र को पैकेज दिया जाएगा। इस बीच कमजोर तेल कीमतों के बावजूद रुपये के बाह्य मूल्य में आई हालिया गिरावट बताती है कि अधिमूल्यित मुद्रा में अगर देरी से सुधार किया जाए तो भी अर्थव्यवस्था को कोई खास मदद नहीं मिलती। मोदी सरकार के इतिहास में ऐसा कोई दूसरा सप्ताह याद करना भी मुश्किल है जब आर्थिक नीति से संबंधित इतनी सारी घोषणाएं एक साथ सामने आई हों। सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि सरकार अब सुनने के मिजाज में है और वह आलोचना पर भी ध्यान देना चाहती है। कारोबारी इस बात से प्रसन्न होंगे। परंतु इससे होगा क्या?
 
नीतिगत तौर पर देखें तो एक भारी भरकम पैकेज अगर कारगर नहीं होता और आशाओं पर तुषारापात करता है तो उसके बजाय ढेर सारी घोषणाओं का प्रवाह बेहतर माना जाएगा। सूचनाओं के निरंतर प्रवाह में जोखिम कम रहता है और यह अपेक्षाकृत अधिक खुला रवैया माना जाता है। चूंकि यह संचयी प्रभाव वाला होता है इसलिए लोग इसे लेकर अलग सोच अपनाते हैं और निवेश और व्यय में भी इजाफा करते हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो सरकार को कुछ और घोषणाएं करनी चाहिए और कुछ अहम कमियों को दूर करना चाहिए। उसके बाद ही लोगों के मिजाज बदलने की आशा की जा सकती है। प्राथमिक लक्ष्य के रूप में सरकार चक्रीय मंदी को रोकना चाहेगी ताकि खपत और व्यय में सुधार आ सके। सबसे पहले खपत में बदलाव लाना होगा क्योंकि नकदी की तंगी से जूझ रही कंपनियां तब तक निवेश नहीं करेंगी जब तक बिक्री में सुधार नजर नहीं आएगा। बैंकर कहते हैं कि कारोबारी ऋण की मांग कमजोर है लेकिन खुदरा मांग त्योहारी मौसम में सुधर सकती है। बशर्ते कि आज की लंबित मांग तब असर दिखाए। बहरहाल, गन्ना किसानों की समस्या हल करने के अलावा सरकार ने ग्रामीण मांग में सुधार के लिए कुछ खास नहीं किया है। ध्यान रहे कि कृषि उत्पादों का मूल्य कमजोर रहा है और ग्रामीण क्षेत्रों का मेहनताना पांच वर्ष से एक ही स्तर पर रुका हुआ है। इसके अतिरिक्त तमाम ढांचागत मसले तो हैं ही। जाहिर है अभी काफी कुछ करने की आवश्यकता है।
Keyword: nirmala sitaraman, bank, merge,,
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