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ई-सिगरेट से धूम्रपान के तरीके में बदलाव, लटक रही प्रतिंबध की तलवार

ऋत्विक शर्मा /  August 29, 2019

अगर लोगों को चुनने का मौका दिया जाए तो अधिकतर लोग दो बुराइयों में से कम नुकसानदेह बुराई ही चुनना पसंद करेंगे। एक विकल्प यह भी हो सकता है कि लोग दोनों में से कमतर बुराई को भी एक बुराई ही मानें लिहाजा दोनों बुराइयों से दूर रहने के लिए हरसंभव कदम उठाएं। ई-सिगरेट पर देशव्यापी पाबंदी लगाने की सरकार की योजना से जुड़े प्रमुख अंशधारकों का रुख इन दोनों परस्पर-विरोधी पसंद से ही तय हो रहा है। जुलाई की शुरुआत में स्वास्थ्य मंत्रालय ने इलेक्ट्रॉनिक निकोटिन डिलिवरी सिस्टम (ईएनडीएस) पर रोक लगाने के लिए एक प्रस्ताव पेश किया था। इसमें ई-सिगरेट को भी औषधि एवं सौंदर्य प्रसाधन अधिनियम के तहत एक दवा के रूप में पंजीकृत कर उनके उत्पादन, बिक्री, वितरण एवं आयात पर प्रतिबंध लगाने का जिक्र है। ई-सिगरेट को मोटे तौर पर परंपरागत सिगरेट की तुलना में कम हानिकारक माना जाता रहा है लेकिन लंबे समय में स्वास्थ्य पर पडऩे वाले उसके असर के बारे में स्पष्टता नहीं है। ई-सिगरेट हाथ में पकड़ा जा सकने वाला एक बैटरी-चलित वेपोराइजर होता है। चालू करने पर ई-सिगरेट धुआं निकालता है जो तंबाकू के बजाय निकोटिन को भाप बना देता है। इसमें भरे जाने वाले ई-लिक्विड में निकोटिन अलग स्वाद और मिश्रण में भी मिलता है। ई-लिक्विड में आम तौर पर प्रोपेलिन ग्लाइकॉल और ग्लिसरॉल होता है जिसे सूंघने की स्थिति में नुकसानदेह नहीं माना जाता है। सामान्य सिगरेट की तुलना में ई-सिगरेट में कहीं कम रासायनिक तत्त्व पाए जाते हैं।

 
असल में सिगरेट पीने वालों को तंबाकू में पाई जाने वाली निकोटिन की लत लग जाती है। तंबाकू जलने से पैदा होने वाले टार में ही अधिकांश नुकसानदायक रसायन पाए जाते हैं। लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञ आगाह करते हैं कि ई-सिगरेट के जरिये निकोटिन लेने के भी हानिकारक प्रभाव होते हैं।  ई-सिगरेट को इस तरह बनाया गया है कि वे उपयोगकर्ता को परंपरागत सिगरेट पीने का ही मजा दे। यह तंबाकू से भले ही निजात दिला देता है लेकिन व्यक्ति को निकोटिन की लत से छुटकारा नहीं मिलता। सर गंगाराम अस्पताल के कैंसर रोग विशेषज्ञ डॉ श्याम अग्रवाल कहते हैं कि निकोटिन का अधिक सेवन करने से लंबी अवधि में कैंसर हो सकता है। धूम्रपान से फेफड़े का कैंसर होता है और निकोटिन की लत अग्नाशय एवं स्तन कैंसर का कारण बन सकती है। 
 
डॉ अग्रवाल कहते हैं, 'ई-सिगरेट सुरक्षित विकल्प नहीं है। इसके इस्तेमाल से मस्तिष्क एवं हृदय पर असर पडऩे के अलावा पाचनतंत्र में विषाक्तता, मतिभ्रम, उल्टी, दस्त एवं आंखों में जलन की समस्या हो सकती है।' 'इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल ऐंड पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी' में वर्ष 2015 में प्रकाशित एक लेख में कहा गया है कि निकोटिन को तंबाकू का अधिक सुरक्षित विकल्प माना जाता है लेकिन यह दिल, सांस एवं पाचन से संबंधित बीमारियों का भी जोखिम बढ़ा देता है। कई अध्ययनों से साबित हुआ है कि निकोटिन में कैंसर पैदा करने वाले तत्व होते हैं लिहाजा निकोटिन से संबंधित उत्पादों के इस्तेमाल पर रोक-टोक एवं बिक्री चिकित्सा क्षेत्र के लोगों की देखरेख में ही होना चाहिए। ई-सिगरेट पर पाबंदी के हिमायती  लोगों का कहना है कि इस वजह से युवाओं के बीच निकोटिन की लत लगने का खतरा बढ़ सकता है। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के स्वास्थ्य संवद्र्धन प्रभाग की निदेशक मोनिका अरोड़ा बताती हैं कि 25 साल की उम्र तक मस्तिष्क का विकास जारी रहता है। लेकिन निकोटिन की लत लग जाने से मस्तिष्क का वह हिस्सा प्रभावित हो सकता है जो सीखने की क्षमता को नियंत्रित करता है और निर्णय-निर्माण एवं संवेगों पर काबू पाने के लिए जिम्मेदार है। मोनिका अरोड़ा वैश्विक वयस्क तंबाकू सर्वे-2 का हवाला देते हुए कहती हैं कि भारत धुआं-रहित तंबाकू सेवन पर असरदार नियमन कर पाने में नाकाम रहा है। वह कहती हैं, 'हम एक नई तरह की लत को हवा देने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं, खास तौर पर हमारे किशोरों एवं युवाओं की सेहत पर प्रतिकूल असर डालने वाली लत।' 
 
दिल्ली के एक एनजीओ हृदय ने अध्ययन में पाया कि ई-सिगरेट एवं ई-हुक्का के बारे में सबसे अधिक जानकारी कॉलेज जाने वाले युवाओं और स्कूली किशोरों एवं उनके शिक्षकों के बीच है। इससे यह भी पता चला कि इन उत्पादों को खरीदने वाले एक तिहाई लोग नाबालिग हैं। मोनिका की मानें तो ई-सिगरेट असल में सिगरेट छोडऩे की दर को कम कर देती है। दुनिया भर में एक अरब से अधिक लोग धूम्रपान करते हैं जिनमें भारत का योगदान 11.3 फीसदी है। तंबाकू एवं सिगरेट उद्योग का भारत सरकार को मिलने वाले राजस्व में 34,000 करोड़ रुपये का बड़ा अंशदान है। भारत में एंड्स उत्पादों का बाजार करीब 300 करोड़ रुपये का है। 
 
भारत में 12 राज्य पहले से ही ई-सिगरेट एवं ई-हुक्का पर रोक लगा चुके हैं। ई-हुक्का के जरिये उपयोगकर्ता निकोटिन एवं अन्य रसायनों से भरी गंध सूंघ सकता है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने गत अगस्त में सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को परामर्श जारी किया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इसके खिलाफ दायर याचिका पर फैसला दिया कि यह परामर्श राज्यों एवं सरकारी निकायों पर बाध्यकारी नहीं है। जून में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च का श्वेत-पत्र आने के बाद सरकार अब इन निकोटिन उपकरणों पर प्रतिबंध लगाने की तैयारी कर रही है। उसने युवाओं ïएवं किशोरों के बीच बढ़ती लत का हवाला देते हुए प्रतिबंध को सही ठहराने की कोशिश की है। 
 
कैंसर निषेध एवं शोध संस्थान के पूर्व निदेशक रवि मेहरोत्रा कहते हैं कि पश्चिमी देशों में निकोटिन वाली सुगंध लेना (वेपिंग) की प्रवृत्ति काफी जोरों पर है। ई-सिगरेट बनाने वाली प्रमुख कंपनी जूल के मुख्य कार्याधिकारी ने वेपिंग में लिप्त किशोरों के अभिभावकों से माफी मांगते हुए कहा था कि यह उत्पाद उनके लिए नहीं बनाया गया था।  श्वेत-पत्र तैयार करने वाली समिति में शामिल रहे डॉ मेहरोत्रा का कहना है कि बड़ी तंबाकू कंपनियां अब तंबाकू की लत को निकोटिन की लत में बदलने की कोशिश कर रही हैं। वह कहते हैं, 'हालांकि तंबाकू के बजाय निकोटिन का नशा दसवीं मंजिल के बजाय तीसरी मंजिल से छलांग लगाने जैसा ही है।' वह कहते हैं कि वेपिंग को सुरक्षित मानने को लेकर अभी पर्याप्त शोध नहीं हुए हैं लिहाजा सबसे अच्छा विकल्प यही है कि धूम्रपान की आदत छुड़ाने के लिए हानि रहित तरीका अपनाया जाए।
 
वैसे धूम्रपान की आदत में दुनिया भर में गिरावट देखी जा रही है लेकिन वेपिंग के प्रति रुझान जोर पकड़ रहा है और अब यह पश्चिमी देशों में लोकप्रिय संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है। भारत में भी 15 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के बीच तंबाकू का सेवन छह फीसदी घटा है। वर्ष 2009-10 में इस आयु वर्ग के 34.6 फीसदी लोग तंबाकू सेवन करते थे जो 2016-17 में घटकर 28.6 फीसदी हो गया। लेकिन तंबाकू सेवन में गिरावट की मौजूदा दर ही कायम रहे तो इस जानलेवा आदत के खात्मे में कई साल लग जाएंगे। एसोसिएशन ऑफ वेपर्स इंडिया के निदेशक सम्राट चौधरी कहते हैं कि ई-सिगरेट पर रोक लगाने से तंबाकू-जनित मौतों में कमी नहीं आएगी। भारत में हर साल 10 लाख से अधिक लोग तंबाकू सेवन से जुड़ी बीमारियों के चलते अपनी जान गंवा बैठते हैं। 
 
वर्ष 2016 में कर्नाटक में ई-सिगरेट पर पाबंदी लगने के बाद चौधरी वेपिंग के लिए लामबंदी करने लगे। उनका संगठन इसके लिए कानूनी लड़ाई लड़ चुका है और कानून बनाने की मांग करता रहा है। चौधरी कहते हैं, 'धूम्रपान से होने वाली क्षति जलने से पैदा होने वाले टार में मौजूद कैंसरजनक रसायनों से होती है। वेपिंग प्रक्रिया में ज्वलन होता ही नहीं है। इसमें काफी कम टॉक्सिन होते हैं लेकिन धूम्रपान कर चुका कोई भी व्यक्ति जानता है कि यह अधिक सुरक्षित है।' एवीआई सरकारों पर दबाव बनाए हुए है ताकि इसके लिए नियम बनाए जाएं। उसने ब्रिटेन की पब्लिक हेल्थ अध्ययन रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि वेपिंग धूम्रपान से जुड़े जोखिम का एक हिस्सा भर है और कम-से-कम 95 फीसदी कम नुकसानदायक है। ब्रिटेन का रॉयल कॉलेज ऑफ फिजिशियंस कहता है कि ई-सिगरेट से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम तंबाकू वाले उत्पादों के सेवन की तुलना में 95 फीसदी कम हैं।  चौधरी इन अध्ययन रिपोर्टों का हवाला देते हुए कहते हैं कि ई-सिगरेट पर रोक लगाने की जरूरत नहीं है। वह इन्हें किफायती दाम पर मुहैया करने की भी मांग करते हैं। 
 
प्रतिबंध के लिए अध्यादेश की जरूरत पर सवाल
 
ई-सिगरेट समेत इलेक्ट्रॉनिक निकोटिन डिलिवरी सिस्टम्स (ईएनडीएस) को प्रोत्साहित करने वाले व्यापार प्रतिनिधियों के एक प्रमुख निकाय ने देश में इस प्रकार के उपकरणों को प्रतिबंधित करने के लिए अध्यादेश की आवश्यकता पर सवाल खड़े किए हैं। व्यापार निकाय ने इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट के उत्पादन, आयात, वितरण और बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के अध्यादेश पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के काम करने संबंधी रिपोर्टों पर प्रतिक्रिया देते हुए आरोप लगाया कि पूरी श्रेणी के लिए ऐसा करने के पीछे के तर्क में गंभीर खामियां हैं।
 
ईएनडीएस के व्यापार प्रतिनिधियों के संयोजक प्रवीण रिखी ने एक बयान में कहा कि ई-सिगरेट पर प्रतिबंध लगाने के मामले को अदालतों से भी कोई समर्थन नहीं मिला। इसके बाद इन्हें नशीले पदार्थों के तौर पर वर्गीकृत किए जाने की बार-बार कोशिश की गई। इसे भी कानून में कोई आधार नहीं मिला।  मसौदा अध्यादेश ई सिगरेट प्रतिबंध अध्यादेश 2019 में इलेक्ट्रॉनिक सिगरेट के उत्पादन, आयात, वितरण और बिक्री पर प्रतिबंध की बात की गई है और उल्लंघन करने वालों के लिए कारावास की सजा का प्रावधान है। मसौदा अध्यादेश के विभिन्न पहलुओं की जांच के लिए इसे एक मंत्रियों के समूह (जीओएम) के पास भेजा जाएगा। 
 
आईसीएमआर रिपोर्ट में यह कहते हुए ईएनडीएस पर पूर्ण प्रतिबंध की सिफारिश की गई है कि इनका इस्तेमाल करने से धूम्रपान नहीं करने वालों को निकोटिन की लत लग सकती है। आईसीएमआर की इस रिपोर्ट पर निकाय ने आरोप लगाया कि यह रिपोर्ट तीसरे पक्ष के अनुसंधान का सारांश है और आईसीएमआर ने अपने आप कोई अनुसंधान नहीं किया जिसका दस्तावेजीकरण किया गया हो।  इन उपकरणों का प्रयोग करने वाले 3000 से अधिक लोगों ने हाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर उनसे अनुरोध किया था कि वे ईएनडीएस को वैध बनाएं। उन्होंने दावा किया था कि जब से उन्होंने पारम्परिक सिगरेट के स्थान पर ई सिगरेट का प्रयोग आरंभ किया है, उनके स्वास्थ्य में काफी सुधार हुआ है। पंजाब, कर्नाटक, केरल, बिहार, उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, झारखंड, राजस्थान और मिजोरम समेत कुछ राज्यों ने पहले ही इनके प्रयोग एवं बिक्री पर रोक लगा दी है।
Keyword: Electronic Cigarettes, policy, ban,,
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